Vatican Radio HIndi

Archive for May 12th, 2017|Daily archive page

पुर्तगाल की यात्रा पर विभिन्न देशों को संत पापा का तार संदेश

In Church on May 12, 2017 at 4:05 pm

विमान, शुक्रवार, 12 मई 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस पुर्तगाल की प्रेरितिक यात्रा हेतु शुक्रवार 12 मई को रोम से मोन्ते रियल के लिए रवाना हुए। उन्होंने उड़ान के दौरान इटली, फ्रांस और स्पेन देशों के ऊपर से होकर गुजरते हुए तार संदेश प्रेषित कर शुभकामनाएं अर्पित की।

संत पापा ने इटली के राष्ट्रपति सेरजो मत्तारेल्ला को प्रेषित संदेश में कहा, ″मैं फातिमा में माता मरियम के दिव्य दर्शन की 100 वीं वर्षगाँठ का समारोह मनाने के लिये तीर्थयात्री बनकर पुर्तगाल के लिए रोम से प्रस्थान कर रहा हूँ ताकि मैं वहाँ विश्व भर से आये बीमारों, मरियम भक्त तीर्थयात्रियों और वहाँ काथलिक समुदाय से मुलाकात कर सकूँ। माननीय राष्ट्रपति महोदय मैं आपका अभिवादन करता हूँ तथा इटलीवासियों की विशेष याद करता हूँ जो आध्यात्मिक और शारीरिक रुप से दुःख सह रहे हैं उन्हें मैं अपना आशीर्वाद प्रदान करता हूँ।″

संत पापा ने फ्राँस के ऊपर से उड़ान भरते हुए राष्ट्रपति फ्रांसवां ओलांद के नाम प्रेषित तार संदेश में कहा, ″पुर्तगाल में अपनी प्रेरितिक यात्रा हेतु जाते हुए जब मैं फ्राँस के ऊपर उड़ रहा हूँ मैं आपका तथा आपके सभी सह नागरिकों का अभिवादन करता हूँ मैं प्रार्थना करता हूँ कि सर्वशक्तिमान ईश्वर आप सभी को शांति एवं संबल प्रदान करे। मैं पूरे राष्ट्र पर दिव्य आशीष की कामना करता हूँ।″

संत पापा ने स्पेन के ऊपर से उड़ान भरते हुए राजा फिलिप छटे के नाम प्रेषित तार संदेश में कहा, ″पुर्तगाल में अपनी प्रेरितिक यात्रा हेतु जाते हुए मैं सपेन के ऊपर उड़ रहा हूँ, स्पेन के राजा, मैं आपको और आपके देश वासियों का अभिवादन करता हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि सर्वशक्तिमान ईश्वर आप सभी को शांति एवं संबल प्रदान करे। मैं पूरे राष्ट्र पर दिव्य आशीष की कामना करता हूँ।″


(Margaret Sumita Minj)

फातिमा की तीर्थयात्रा हेतु निमंत्रण

In Church on May 12, 2017 at 4:04 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 12 मई 2017 (वीआर सेदोक): संत पापा फ्राँसिस ने सभी विश्वासियों को फातिमा की माता मरियम के पास तीर्थयात्रा हेतु निमंत्रण दिया।

उन्होंने ट्वीट प्रेषित कर कहा, ″मैं आप प्रत्येक को आशा एवं शांति के तीर्थयात्री के रूप में मेरी यात्रा में शामिल होने का निमंत्रण देता हूँ। आपके हाथ प्रार्थना द्वारा मुझे सहारा देते रहें।″

संत पापा फ्राँसिस 12 मई को रोम समयानुसार दोपहर दो बजे फातिमा की यात्रा हेतु रवाना हुए।


(Usha Tirkey)

पुर्तगाल में सन्त पापा फ्राँसिस की यात्रा की पृष्ठभूमि

In Church on May 12, 2017 at 4:03 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 12 मई सन् 2017 (सेदोक): “मरियम के साथ, आशा और शांति के तीर्थयात्री रूप में मैं फातिमा की तीर्थयात्रा कर रहा हूँ”, इन शब्दों से पुर्तगाल यात्रा की पूर्वसन्ध्या एक ट्वीट कर, काथलिक कलीसिया के परमधर्गुरु सन्त पापा फ्राँसिस, शुक्रवार 12 मई को रोमसमयानुसार दोपहर के दो बजे रोम अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से पुर्तगाल के लिये रवाना हो गये। फातिमा के तीन बच्चों को मिले मरियम के दिव्य दर्शन की 100 वीं वर्षगाँठ का समारोह मनाने के लिये सन्त पापा यह तीर्थयात्रा कर रहे हैं जो इटली से बाहर उनकी 19वीँ विदेश यात्रा है तथा फातिमा की पहली तीर्थयात्रा है। इससे पूर्व 1967 में सन्त पापा पौल षष्टम, फिर 1982, 1991 तथा सन् 2000 में सन्त पापा जॉन पौल द्वितीय तथा 2010 में सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने फातिमा की तीर्थयात्राएँ की थीं।

“मरियम के संग-संग आशा और शांति के तीर्थयात्री”, 12 तथा 13 मई के लिये निर्धारित सन्त पापा फ्राँसिस की फातिमा यात्रा का आदर्श वाक्य है जिसके दौरान वे पुर्तगाल के वरिष्ठ सरकारी एवं कलीसियाई अधिकारियों के साथ मुलाकातें करेंगे तथा धन्य फ्राँसिसको मार्तो एवं धन्य जसिन्ता मार्तो को सन्त घोषित कर काथलिक कलीसिया में वेदी का सम्मान प्रदान करेंगे।

लूसिया दोस सान्तोस के साथ धन्य फ्राँसिसको मार्तो एवं धन्य जसिन्ता मार्तो वही चरवाहे बच्चे हैं जिन्होंने अपने बाल्यकाल में, सन् 1917 ई. में, कई बार मरियम के दिव्य दर्शन प्राप्त किये थे। उस समय लूसिया की उम्र 10 वर्ष की तथा उनके चचेरे भाई बहन फ्राँसिसको एवं जसिन्ता की उम्र 9 एवं 07 वर्ष की थी। बताया जाता है कि अपनी भेड़ों को चराते हुए ये तीनों बच्चे माता मरियम के आदर में रोज़री विनती किया करते थे तथा दो पहर को सूर्य का प्रकाश तेज़ हो जाने पर पत्थरों को इकट्ठा कर एक छोटा सा घर बनाया करते थे। इसी छोटे से घर पर मरियम महागिरजागर का निर्माण किया गया था।

फातिमा के इन बच्चों ने सन् 1917 ई. में पहली बार 13 मई को एक बिजली चमकती देखी जिससे वे डर से गये किन्तु बाद में बिजली का प्रकाश गहराता गया जिसके बीच से उन्होंने सूर्य से भी अधिक दैदीप्यमान प्रकाश से घिरी एक महिला को देखा जो अपने हाथों में रोज़री माला लिये हुए थी। इसी स्थल पर मरियम दर्शन प्रार्थनालय की स्थापना कर दी गई थी। “प्रार्थना करना बहुत ज़रूरी है”, यह कहकर महिला ने बच्चों से कहा था कि वे दर्शन स्थल पर पाँच महीनों तक लगातार आते रहें। माँ मरियम के इसी आदेश का पालन करते हुए उसी वर्ष के 13 जून, 13 जुलाई और फिर उसके बाद 13 सितम्बर एवं 13 अक्टूबर को लूसिया, फ्राँसिसको एवं जसिन्ता ने माँ मरियम के दर्शन पाये थे। बताया जाता है कि अक्टूबर 1917 ई. को अन्तिम दर्शन के अवसर पर लगभग 70,000 लोगों की उपस्थिति में तीन बच्चों ने माँ मरियम के दर्शन किये जिन्होंने स्वतः को “रोज़री माला की रानी” रूप में प्रकट किया तथा आग्रह किया कि उसी स्थल पर उनके आदर में एक प्रार्थनालय का निर्माण कराया जाये। इसी को फातिमा का पहला रहस्य घोषित किया गया था। दूसरा रहस्य थाः माँ मरियम द्वारा रूस के विषय में भविष्यवाणी जिसे विश्व ने द्वितीय विश्व युद्ध तथा उसके बाद की दर्दनाक घटनाओं में देखा। फातिमा के तीसरे रहस्य के बारे में परमधर्मपीठ ने सन् 2000 में प्रकाशित किया था कि माँ मरियम ने सन्त पापा जॉन पौल द्वितीय पर घातक आक्रमण की भविष्यवाणी की थी। सन् 1981 में, सन्त पेत्रुस महामन्दिर के प्राँगण में, तुर्की के असी आक्चा नामक बन्दूकची ने सन्त पापा जॉन पौल द्वितीय पर गोलियाँ चला दी थी। इस प्राणघाती हमले से बच निकलने के बाद, धन्यवाद ज्ञापन स्वरूप, सन्त पापा ने अपने शरीर में लगी गोली फातिमा को अर्पित कर दी थी जिसे आज फातिमा की रानी मरियम के मुकुट में देखा जा सकता है।

यूरोप के दक्षिण-पश्चिमी भाग में बसे तथा स्पेन की सीमा से संलग्न पुर्तगाल की कुल आबादी एक करोड़, चौत्तीस लाख, नौ हज़ार है जिनमें 88 प्रतिशत काथलिक धर्मानुयायी हैं। सन्त पापा फ्राँसिस की राष्ट्र में उपस्थिति से पूर्व ही सम्पूर्ण पुर्तगाल की सीमाओं पर कड़ा पहरा लगा दिया गया है। समाचारों में बताया गया कि कड़ी जाँच के बाद गुरुवार तड़के पुलिस ने पुर्तगाल की राजधानी लिसबन से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर दो चीनी नागरिकों की अप्रत्याशित गिरफ्तारी की है जो अपने साथ 500 अमरीकी डॉलर से अधिक नकदी लिये हुए थे।

सन्त पापा फ्राँसिस के फातिमा में आगमन से पूर्व नगर की सड़कों के ओर-छोर “सन्त पापा फ्राँसिस आपका हार्दिक स्वागत है” शब्दों वाले विशाल पोस्टरों को देखा गया। बुधवार 10 मई को सन्त पापा ने एक विडियो सन्देश प्रकाशित कर विश्व के काथलिक धर्मानुयियों से आग्रह किया था कि वे उनकी इस तीर्थयात्रा में अपनी प्रार्थनाओं द्वारा उनके समीप रहें। उन्होंने कहा था कि प्रार्थनाओं द्वारा उनकी आँखों को वह रोशनी मिलती है जो “मुझे अन्यों को उस प्रकार देखने में सक्षम बनाती है जैसे ईश्वर उन्हें देखते हैं तथा उसी तरह प्यार करने में सक्षम बनाती है जैसे ईश्वर प्यार करते हैं।” अनुमान है कि सन्त पापा फ्राँसिस की दो दिवसीय फातिमा तीर्थयात्रा के दौरान आयोजित विभिन्न समारोहों में लगभग दस लाख श्रद्धालु उपस्थित होंगे।


(Juliet Genevive Christopher)

संत पापा ने वाटिकन द्वारा आयोजित वेधशाला के प्रतिभागियों को संबोधित किया

In Church on May 12, 2017 at 4:02 pm

वाटिकन रेडियो, शुक्रवार, 12 मई 2017 (सेदोक)  संत पापा फ्राँसिस ने वाटिकन द्वारा आयोजित वेधशाला के प्रतिभागियों को अपने संबोधन में कहा कि इन दिनों कस्तल गन्दोल्फो में हो रहे विचार-विमर्श के मुद्दों पर कलीसिया विशेष रुचि रखती है क्योंकि वे हमें विस्तृत रूप से प्रभावित करते हैं।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मांड  की उत्पत्ति और उसका विकास, अंतरिक्ष और समय की संरचना जैसी विषयवस्तुएं विज्ञान, दर्शन, ईशशास्त्र और हमारे जीवन की आध्यात्मिकता से संबंधित हैं। ये सारे तथ्य कई बातों को हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं जो कभी आपस में मेल खातीं तो कभी एक-दूसरे का विरोध करती हैं।

काथलिक पुरोहित मान्यवर जॉर्जिस लेमेतरे विज्ञान और विश्वास इन दो विषयों के मध्य सजीव तनाव से अच्छी तरह वाकिफ हैं और विज्ञान और ईश शास्त्र दोनों विषयों के बीच सुव्यवस्थित रुप में अन्तर स्पष्ट कर सकते हैं।

अंतरिक्ष और समय की विशालता के आगे मानव के अनुभव और आश्चर्य नगण्य हैं जैसे कि स्तोत्र कार कहता है, “जब मैं तेरे बनाये हुए आकाश को देखता हूँ तेरे द्वारा स्थापित तारों और चन्द्रमा को, तो सोचता हूँ कि मनुष्य क्या है, जो तू उसकी सुधि ले”ॽ महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्‍टीन कहा करते थे, “दुनिया का अनंत रहस्य अपने में अबोधगम्य है” बह्मांड का अस्तित्व और अबोधगम्यता कोई आकस्मिक घटना या अव्यवस्था नहीं वरन यह ईश्वरीय विवेक की निशानी है।

संत पापा ने कहा कि मैं वेधकार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ और मैं आप से निवेदन करता हूँ कि आप इसके द्वारा सत्य के धरातल को छूने का प्रयास करें। हमें सत्य से भयभीत नहीं होना है और न ही अपने विचारों और सोच तक सीमित हो कर रहना है बल्कि हमें अपनी नम्रता में विज्ञान की नई खोजों का स्वागत करना है। उन्होंने कहा कि हम जैसे-जैसे ज्ञान की सीमाओं की ओर बढ़ते वैसे-वैसे हम ईश्वर के सच्चे ज्ञान को अपने जीवन में अनुभव करते हैं जो हमारे हृदय को परिपूर्ण से भरता है।

 


(Dilip Sanjay Ekka)

प्रेरक मोतीः सन्त नेरेइयुस एवं सन्त आखिल्लेइयुस (पहली शताब्दी)

In Church on May 12, 2017 at 4:01 pm

वाटिकन सिटी 12 मई सन् 2017

सन्त नेरेइयुस एवं सन्त आखिल्लेइयुस पहली शताब्दी के शहीद सन्त हैं। सन्त पापा सन्त दामासुस ने चौथी शताब्दी में, यानि इन शहीदों के निधन के लगभग 300 वर्ष बाद, अपने स्मृति-ग्रन्थ में इनके बारे में लिखा था। इसी युग की एक स्मारक शिला भी मौजूद है जिसपर इन दोनों शहीदों के नाम एवं जीवन चरित अंकित है।

सन्त दमासुस के स्मृति ग्रन्थ के अनुसार ख्रीस्तीयों के उत्पीड़न काल में नेरेइयुस एवं आखिल्लेइयुस रोमी सेना के सैनिक थे जिन्हें प्रायः यातनाएँ देने का काम दिया जाता था। ख्रीस्तीयों के विरुद्ध रोमी साम्राज्य द्वारा चलाये गये दमन चक्र से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था किन्तु सैनिक होने के नाते वे सेना के आदेशों का पालन करते रहे थे।

नेरेइयुस एवं आखिल्लेइयुस रोमी सेना में अपने दायित्वों का निर्वाह करते रहे तथा तब तक ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों को प्रताड़ित करने का काम करते रहे जब तक उन्हें दैवीय आलोक प्राप्त नहीं हुआ। सन्त दमासुस यह नहीं बताते कि उनका मनपरिवर्तन कैसे हुआ किन्तु लिखते हैं कि वह “विश्वास का चमत्कार” था। वह चमत्कार जिसके बाद सैनिक नेरेइयुस एवं आखिल्लेइयुस अपने हथियार छोड़कर अपने तम्बुओं से भाग निकले थे। हिंसा का परित्याग कर वे ख्रीस्त में नवजीवन की ओर आगे बढ़े थे।

ख्रीस्तीयों की यातना को नेरेइयुस एवं आखिल्लेइयुस से अच्छा भला और कौन जान सकता था? वे जानते थे कि रोमी सेना के परित्याग का क्या नतीज़ा होगा किन्तु विश्वास के बल पर साहसपूर्वक आगे बढ़ते गये। वे अपने पापों पर पश्चातात करते रहे तथा ख्रीस्तीयों की हर प्रकार मदद करते रहे। मौत के भय उनमें समाया था किन्तु विश्वास ने उसपर विजय पा ली थी। कुछ ही समय बाद रोमी सेना ने दोनों पलायनवादियों का पता लगाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था।

किंवदन्ती है कि रोमी सेना में नेरेइयुस एवं आखिल्लेइयुस, सम्राट दोमिशियन की नाती, फ्लाविया दोमितिल्ला की रक्षा हेतु तैनात किये गये थे किन्तु बाद में जब फ्लाविया ने ख्रीस्तीय धर्म का आलिंगन किया तब इन दो सन्तों के साथ-साथ फ्लाविया दोमितिल्ला को भी निष्कासित कर मार डाला गया था। यह किंवदन्ती, सम्भवतः इसलिये उभरी कि नेरेइयुस एवं आखिल्लेइयुस को उस स्थल पर दफ्नाया गया था जो बाद में दोमितिल्ला के समाधि स्थल नाम से विख्यात हुआ। पहली शताब्दी के शहीद सन्त नेरेइयुस एवं सन्त आखिल्लेइयुस का स्मृति दिवस 12 मई को मनाया जाता है।

चिन्तनः “सन्त नेरेइयुस एवं सन्त आखिल्लेइयुस की शहादत हमें विश्व के समस्त सैनिकों एवं सश्त्र सैनिकों के लिये प्रार्थना की प्रेरणा प्रदान करें ताकि आधुनिक युग के सैनिक भी ईश्वर के अधिकार को पहचानें तथा ईश नियमों को सर्वोपरि मानें।” 


(Juliet Genevive Christopher)

%d bloggers like this: