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मरियम मगदलेना, आशा की प्रेरित

In Church on May 17, 2017 at 2:49 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 17 मई 2017 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए हज़ारों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को अपनी धर्मशिक्षा माला के दौरान संबोधित करते हुए कहा,

प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

इन दिनों हमारे चिंतन पास्का रहस्य की धुरी पर घूम रहे हैं। आज हम सुसमाचार में चर्चित लोगों के बारे में से एक मरियम मगदलेना के बारे में चिंतन करेंगे जिसने पुनर्जीवित येसु का दर्शन किये। प्रभु के दुःखभोग के दिन उनके पास दफन की धर्मविधि को पूरा करने हेतु पर्याप्त समय नहीं था अतः दूसरे दिन अर्थात बड़े सुबह नारियाँ सुगंधित द्रव्य ले कर येसु के शरीर का विलेपन करने को जाती हैं। कब्र के पास सबसे पहले मरियम मगदलेना पहुँचती है जो येसु के शिष्यों में से एक है जो गलीलिया से येसु के साथ चलती और कलीसिया की सेवा में अपना हाथ बँटाती है। कब्र के रास्ते पर हम बहुत-सी नारियों की निष्ठा से रूबरू होते हैं जो येसु के मर जाने के बाद भी उनके प्रति अपने प्रेम में सदैव बनी रहती हैं।

सुसमाचार हमारे लिए मरियम मगदलेना के जीवन की चर्चा करते हुए कहता है कि वह एक अति विशिष्ट उत्साह से परिपूर्ण नारी है। लेकिन वह कब्र के पास पहुँचकर अपने को निराश पाती है (यो. 20.1-2, 11-18) क्योंकि वह कब्र के पत्थर को लुढ़काया हुआ पाती जो उसके मन में यह विचार लेकर आता है कि येसु के मृत शरीर को उठा लिया गया है। उसके जेहन में येसु के पुनरुत्थान की बात नहीं आती वरन वह सोचती है कि यह किसी का दुष्टता पूर्ण कार्य है।

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार में हम मरियम मगदलेना को कब्र के पास बोझिल और दुःखी मन से भरा हुआ पाते हैं क्योंकि येसु ख्रीस्त मार डाले गये हैं और उनका शरीर अवर्णनीय रुप से कब्र में नहीं है।

वह अश्रु भरे नयनों से कब्र के पास खड़ी रहती है और ईश्वर उन्हें आश्चर्यपूर्ण ढंग से विस्मय से भर देते हैं। सुसमाचार लेखक प्रेरित संत योहन उसकी दृष्टिहीनता पर बल देते हुए कहते हैं, वह दो स्वर्ग दूतों को नहीं देख पाती है जो उसे सवाल-जवाब करते हैं और न ही वह अपने पीछे खड़े येसु को पहचान पाती है। वह उसे बगान का एक माली समझती है। लेकिन येसु उसका नाम लेकर पुकारते और कहते हैं, “मरियम”।

पुनरुत्थान के बाद येसु ख्रीस्त का व्यक्तिगत रूप में मरियम को दर्शन देना कितना सुन्दर लगता है। संत पापा ने कहा कि यह हमें इस बात की झलक देता है कि कोई हमें जानता है, वह हमारे दुःख तकलीफों और निराशा को समझता और द्रवित होते हुए हमें नाम लेकर पुकारता है। यह एक नियम है जो सुसमाचार के कई पन्नों में अंकित है। येसु के इर्द-गिर्द बहुत से लोग हैं जो उन्हें खोजते हैं लेकिन सबसे बड़ी खोई सच्चाई यही है कि ईश्वर सर्वप्रथम हमारे जीवन की चिंता करते हैं। वे इसका विकास करने हेतु हमें नाम लेकर बुलाते हैं क्योंकि वे हम में से प्रत्येक को व्यक्तिगत रुप से पहचानते हैं। हर मानव ईश्वर के प्रेम कहनी का अंग है जिसे वे धरती पर लिखते हैं।

संत पापा ने कहा कि येसु उसका नाम लेकर पुकारते और कहते हैं, “मरियम”। हमारे जीवन की क्रांति हमारे नामों के द्वारा शुरू होती है। सुसमाचार मरियम की खुशी का जिक्र हमारे लिए करता है। यह ख्रीस्तीय खुशी का जिक्र है जो अपने में सारी चीजों को सम्माहित कर लेती है। इस परिस्थिति में हम अपने जीवन के निराशा भरे क्षणों और अपनी असफलताओं की याद करें, जीवन की ऐसी परिस्थितियों में भी ईश्वर हमारे निकट रहते हैं और हमारा नाम लेकर हमें बुलाते हैं, “उठो, मत रोओ क्योंकि मैं तुम्हें बचाने आया हूँ।” संत पापा ने ईश्वर को अपने एक विशेष शब्द द्वारा संबोधित करते हुए कहा कि हमारे ईश्वर एक “स्वप्न देखने वाले ईश्वर हैं”, वे दुनिया को अपने पुनरुत्थान के रहस्य से परिवर्तित करना चाहते हैं।

मरियम येसु को अपने में पकड़े रहने की चाह रखती है लेकिन वे अपने पिता की ओर अग्रसित हैं और वे मरियम को अपने अन्यों शिष्यों के पास संदेशवाहक के रुप में भेजते हैं। इस तरह येसु से मिलने के पहले शैतान के चुंगल में फँसी मरियम महान आशा की एक नई शिष्या बनती है। उसके द्वारा हम अपने जीवन में यह अनुभव करते हैं कि हमारे दुःख की घड़ी, रुदन और हमारे परित्यक्त क्षणों में येसु हमें नाम लेकर पुकारते हैं जहाँ हम उनकी अनंत खुशी को अपने जीवन में अनुभव करते और कहते हैं, “मैंने ईश्वर को देखा है।” मेरे जीवन में परिवर्तन की नई बयार आयी है क्योंकि मैंने येसु को देखा है। अब मैं पहले की अपेक्षा बदल गया हूँ, मैं एक दूसरा व्यक्ति बन गया हूँ क्योंकि मेरी मुलाकात येसु से हुई है। यह हम सभों के लिए साहस और आशा का कारण बनता है।

इतना कहने के बाद संत पापा ने अपनी धर्म शिक्षा माला समाप्त की और सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासियों का अभिवादन किया और उन्हें पास्का काल की शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए सबको अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।


(Dilip Sanjay Ekka)

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संत पापा फ्राँसिस द्वारा संत पियेर दामियानी पल्ली का दौरा

In Church on May 17, 2017 at 2:47 pm

वाटिकन सिटी, बुघवार 17 मई 2017 (वीआर सेदोक) : वाटिकन प्रेस विज्ञप्ति अनुसार संत पापा फ्राँसिस रविवार 21 मई को रोम के दक्षिणी बाहरी इलाके स्थित संत पियेर दामियानी पल्ली का दौरा करेंगे। यह संत पापा दवारा अपने धर्मप्रांत में 15वी पल्ली का दौरा होगा।

रोम के समय अनुसार संत पापा 21 मई को 4 बजे अपराहन संत पियेर दामियानी पल्ली पहुँचेंगे। वहाँ संत पापा के स्वागत हेतु पल्ली के धारक कार्डिनल अगुस्तीनो वाल्लिनी, रोम के दक्षिण क्षेत्र के सहायक धर्माध्यक्ष मोन्सिन्योर पावलो लोजुदिचे, पल्ली पुरोहित डॉन लूच्यो कोप्पा, सहायक पल्ली पुरोहित डॉन एडवार्डो अंद्रेस, डॉन मार्को साबातेर और 28 सेक्टर के अन्य पुरोहितगण पल्ली के मुख्य द्वार पर रहेंगे।

इस पल्ली का दौरा करने वाले परमाध्यक्षों में संत पापा फ्राँसिस तीसरे परमाध्यक्ष हैं। संत पियेर दामियानी की मृत्यु की 9वीं शताब्दी के अवसर पर संत पापा पॉल छठे ने 27 फरवरी 1972 को पहली बार इस पल्ली का दौरा किया था उसके बाद 13 मार्च 1988 में संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने पल्ली का दौरा किया था।

पल्ली वालियों के लिए संत पापा शाम 6 बजे समारोही ख्रीस्तयाग का अनुष्ठान करेंगे। उससे पहले वे प्रथम परमप्रसाद की तैयारी करने वाले पल्ली के 80 बच्चों और दृढकरण संस्कार ग्रहण किये हुए युवाओं के लिए आयोजित कोर्स में भाग लेने वाले 100 युवाओं से मुलाकात करेंगे। संत पापा पल्ली के बीमारों, बुजुर्गों, इस वर्ष बपतिस्मा पाये बच्चों के माता-पिताओं, प्रौढ़ बपतिस्मा की तैयारी करने वाले सदस्यों और पल्ली के उदार कार्यों में सहयोग देने वाले स्वंयसेवी सदस्यों से मुलाकात करेंगे। संत पापा फ्राँसिस चार पल्ली वासियों के लिए पापस्वीकार संस्कार का अनुष्ठान करेंगे।


(Margaret Sumita Minj)

येसु ख्रीस्त हमारी आशा हैं, संत पापा फ्राँसिस

In Church on May 17, 2017 at 2:45 pm

वाटिकन सिटी, बुघवार 17 मई 2017 (वीआर सेदोक) : संत पापा फ्राँसिस ने ट्वीट प्रेषित कर पास्का काल में जी उठे प्रभु येसु ख्रीस्त की उपस्थिति का अनुभव करने और उन्हीं में आशा बनाये रखने हेतु सभी ख्रीस्तीयों को प्रेरित करते हैं।

संत पापा ने संदेश में लिखा, ″येसु ख्रीस्त हमारी आशा हैं वे हमारे लिए जीवित हैं और वे हममें तथा हमारे भाई-बहनों में उपस्थित हैं।″


(Margaret Sumita Minj)

आदिवासी धर्माध्यक्षों द्वारा भारतीय राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की मांग

In Church on May 17, 2017 at 2:44 pm


  नई दिल्ली, बुघवार 17 मई 2017 (उकान) :  भारतीय आदिवासी धर्माध्यक्षों ने लाखों आदिवासियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हस्तक्षेप की मांग की है।

नई दिल्ली के भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन केंद्र में आदिवासी धर्माध्यक्षों की आदिवासियों के जमीन समस्याओं और अन्य मुद्दों पर दो दिवसीय बैठक हुई। बैठक सम्पन्न होने के बाद अगले दिन 10 मई को उन्होंने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन भेजा।

छह राज्यों के आदिवासी धर्माध्यक्षों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन में कहा गया है कि वे अत्यंत दुःखी हैं क्योंकि राज्य सरकारों की नीतियों ने आदिवासियों के अधिकारों को कुचल दिया है।

वे राष्ट्रपति महोदय से अपील करते हैं कि वे आदिवासियों की जमीन, जंगल और सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों का रक्षा करें। धर्माध्यक्षों ने कहा कि अधिकांश आदिवासियों के लिए “भूमि ही जीविका का एकमात्र साधन है। उनमें से 90 प्रतिशत आदिवासी उनकी पैतृक भूमि में कृषि या संबंधित गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं।

वर्तमान में संघीय और अन्य राज्य सरकारों ने भारी पैमाने पर उद्योगपति को सुविधा देने के लिए आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल करने के लिए विभिन्न कार्य-कलाप शुरु कर दिया है।

उदाहरण के तौर पर, हाल ही में झारखंड सरकार ने दो कानूनों को संशोधन किया है जो कि आदिवासियों के लिए कृषि हेतु प्रयोग में लाई जाने वाली भूमि के संरक्षण की गारंटी देती है। सरकार ने उनकी भूमि को गैर कृषि भूमि के रूप में घोषित कर दिया है। चूँकि गैर-कृषि भूमि सुरक्षात्मक कानून के दायरे में नहीं आता है जिससे आदिवासियों को अपदस्थ किया जा सकता है।

एक बार इन आदिवासियों से जमीन छिन गई तो भारत में आदिवासियों की पहचान सदा के लिए उसी प्रकार समाप्त हो जाएगी जैसा पिछली सदियों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में हुआ था।

उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण छत्तीसगढ़ और ओड़िशा राज्यों के आदिवासी जिलों में चल रहा है और “इन जिलों के आदिवासी भी हमेशा के लिए खो जाएँगे।”

संघीय सरकार ने 2006 में वन अधिकार अधिनियम (अनुसूचित जनजाति और प्रथागत वन में रहने वाले लोग) आदिवासी लोगों के अधिकारों को बहाल करने का वादा किया कि उनकी भूमि समुदाय के स्वामित्व वाली होगी। हालांकि, प्रावधानों को अभी तक लागू नहीं किया गया है।

कथित रूप से आदिवासी हितों की रक्षा के लिए ही झारखंड राज्य 2000 में बनाया गया था, फिर भी सरकार ने प्रवासियों को राज्य में आने और रहने की छूट दे दी है। राज्य प्रवासियों से भर गया है और इससे आदिवासियों की भाषाएँ, रीति-रिवाज और परंपराओं के लुप्त होने के खतरे हैं।

हालांकि भारतीय संविधान धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने स्वयं की शिक्षण संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन करने के लिए अधिकार की गारंटी देता है, झारखंड सरकार कलीसिया से प्रबंधित स्कूलों के मामलों में दखल देती रही है।

काथलिक कलीसिया झारखंड में 900 से अधिक संस्थान चलाती है। हालांकि, राज्य के अधिकारियों ने कर्मचारियों की नियुक्ति में अनेक शर्तें लगाई, सरकारी अनुदान को बंद किया और अपने स्वयं के पाठ्यक्रम को थोप दिया गया।

उन्होंने कहा, “हमारी संस्थानों ने राष्ट्र-निर्माण के लिए इतना योगदान दिया है पर अब हम इसके प्रशासन में बेहद कठिनाईयों का सामना कर रहे हैं।″

ज्ञापन में विशेष कर झारखंड में ख्रीस्तीयों के उत्पीड़न के बारे में भी कहा गया है। हाल ही में राज्य पुलिस ख्रीस्तीय गिरजाघरों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए एक अभियान शुरू किया और पादरियों के बारे में उनकी राजनीतिक झुकाव, चरमपंथी गुटों, बैंक खाते और आय के संबंध में एक प्रश्नावली भेज दिया।

प्रश्नावली देखने से ऐसा लगता था, “कि सभी ख्रीस्तीय कलीसिया और उनके संस्थान राष्ट्रीय विरोधी और आपराधिक गतिविधियों में लगे हुए हैं। इससे ख्रीस्तीयों के बीच असुरक्षा और भय की भावना समा गई। ”

सुप्रीम कोर्ट के वकील एम पी राजू, जो कानूनी मुद्दों पर धर्माध्यक्षों को सूचित करते हैं, ने कहा “हम नेताओं के रुप में आदिवासियों को जगाने और अनुप्राणित करने में विफल रहे हैं और अब इन मुद्दों को गंभीरता से लेने की जरूरत है ”

वकील राजू ने धर्माध्यक्षों से कहा, “जो हुआ उसे भूल कर, आइये हम नए सिरे से शुरू करते हैं अन्यथा बहुत देर हो जाएगी।”


(Margaret Sumita Minj)

धर्माध्यक्षों ने मीडिया संस्थान को सभी के लिए खोल दिया

In Church on May 17, 2017 at 2:42 pm

नई दिल्ली, बुघवार 17 मई 2017 (उकान) : भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षों द्वारा 20 साल पहले संचार संस्थान को शुरु किया गया था जिसमें प्रेरितिक कार्यों हेतु संचार में प्रशिक्षित करने लिए पुरोहितों और धर्मबहनें को प्रशिक्षण दी जाती थी पर इसे अब सभी के लिए खोल दिया गया है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल कम्युनिकेशन एंड रिसर्च ट्रेनिंग (एनआईएससीएआरए) के वर्तमान निर्देशक फादर जोस मुरिकेन ने कहा कि प्रारंभ में संस्थान “एक कॉलेज परिसर का माहौल देने में विफल रही” और कई लोगों ने इसे कथलिकों का धार्मिक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में लिया।

इस संस्थान को प्रेरितिक कार्यों हेतु संचार में प्रशिक्षित करने लिए पुरोहितों और धर्मबहनों को विदेशों में भेजने की बजाय भारत में ही शुरू किया गया था पर अब हमने अपने मनोभाव को बदल दिया है और हम काथलिकों के लिए कुछ प्राथमिकता देते हुए इसे सभी के लिए खोलना चाहते हैं।

फादर मुरिकेन ने उका समाचार से कहा, ″वर्ष 1997 में इस संस्थान को शुरू किया गया और इन वर्षों के दौरान संस्थान के बुनियादी ढांचों,  पुस्तकालय और ऑडियो-विश्वल स्टूडियो को विकसित किया गया है। यदि विद्यार्थी हमारे पास नहीं हैं तो ये सब बेकार हो जाएंगी।″

दो साल पहले तक, राजधानी दिल्ली के एक उपग्रह शहर, गाजियाबाद में स्थित संस्थान में प्रेरिताई कार्यों हेतु संचार के अल्पकालीन कोर्स दिये गये थे। 250 विद्यार्थियों ने कोर्स किया, जिसमें पुरोहितों और धर्मबहनों की संख्या 200 थी।

सन् 2005 से इस संस्थान ने पत्रकारिता, ऑडियो/विश्वल और प्रसारण में दो साल का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू किया। जिसमें 154 छात्रों को भर्ती कराया गया। उनमें से केवल 80 परोहित और धर्मबहनें थी।

स्नेहा पौल जिसने इस संस्थान में दो साल का स्नातकोत्तर पढ़ाई खत्म किया, ने उका समाचार से कहा कि एक साल पहले पुराने संकाय की वजह से उनके बैच को काफी परेशानी उठानी पड़ी थी ” नये संकाय के साथ स्थिति में सुधार हुआ है। नया बैच इसका फायदा उठायेगा।″


(Margaret Sumita Minj)

पाकिस्तानी अधिकारी : ‘हम अल्पसंख्यकों की रक्षा में विफल रहे हैं’

In Church on May 17, 2017 at 2:41 pm

लाहौर, बुघवार, 17 मई 2017 (उकान) : पाकिस्तान के सबसे अधिक आबादी वाले पंजाब प्रांत के एक अधिकारी ने यह स्वीकार किया है कि वे धार्मिक अल्पसंख्यकों को कट्टरवादी इस्लामियों से बचाने में विफल रहे हैं।

पंजाब सरकार के मुख्य प्रवक्ता मलिक मोहम्मद अहमद खान ने 12 मई को लाहौर में “पंजाब की विविधता की सुरक्षा” विषय पर हो रहे बैठक के दौरान कहा कि “असहिष्णुता, धार्मिक मामलों और दंड की संस्कृति पर क्रोद्ध हमें परेशान करता है।” पंजाब जिले में देश के अधिकांश ख्रीस्तीय निवास करते हैं और देश की 60 प्रतिशत आबादी पंजाब जिले में है।

खान जो पंजाब के मुख्यमंत्री के विशेष सहायक भी हैं, ने कहा कि “धार्मिक सफाई को रोकना होगा,” उन्होंने एक उदाहरण के तौर पर कहा कि गत महीने अप्रैल में अहमादिया संप्रदाय के चार लोग कट्टरपंथियों द्वारा मारे गए।

अहमादीन लोग, जो विश्वास करते हैं कि पैगंबर मुहम्मद अंतिम नबी नहीं थे  और इसी वजह से उन्हें कठोर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा क्योंकि 1974 में उन्हें पाकिस्तान द्वारा गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया था।

खान ने बैठक में भाग ले रहे 30 से ज्यादा कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और शिक्षाविदों से कहा, “हम बलात धर्मांतरण से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में विफल रहे हैं। इसे सभी जानते हैं अतः हम क्यों इसे छिपायें? ”

न्याय और शांति के राष्ट्रीय आयोग और पाकिस्तान हिंदू परिषद के अनुसार पाकिस्तान में प्रति वर्ष 1,000 ख्रीस्तीय और हिंदू महिलाओं को जबरन इस्लाम धर्म को स्वीकार करने और मुसलमानों से शादी कराया जाता है जिनमें 700 पंजाबी ख्रीस्तीय हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अधिकांश लड़कियों की उम्र 18 वर्ष से कम रहती है जिन्हें जबर्दस्ती मुसलमानों से शादी कराया जाता है या बंधुआ श्रम के लिए मजबूर किया जाता है।

काथलिक धार्मिक वरिष्ठ अधिकारियों के न्याय और शांति आयोग के पूर्व क्षेत्रीय समन्वयक फादर हबीब ने उका समाचार से कहा, “स्थानीय हिंदुओं को उनके अपहृत बच्चों को वापस पाना असंभव हो गया है। सभी मामलों में अल्पसंख्यक समुदाय ही धाटे में रहते हैं।”

फादर हबीब ने कहा, “पुलिस और अदालतें हमेशा मुस्लिम दलों का ही पक्ष लेती हैं। कोई भी यह साफ देख सकता है कि लड़की दबाव में बयान दे रही है। आमतौर पर अदालत मामले को खारिज कर देती है और उसे अपहर्ताओं के साथ जाने देती है। शायद वे इसे इस्लाम की सेवा में वैध मानते हैं।”


(Margaret Sumita Minj)

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