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बाल मजदूरी की बुराई का सामना करने हेतु करीतास प्रतिबद्ध

In Church on May 20, 2017 at 2:57 pm

नई दिल्ली, शनिवार, 20 मई 2017 (फिदेस): काथलिक उदारता संगठन कारितास की भारतीय शाखा कारितास इंडिया ने अपने समर्पण को विस्तृत करते हुए देश में बाल श्रम की बुराई का विरोध किया है।

वर्ष 2001 के आँकड़े में दिखाया गया है कि भारत में बाल मजदूरों की कुल संख्या 12 मिलियन थी जो 2011 में घटकर 4.3 मिलियन हो गयी, जबकि संयुक्त राष्ट्र के बाल सुरक्षा विभाग की 2017 की रिपोर्ट अनुसार 5 से 9 वर्ष के बाल मजदूर के शिकार बच्चों की संख्या 2001 के आँकड़े अनुसार कुल 15 प्रतिशत थी जो 2011 के आँकड़े अनुसार 25 प्रतिशत हो गयी है।

करीतास इंडिया के मुताबिक बच्चों की समस्या, जो मजदूरी करते तथा स्कूल नहीं जा पाते हैं अब भी गंभीर समस्या बनी हुई है तथा भारत जैसे देश को इस तरह की समस्या के लिए शर्मिंदा होना चाहिए।

भारत में बाल श्रम की स्थिति गाँवों एवं शहरों दोनों ही क्षेत्रों में असंरचित कार्य स्थलों में पनपता  है।

कारीतास इंडिया के शीर्ष अधिकारी अंतोनी क्षेत्री ने फिदेस को जानकारी दी कि कारीतास इंडिया दार्जिलिंग में एक कार्यक्रम को सहयोग दे रही है जिसका उद्देश्य है बच्चों को बाल मजदूरी की समस्या से मुक्त कराना। यदि यह कार्यक्रम सफल रहा तो पहली बार भारत सरकार एवं आम नागरिक इस लक्ष्य को प्राप्त कर पायेंगे। इस कार्यक्रम द्वारा ग्राम पंचायत के सहयोग से 45 बाल मज़दूरों को मुक्त किये जाने की उम्मीद की जा रही है। उन्होंने कहा कि कारीतास इंडिया का मानना है कि एक राष्ट्र के रूप में हमें अपने देश के बेहतर भविष्य के लिए बचपन की गारंटी देने की आवश्यकता है।

आंध्रप्रदेश में करीब 400,000 बाल मजदूर हैं जिनमें से अधिकतर लड़के बच्चे हैं जो 7 से 14 साल के उम्र के हैं जिन्हें कपास उत्पादन हेतु दिन में 14 से 16 घंटे काम करने पड़ते हैं। कर्नाटक में बाल श्रमिक बड़ी संख्या में शहरी क्षेत्र में कपड़ा उद्योग के क्षेत्र में काम करते हैं। औद्योगिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश तथा बच्चों की सुरक्षा हेतु बने नियमों के प्रभावकारी ढंग से लागू नहीं किये जाने के कारण बाल श्रम को बढ़ावा मिल रहा है।

बच्चे जिस स्थिति में काम करते हैं वह गुलामी के समान है। कई मामले ऐसे भी हैं जिसमें घरेलू श्रमिकों के शारीरिक, यौन एवं भावनात्मक दुरुपयोग की घटनाएँ हैं। इंडियन कारीतास के अनुसार गरीबी तथा सामाजिक सुरक्षा की कमी ही बाल श्रम के मुख्य कारण हैं। ‘बच्चों के अधिकार केंद्र’ का कहना है कि बाल श्रम में फंसने वाले अधिकतर बच्चे निचली जाति एवं गरीब परिवारों से आते हैं।


(Usha Tirkey)

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