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शांति के लिये महिलाओं की भूमिका अहं, सन्त पापा फ्राँसिस

In Church on June 9, 2017 at 1:28 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 9 जून 2017 (सेदोक): सन्त पापा फ्रांसिस ने कहा है कि विश्व में शांति एवं भाईचारे की स्थापना हेतु महिलाओं की भूमिका अहं है।

कार्डिनल जॉन लूई तौराँ के नेतृत्व में सन्त पापा से मुलाकात हेतु शुक्रवार को वाटिकन पहुँचे परमधर्मपीठीय अन्तरधार्मिक सम्वाद परिषद की पूर्णकालिक सभा में भाग लेनेवाले प्रतिभागियों को सन्त पापा ने सम्बोधित किया।

पूर्णकालिक सभा में “विश्वव्यापी भाईचारे की शिक्षा में महिलाओं की भूमिका” विषय पर विशद विचार-विमर्श किया गया तथा विचारों का आदान प्रदान किया गया। इस सन्दर्भ में सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा कि शांति एवं भ्रातृत्व की ओर अग्रसर मानवजाति की यात्रा में महिलाओं की भूमिका का प्राथमिक महत्व है।”

उन्होंने कहा, “दुर्भाग्यवश, आज महिलाओं की भूमिका, प्रायः, गौण कर दी जाती है तथा उसे मान्यता नहीं दी जाती। वस्तुतः, महिलाएं और यहाँ तक कि बच्चे भी हिंसा एवं शोषण के शिकार बनते हैं तथा जहाँ हिंसा और घृणा को प्रश्रय मिलता है वहाँ परिवार एवं समाज की क्षति होती है।”

वैश्वीकरण एवं बहुलवाद के विश्व में महिलाओं की भूमिका के मूल्यांकन का सन्त पापा ने आह्वान किया कि और कहा, “सार्वभौमिक भ्रातृत्व को विश्वव्यापी स्तर पर प्रोत्साहन देने हेतु महिलाओं की क्षमता एवं योग्यता को पहचानने की नितान्त आवश्यकता है।”

उन्होंने कहा, “सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक एवं राजनैतिक जीवन में, राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी, महिलाओं की भूमिका को मान्यता देना तथा उनकी प्रतिष्ठा को प्रोत्सहन प्रदान करना आवश्यक है क्योंकि भाईचारे के क्षेत्र में महिलाओं से श्रेष्ठकर कोई और नहीं है।” इसी प्रकार, उन्होंने कहा, “महिलाएँ सम्वाद को भी आगे बढ़ा सकती है तथा विभिन्न धर्मों एवं समुदायों के बीच मैत्री एवं शांति की स्थापना में सफल हो सकती हैं।


(Juliet Genevive Christopher)

नौ जून को सन्त पापा फ्रांसिस ने किया ट्वीट

In Church on June 9, 2017 at 1:25 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 9 जून 2017 (सेदोक): सन्त पापा फ्रांसिस ने शुक्रवार, 9 जून 2017 को एक ट्वीट सन्देश प्रकाशित कर सभी से एकता एवं शांति के हित में काम करने की अपील की।

अपने ट्वीट पर सन्त पापा ने लिखा, “हममें से प्रत्येक व्यक्ति, येसु ख्रीस्त के शरीर के सजीव सदस्य होने के नाते, एकता एवं शांति के पक्ष में काम करने के लिये बुलाये गये हैं।”


(Juliet Genevive Christopher)

गुजरात पाठ्यपुस्तक में येसु मसीह का अपमान

In Church on June 9, 2017 at 1:24 pm

अहमदाबाद, शुक्रवार, 9 जून 2017 (ऊका समाचार): गुजरात राज्य की स्टेट स्कूल टेक्सबुक बोर्ड (जीएसएसटीबी) द्वारा प्रकाशित नवीं कक्षा की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में येसु मसीह को एक ‘दानव’ रूप में प्रस्तुत कर ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों का अपमान किया गया है।

गुजरात के शिक्षा मंत्री ने कहा है कि इस त्रुटि को जल्द ठीक किया जाएगा, जबकि जीएसएसटीबी के अध्यक्ष ने कहा है कि ग़लती मुद्रण में त्रुटि के कारण हुई थी।

नवीं कक्षा की हिन्दी पाठ्यपुस्तक के 16 वें अध्याय में “भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य सम्बन्ध” शीर्षक के अन्तर्गत छपे पाठ में येसु मसीह के सन्दर्भ में जो पंक्ति लिखी है वह है, “इस सम्बन्ध में हैवान ईसा का एक कथन सदा स्मरणीय है”।

ग़लती की ओर ध्यान आकर्षित करानेवाले वकील सुब्रह्मण्यम अय्यर कहते हैं कि त्रुटि आईपीसी की धारा 295 (ए) को आकर्षित करती है, जो किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है।

अय्यर ने कहा कि त्रुटि अनजाने में हो सकती है, लेकिन यह समुदायों के बीच एक दरार पैदा कर सकती है और साथ ही कानून एवं व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकती है। उन्होंने कहा, “ऐसी ग़लती बिलकुल अस्वीकार्य है जिसे तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।”

न्यूज़ 18 के अनुसार, राज्य शिक्षा मंत्री भूपेंद्र सिंह चुडासमा ने कहा है कि वह इस त्रुटि से अवगत हैं और इसे सही किया जायेगा। इस बीच, जीएसएसटीबी के अध्यक्ष नितिन पेठानी ने इसे एक  टाइपोग्राफिक त्रुटि बताकर सफ़ाई दी है कि येसु मसीह के एक शिष्य “हैवा” शब्द  के साथ मिसप्रिंट के कारण “न” अक्षर अनजाने में जुड़ गया है।

तीन जून को वकील अय्यर द्वारा एक सोशल मीडिया साइट पर विवादास्पद अध्याय की एक तस्वीर पोस्ट करने के बाद से गुजरात के ख्रीस्तीय समुदाय का क्रोध भड़क उठा है जिसने पाठछ्य पुस्तक को वापस लेने की मांग की है।

पाठ्य पुस्तक की त्रुटि पर डीएनए समाचार से बातचीत कर गुजरात में मानवाधिकार कार्यकर्त्ता फादर सेडरिक प्रकाश ने कहा “तथ्य यह है कि येसु को एक स्कूल की पाठ्यपुस्तक में अपमानित किया गया है और यह उन लोगों के बारे में बहुत कुछ बताता है जिन्हें बच्चों के मनो-मस्तिष्क, उनके चरित्र और उनके भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी दी गई है।”

त्रुटि को फादर प्रकाश ने फासीवादी विचारधाराओं को आगे बढ़ाने वालों के विषैले एजेंडे का अंग निरूपित कर “पाठ्यपुस्तक की तुरंत वापसी” की मांग की और कहा कि ज़िम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिये। उन्होंने सरकार का भी आह्वान किया कि वह इसके लिये ईसाई समुदाय से सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगे।


(Juliet Genevive Christopher)

पश्चिम बंगाल के एक गिरजाघर में तोड़-फोड़

In Church on June 9, 2017 at 1:23 pm

राणाघाट, शुक्रवार, 9 जून 2017 (ऊका समाचार): पश्चिम बंगाल के एक गिरजाघर में, मंगलवार रात कुछेक उग्रवादी तत्वों ने तोड़-फोड़ मचाई। पुलिस ने बताया है कि अपराधियों की खोज शुरु हो गई है।

कलीसियाई अधिकारियों ने ऊका समाचार को बताया कि दयाबारी मिशन केन्द्र के 127 वर्ष प्राचीन सन्त लूक गिरजाघर में उग्रवादियों ने तोड़-फोड़ मचाई तथा कुछेक प्राचीन धार्मिक कृतियाँ एवं 3000 रुपये नकदी चुरा कर ले गये।

गिरजाघर के पुरोहित फादर किशोर मण्डल के अनुसार, “दुष्कर्मियों ने पवित्र यूखरिस्त की रोटियों को ज़मीन पर बिखेर दिया तथा उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। कुछ अन्य धार्मिक पात्र जैसे ख्रीस्तयाग में प्रयुक्त होनेवाला चषक, वेदी पर लगाये जानेवाले पीतल एवं ताम्बे के मोमबत्ती दान आदि और तीन हज़ार रुपये की नकदी लेकर अपराधी फरार हो गये।”

उन्होंने कहा कि चुराये गये पात्र अनमोल थे क्योंकि वे प्राचीन काल से गिरजाघर में थे।

तोड़-फोड़ और लूटमार का पता तब लगा जब सुबह के साढ़े चार बजे गिरजाघर में काम करनेवाले एक श्रमिक ने गिरजाघर के मुख्यद्वार के ताले को टूटा हुआ पाया। गिरजाघर में बिखरी हुई धार्मिक वस्तुओं को देख उसने गिरजाघर के अधिकारियों को जगाया जिन्होंने पुलिस को ख़बर की।

सन्त लूक गिरजाघर उस कॉन्वेन्ट के बिलकुल निकट है जहाँ मार्च 2015 में एक सत्तर वर्षीया धर्मबहन का शीलहरण किया गया था।


(Juliet Genevive Christopher)

प्रेरक मोतीः सन्त ईफ्रेम साईरस (306-373 ई.) (09 जून)

In Church on June 9, 2017 at 1:21 pm

वाटिकन सिटी, 09 जून सन् 2017:

सन्त ईफ्रेम साईरस सिरियाई काथलिक कलीसिया के एक अति प्रिय सन्त हैं। ईफ्रेम का जन्म लगभग 306 ई. में, तुर्की के निसीबिस शहर में हुआ था। सिरिया की सीमा से संलग्न इस शहर को आज नुसायबिन कहा जाता है। ईफ्रेम द्वारा रचित भजनों से ज्ञात होता है कि उनके माता पिता आरम्भिक ख्रीस्तीय समुदाय के सदस्य थे। निसिबिस के द्वितीय धर्माध्यक्ष जैकब के नेतृत्व में ईफ्रेम की शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई थी तथा धर्माध्यक्ष जैकब ने ही ईफ्रेम को सिरियाई शिक्षक नियुक्त किया था। अपनी शिक्षा प्रेरिताई के तहत ही ईफ्रेम ने भजनों की रचना की तथा बाईबिल की विस्तृत व्याख्या की। वे निसिबिस शहर के प्रमुख ख्रीस्तीय स्कूल के संस्थापक माने जाते हैं जो बाद में जाकर सिरियाई ऑरथोडोक्स कलीसिया की प्रधान ज्ञानपीठ एवं प्रशिक्षण केन्द्र सिद्ध हुआ।

रोमी काथलिक कलीसिया में सन्त ईफ्रेम को कलीसिया के आचार्य भी घोषित किया गया है। ईफ्रेम चौथी शताब्दी के एक विपुल एवं प्रवीण भजन रचयिता एवं ईशशास्त्री थे। उन्होंने बहुत से भजनों एवं कविताओं की रचना की तथा गद्य रूप में बाईबिल की विस्तृत व्याख्या भी की। ख्रीस्तीय धर्म के आरम्भिक काल में जब कलीसिया अपधर्म एवं ग़ैरविश्वास के कारण संकट से गुज़र रही थी तब ईफ्रेम के भजनों, कविताओं एवं व्याख्याओं ने व्यावहारिक धर्मशास्त्र का काम किया तथा लोगों को प्रशिक्षण दिया।

सिरियक-भाषाई कलीसियाई परम्परा में ईफ्रेम को सर्वाधिक महत्वपूर्ण धर्मशास्त्री एवं धर्मतत्व वैज्ञानिक माना जाता है। ईफ्रेम ने जीवन का अन्तिम चरण एडेसा नगर में व्यतीत किया जहाँ लोगों को वे लोक धुनों में भजन सिखाया करते थे। लगभग एक दशक तक एडेसा की प्रेरिताई के उपरान्त, 09 जून सन् 373 ई. को, ईफ्रेम का निधन हो गया था। सन्त ईफ्रेम का स्मृति दिवस 09 जून को ही मनाया जाता है।

चिन्तनः प्रज्ञा कहती हैः “धन्य है वह मनुष्य, जो मेरी बात सुनता, मेरे द्वार पर प्रतिदिन खड़ा रहता और मेरी देहली पर प्रतीक्षा करता है;  क्योंकि जो मुझे पाता है, उसे जीवन और प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। जो मुझे नहीं पाता, वह अपनी हानि करता है। जो मुझ से बैर रखते, वे मृत्यु को प्यार करते हैं” (सूक्ति ग्रन्थ 8:34-36)।  


(Juliet Genevive Christopher)

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