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भ्रष्टाचार है एक प्रकार की ईशनिन्दा, सन्त पापा फ्राँसिस

In Church on June 16, 2017 at 1:12 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 16 जून 2017 (रेई): सन्त पापा फ्राँसिस ने भ्रष्टाचार को एक प्रकार की ईशनिन्दा निरूपित कर कहा है कि यह “मृत्यु की संस्कृति को जन्म देता है”।

“कोर्रोसियोन” अर्थात् भ्रष्टाचार शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के प्राक्कथन में सन्त पापा फ्राँसिस ने लिखा है, “भ्रष्टाचार “ईशनिन्दा का एक प्रकार है,” यह एक हथियार है, यह माफ़िया अपराधी संगठनों की सबसे आम भाषा है, अपराधियों द्वारा प्रयुक्त “एक” अन्तस्थ प्रक्रिया जो मृत्यु की संस्कृति को कायम रखती है।”

भ्रष्टाचार पर प्रकाशित इस पुस्तक में वाटिकन स्थित अखण्ड मानव विकास सम्बन्धी परमधर्मपीठीय कार्यालय के अध्यक्ष कार्डिनल पीटर टर्कसन के साथ भेंटवार्ता निहित है। पुस्तक का विमोचन गुरुवार को किया गया। इसमें भ्रष्टाचार के विनाशक परिणामों पर लोगों को आलोकित किया गया है जिसे सन्त पापा फ्राँसिस एक “अभिशाप” और एक “कैंसर” निरूपित करते हैं जो लोगों का जीवन नष्ट कर डालता है।

पुस्तक के प्रक्कथन में सन्त पापा प्रत्येक मनुष्य के ईश्वर के साथ, पड़ोसी के साथ तथा प्रकृति के साथ विद्यमान रिश्तों के टूट जाने की बात करते हैं।

सन्त पापा लिखते हैं, “जब मनुष्य ईमानदार होता है तब वह “जनकल्याण के लिये” ज़िम्मेदाराना जीवन व्यतीत करता है। दूसरी ओर, जिस व्यक्ति को रिश्वत दी जाती है वह “गिर” जाता है तथा उसका असमाजिक आचरण, लोगों के बीच सहअस्तित्व के स्तम्भों को तोड़कर, रिश्तों के मूल्यों को भंग कर डालता है।”

“भ्रष्टाचार”, सन्त पापा लिखते हैं, “शोषण, मानव तस्करी तथा मादक पदार्थों एवं हथियारों  के अवैध व्यापार को जन्म देता है। यह सब प्रकार के अन्याय, अविकास, बेरोज़गारी एवं सामाजिक ह्रास का घर है। भ्रष्ट व्यक्ति क्षमा करना नहीं जानता, वह अन्यों के दुखों के प्रति उदासीन हो जाता और केवल अपना स्वार्थ सोचता है।”

सभी ख्रीस्तीयों एवं समस्त शुभचिन्तकों से सन्त पापा फ्राँसिस अपील करते हैं कि नवीन मानवतावाद के निर्माण में वे अपना योगदान दें। जीवन के यथार्थ सौन्दर्य के मर्म को समझें जो “कॉस्मेटिक उपसाधन” नहीं है बल्कि यथार्थ सौन्दर्य का केन्द्र है मानव व्यक्ति।


(Juliet Genevive Christopher)

निर्धन लोग समस्या नहीं अपितु संसाधन हैं, सन्त पापा फ्राँसिस

In Church on June 16, 2017 at 1:06 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 16 जून 2017 (रेई): “निर्धनों को समर्पित विश्व दिवस” के उपलक्ष्य में प्रकाशित अपने सन्देश में सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा है कि निर्धन लोग समस्या नहीं अपितु संसाधन हैं।

19 नवम्बर को “निर्धनों को समर्पित विश्व दिवस” मनाया जायेगा जिसके लिये, “शब्दों से नहीं बल्कि अपने कार्यों द्वारा हम प्रेम करें” शीर्षक से लिखा गया सन्देश इस सप्ताह वाटिकन प्रेस कार्यालय द्वारा प्रकाशित किया गया।

सन्त पापा फ्राँसिस ने लिखा है कि करुणा को समर्पित जयन्ती वर्ष के समापन पर वे कलीसिया में “निर्धनों को समर्पित विश्व दिवस” की स्थापना करना चाहते थे जिससे “सम्पूर्ण विश्व के ख्रीस्तीय समुदाय सबसे गौण एवं सबसे ज़रूरतमन्द लोगों के लिये प्रभु येसु ख्रीस्त की उदारता के चिन्ह बन सकें।” सम्पूर्ण कलीसिया तथा सर्वत्र व्याप्त शुभचिन्तकों को सन्त पापा फ्राँसिस आमंत्रित करते हैं कि वे सहायता एवं एकात्मता की पुकार लगानेवालों तथा उनके आगे हाथ बढ़ानेवालों पर ग़ौर करें।

पत्रकारों के समक्ष सन्देश की प्रस्तावना कर नवीन सुसमाचार प्रचार सम्बन्धी परमधर्मपीठीय परिषद के अध्यक्ष महाधर्माध्यक्ष रीनो फिज़िकेल्ला ने बताया कि करुणा को समर्पित जयन्ती वर्ष के दिनों में सन्त पापा फ्राँसिस ने कष्टों में पड़े कई लोगों की भावप्रवण गाथाएँ सुनी और “निर्धनों को समर्पित विश्व दिवस” की स्थापना का निर्णय लिया। सन्देश में सन्त पापा दीन-हीनों के सन्त यानि असीसी के फ्राँसिस का स्मरण दिलाकर कहते हैं कि वे इसलिये निर्धनों और ज़रूरतमन्दों की सेवा कर पाये क्योंकि उन्होंने सदैव अपनी दृष्टि ख्रीस्त के प्रति लगाये रखी थी।

सन्त पापा ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि यदि हम इतिहास को बदलकर यथार्थ विकास को प्रोत्साहन देना चाहते हैं तो हमें निर्धनों की पुकार पर कान देना होगा तथा उनकी जीवन स्थिति को बेहतर बनाने के लिये कृतसंकल्प होना पड़ेगा।

सन्देश में सन्त पापा स्मरण दिलाते हैं कि हाशिये पर जीवन यापन करनेवालों में, दमन, हिंसा, क़ैद, युद्ध, स्वतंत्रता के हनन, अज्ञान एवं निरक्षरता, मानव तस्करी, निष्कासन, दासता तथा बलात आप्रवास रूपों में दैनिक स्तर पर निर्धनता हमारे समक्ष चुनौती प्रस्तुत करती है।


(Juliet Genevive Christopher)

16 जून को सन्त पापा ने किया ट्वीट

In Church on June 16, 2017 at 1:03 pm

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 16 जून 2017 (रेई): सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा है कि प्रेम को रचनात्मक प्रतिक्रिया की आवश्यकता रहा करती है।

16 जून को सन्त पापा फ्राँसिस ने एक ट्वीट सन्देश में लिखा, “प्यार को रचनात्मक एवं ठोस प्रतिक्रिया की आवश्यकता रहा करती है। केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते क्योंकि अन्य व्यक्ति  आँकड़ा मात्र नहीं है अपितु हमारा भाई है जिसकी देखभाल करना हमारा दायित्व है।”


(Juliet Genevive Christopher)

ईशशास्त्र विज्ञान लौटा रूसी विश्वविद्यालयों में

In Church on June 16, 2017 at 1:01 pm

मॉस्को, शुक्रवार, 16 जून 2017 (एशियान्यूज़): अब से, ईशशास्त्र विज्ञान रूस के उन सब अकादमिक संस्थानों का एक विशिष्ट शैक्षिक विषय हुआ करेगा जो विशेषज्ञ तथा डॉक्टरेट की डिग्रियाँ जारी करने योग्य हैं।

14 जून को रूसी न्याय मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर ईशशास्त्र विज्ञान में शैक्षणिक डिग्री को अनुमोदन प्रदान कर दिया। इस बात की सूचना रूसी शिक्षा मंत्री ऑल्गा वासीलेवा ने, “मानवतावादी शिक्षा में ईशशास्त्र” शीर्षक से आयोजित प्रथम अखिल रूसी वैज्ञानिक सम्मेलन में दी।

न्याय मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि ईशशास्त्र न सिर्फ इतिहास या दर्शन की एक शाखा है, बल्कि एक विशेष अनुशासन है जिसमें उम्मीदवार छात्र विशेषज्ञता और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर सकते हैं। शिक्षा मंत्री वासीलेवा ने इसे “वास्तविक ऐतिहासिक दिवस” निरूपित कर कहा कि  समाज के विकास के लिये ईशशास्त्र में विशेषज्ञों को तैयार करना आवश्यक है।

इस समय रूस में कम से 4,500 छात्र ईशशास्त्र का अध्ययन कर रहे हैं।

ईशशास्त्र को विश्वविद्यालयीन शिक्षा में डिग्री एवं डॉक्टरेड की उपाधि दिलवाने में रूसी ऑरथोडोक्स कलीसिया के शीर्ष प्राधिधर्माध्यक्ष किरिल की विशिष्ट भूमिका रही है। उन्हीं की बदौलत ईशशास्त्र को एक वैज्ञानिक विषय तौर पर मान्यता मिल पाई है। इस सन्दर्भ में यह रूसी ऑरथोडोक्स कलीसिया की एक महान विजय है।

प्राचीन काल में रूस के उच्च शिक्षण संस्थानों से ईशशास्त्र को इस आशंका से हटा दिया गया था कि बुद्धिवाद एवं तर्कणावाद के साथ उसका मेल न हो जाये तथा कलीसिया प्रशिक्षण द्वारा देश को अपनी ओर अभिमुख न कर ले। 17 वीं शताब्दी में येसु धर्मसमाज द्वारा संचालित ईशशास्त्रीय संस्थानों की स्थापना की गई थी। उस समय रूस में लैटिन भाषा एक अकादमिक भाषा हुआ करती थी किन्तु 19वीं शताब्दी के बाद से ईशशास्त्रीय शिक्षण संस्थानों को राजकीय संस्थानों से बिलकुल अलग कर दिया गया था।


(Juliet Genevive Christopher)

प्रेरक मोतीः सन्त जॉन फ्राँसिस रेजिस (1597 ई.- 1640 ई.) (16 जून)

In Church on June 16, 2017 at 12:59 pm

वाटिकन सिटी, 16 जून सन् 2017:

जॉन फ्राँसिस रेजिस का जन्म फ्राँस के फोन्टकोवेर में, 31 जनवरी, सन् 1597 ई. को हुआ था। फ्राँस के संघटित युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण उनके पिता जाँ रेजिस को तत्कालीन फ्राँस का राजकीय सम्मान दिया गया था। उनकी माता मार्ग्रेट कुलीन घराने की थी। जॉन रेजिस की शिक्षा-दीक्षा बेज़ियर्स के येसु धर्मसमाजी महाविद्यालय में हुई। 19 वर्ष की आयु में, 08 दिसम्बर, सन् 1616 ई. में उन्होंने, टोलूज़ स्थित येसु धर्मसमाज में प्रवेश किया तथा दो वर्षों बाद समर्पित जीवन की शपथें ग्रहण की।

साहित्यशास्त्र में पढ़ाई पूरी करने के बाद युवा जॉन रेजिस को येसु धर्मसमाज द्वारा संचालित कई स्कूलों में आध्यापक के पद पर नियुक्त कर दिया गया था। इन स्कूलों में, विशेष रूप से, निर्धन बच्चों एवं युवाओं को शिक्षा प्रदान की जाती थी। आध्यापक रहते समय जॉन रेजिस ने दर्शनशास्त्र और उसके बाद ईश शास्त्र की पढ़ाई जारी रखी तथा 1630 ई. में पुरोहित अभिषिक्त कर दिये गये।

नवाभिषिक्त जॉन रेजिस को सर्वप्रथम टोलूज़ में बुबोनिक प्लेग पीड़ितों की सेवा के लिये प्रेषित किया गया। दो वर्षों तक रोगियों की सेवा के उपरान्त फादर जॉन रेजिस ने ज़रूरतमन्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया, संकटापन्न युवतियों एवं महिलाओं के लिये उन्होंने आश्रम खोले, अस्पताल में रोगियों की भेंट करना आरम्भ किया तथा बच्चों को धर्मशिक्षा प्रदान करने का कार्य करते रहे। इन सेवाओं के अतिरिक्त, फादर रेजिस ने पवित्र यूखारिस्तीय संस्कार को समर्पित उदारता संगठन की स्थापना की जिसका कार्य निर्धनों की मदद के लिये धनवान लोगों से चंदा एकत्र करना था।

सन् 1633 ई. में विवियर्स के धर्माध्यक्ष के आमंत्रण पर फादर रेजिस ने धर्मप्रान्त के विभिन्न भागों में प्रेरितिक यात्राएँ आरम्भ कीं तथा धर्मोंत्साह के साथ सुसमाचार का प्रचार किया। इन यात्राओं के दौरान फादर रेजिस को भूख, प्यास तथा विपरीत जलवायु एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था जिसके कारण वे प्रायः बीमार रहने लगे थे। सन् 1640 ई. की शीत ऋतु में, फ्राँस के आरदेख प्रान्त की यात्रा के दौरान, 43 वर्ष की आयु में, निमोनिया के कारण, 30 दिसम्बर, 1640 ई. को फादर जॉन रेजिस का निधन हो गया।

फादर जॉन रेजिस की मध्यस्थता से सम्पादित चमत्कारों को मान्यता देकर, सन् 1719 ई. में, सन्त पापा क्लेमेन्त 11 वें ने उन्हें धन्य तथा 1737 ई. में सन्त पापा क्लेमेन्त 12 वें ने, सन्त घोषित कर काथलिक कलीसिया में, वेदी का सम्मान प्रदान किया था। सन्त जॉन रेजिस का पर्व 16 जून को मनाया जाता है।

चिन्तनः प्रार्थना और मनन चिन्तन से, हम भी भाई एवं पड़ोसी की सेवा हेतु आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करें तथा ख्रीस्त के सुसमाचार के साक्षी बनें। 


(Juliet Genevive Christopher)

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