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सेरा अन्तराष्ट्रीय संगठन की 75वीं सम्मेलन पर संत पापा का संदेश

In Church on June 23, 2017 at 3:06 pm

वाटिकन रेडियो, शुक्रवार 23 जून 2017 (रेई) संत पापा फाँसिस ने काथलिक कलीसिया में बुलाहट जीवन को प्रोत्साहित और बढ़ावा देने हेतु गठित सेरा अन्तराष्ट्रीय के 75वें सम्मेलन में सहभागी हो रहे प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए अपना संदेश दिया।

“सदैव तैयार”, शीर्षक के नाम से जमा हुए विश्वासियों के समुदाय को संत पापा ने संबोधित करते हुए कहा कि हम यहाँ ख्रीस्तीय बुलाहट जीवन के एक नये आयाम की खोज हेतु एकात्रित हुए हैं जिससे जीवन का दान हमारे अन्य भाई-बहनों के लिए ईश्वरीय दया और करुणा का केन्द्र बन सकें।

उन्होंने पुरोहितों के साथ “मित्रता” पर अपने विचार को साझा करते हुए कहा कि मित्रता आज एक अति उपयोगी शब्द है। हम अपने जीवन में बहुत सारे लोगों से मिलते हैं जिन्हें हम मित्र कहते हैं जो कि एक शब्द मात्र है। हमारे वार्ता के क्रम में “मित्र” शब्द का प्रयोग हम बारंबार करते हैं, लेकिन हम जानते हैं कि अपूर्ण ज्ञान का संबंध निकटता के उस अनुभव के सामने कुछ नहीं है जो “दोस्त” शब्द से उत्पन्न होता है।

येसु जब “मित्र” शब्द का उपयोग करते तो वे सत्य की ओर हमारा ध्यान इंगित करते हैं। सच्ची दोस्ती हमें एक दूसरे के अति निकट लाती जहाँ हम दूसरे के लिए अपने आप को निछावर कर देते हैं। इस संदर्भ में येसु हमें कहते हैं कि मैं तुम्हें सेवक नहीं वरन मित्र कहूँगा…(यो. 15.15) इस तरह वे मानव और ईश्वर के मध्य एक नये संबंध की स्थापना करते हैं जो नियमों से परे विश्वास और प्रेम में अटूट बनता है। येसु की दोस्ती हमें भावनाओं से मुक्त करती, हमें उत्तरदायी बनाती और हमारे सम्पूर्ण जीवन का आलिंगन करती है। “अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित करने से बड़ा कोई प्रेम नहीं है” (यो. 15.13)

संत पापा ने कहा कि हम मित्र केवल तब बनते हैं जब हम अपने औपचारिकता से बाहर निकलते और अपने मित्रता के संबंध में अपने आप को अन्यों के लिए देते हैं।

हमारे लिए यह उचित है कि हम मित्रता पर मनन करें। मित्रता में हम एक दूसरे के साथ नम्रता और कोमलता में खड़ा होते और साथ चलते हैं, वे एक दूसरे को निकटता में सुनते, शब्दों के परे एक दूसरे को देखते, एक-दूसरे की गलतियों को स्वीकारते और गैर-आलोचनात्मक रुप में पेश नहीं आते हैं। वे एक दूसरे के प्रति ईमानदार बने रहते हैं और अपनी असहमति को व्यक्त करते हैं तथा गिरने पर एक दूसरे को उठा लेते हैं।

संत पापा ने कहा कि हमें पुरोहितों को ऐसी मित्रता में बढ़ने हेतु मदद करने की जरूरत है।  लोकधर्मियों का सेरा क्लब ऐसी ही एक सुन्दर बुलाहट है जहाँ आप पुरोहितों के संग अपनी मित्रता को साझा करते हैं। मित्रगण जो अपने में यह जानते कि उन्हें विश्वास में मित्रता कैसे निभाना है, प्रार्थना में कैसे निष्ठावान और अपने प्रेरितिक समर्पण को कैसे जीना है तो वे बेथानिया के उस परिवार के समान बनते हैं जहाँ येसु ने अपने जीवन को मार्था और मरियम के साथ साझा किया और उन्हें उनकी सेवा-सत्कार हेतु शुक्रिया अदा किया क्योंकि उन्हें वहाँ विश्राम और थकान से निजात मिली।

संत पापा ने सम्मेलन हेतु चुनने गये विषय “सदैव तैयार” के बारे में कहा कि आप सदा आगें बढ़ते जायें क्योंकि यह आप की ख्रीस्तीय बुलाहट है। ईश्वर की वाणी हमें अपने आरामदायक स्थल को छोड़ कर बाहर निकलने का आहृवान करती है और “पवित्र यात्रा” प्रतिज्ञात देश में आगे बढने को कहती है जहां हम अपने अन्य भाई-बहनों से मिलते हैं। बुलाहट अपने जीवन से बाहर निकलने का निमंत्रण है जहाँ हम येसु की मित्रता में आनंदित होते और अपने खुलेपन में जीवन की यात्रा करते हैं।

संत पापा ने कहा कि हम बिना जोखिम उठाये अपने जीवन में विकास नहीं करते। यदि हम अपने भय को धारण किये रहते तो हम अपनी मंजिल की ओर नहीं बढ़ते पाते हैं। (मत्ती.16.25-26) अपने में डर को धारण करने से कोई भी जहाज गहरे पानी में नहीं उतर सकता, हमें अपने भय का परित्याग कर अपने सुरक्षित बंदरगाह से बाहर निकलने की जरूरत है।

ख्रीस्तीय के रुप में जब हम भयमुक्त होकर अपने जीवन में आगे बढ़ते तो हम ईश्वर की आश्चर्यजनक उपस्थिति को अपने जीवन में पाते हैं। भय हमारी सृजनात्मकता को मर डालती और नई चीजों के प्रति संदेह के भाव उत्पन्न करती है। संत पापा ने सभी ख्रीस्तीयों को अपने रोज दिन के जीवन में आगे बढने की चुनौती प्रदान की। हमें लंगड़ाते हुए भी अपने जीवन में सदा आगे बढ़ने की जरूरत है न कि “संग्रहालय ख्रीस्तीय” बने रहना है।

बुलाहट एक निमंत्रण है जो हमें एक दूसरे के द्वारा मिलता है। यह हमें अपने आप से बाहर निकलने का आहृवान देता जिससे हम बड़ी चीजों के लिए अपने को दे सकें। इस तरह हम नम्रता में ईश्वर के सहकर्मी बनते और अपनी प्रसिद्धि का परित्याग करते हैं। कलीसिया में उन लोगों को देख कर हमें दुःख होता है जो अपने उत्तदयित्वों को दूसरे के साथ साझा करना नहीं चाहते हैं।

संत पापा ने कहा कि हम “सदैव तैयार” रहे और साहस, सृजनात्मकता और उत्साह के साथ आगे बढ़े। आप नई व्यवस्था से न डरें। आप अपनी ख्याति में बने न रहे वरन नई चीजों को करने का प्रयास करें। ओलोम्पिक खेल की भांति आप नई पीढ़ी हेतु “मशाल को आगे बढाये” और इस बात पर विश्वास करें कि इसकी ज्योति ऊपर से जलती रहती है। “एक बुनता तो दूसरा लुनता है। (यो.4.37)” जो ख्रीस्तीय प्रेरिताई का अंग है।

अपने संबोधन के अंत में संत पापा ने सभों से अनुरोध करते हुए कहा कि आप धर्मबंधुओं और धर्मसमाजियों का सच्चा मित्र बने और अपने कार्यो द्वारा उनकी बुलाहट को मजबूत बनाने हेतु मदद करें।


(Dilip Sanjay Ekka)

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