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आशा शहीदों की शक्ति, संत पापा

In Church on June 28, 2017 at 3:26 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 28 जून 2017 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए हज़ारों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को आशा पर अपनी धर्मशिक्षा माला के दौरान संबोधित करते हुए कहा,

प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

आज हम ख्रीस्तीय आशा पर चिंतन करेंगे जो शहीदों की शक्ति है। सुसमाचार में जब येसु अपने शिष्यों को अपना प्रेरितिक कार्य करने हेतु भेजते हैं तो वे उनसे कहते हैं कि चमत्कारों के कारण एक दूसरे से ईर्ष्या न करो। वे उन्हें सुसमाचार प्रचार में होनी वाली कठिनाइयों और मुसीबतों के बारे में सचेत करते हुए कहते हैं,“मेरे नाम के कारण लोग तुम से घृणा करेंगे” मत्ती.10.22)। संत पापा ने कहा कि ख्रीस्तीय प्रेम के पात्र होते हैं लेकिन उनके साथ सदैव ऐसा नहीं होता है। येसु हमें दुनिया की हकीकत से रूबरू कराते और हम सभों से कहते हैं कि विश्वास की अभिव्यक्ति एक विषम परिस्थिति को जन्म देती है।

संत पापा ने कहा कि यही कारण है कि ख्रीस्तीय विरोध के शिकार होते हैं। यह एक सामान्य बात है, क्योंकि दुनिया पाप से प्रभावित है जिसके फलस्वरूप हम विभिन्न प्रकार के अहंकार और अन्याय को अपने बीच पाते हैं जो ख्रीस्तियों को पाप की स्थिति से विपरीत दिशा में ले चलता है। यह हमारे विरोधाभास व्यवहार को नहीं वरन ईश्वर के राज्य हेतु हमारी निष्ठा को दिखलाता है जो कि आशा की निशानी है जिसके द्वारा हम येसु ख्रीस्त के मार्ग का अनुसरण करते हैं।

संत पापा ने कहा कि इसकी पहली निशानी दरिद्रता है। जब येसु अपने शिष्यों को अपने कार्यों के निष्पादन हेतु भेजते तो वे उन्हें सभी बातों से “निरावृत” न कि “विभूषित” होने को कहते हैं।  वास्तव में एक ख्रीस्त जो अपने में नम्र और दरिद्र नहीं है, जो अपने को दुनिया की धन-दौलत, शक्ति और स्वयं से, अपने को विरक्त नहीं कर लेता तो वह येसु के समान नहीं बनता है। यदि हम येसु की शिक्षा का अनुपालन करते हुए केवल जरूरत की चीजों तक ही सीमित रहते तो हमारा हृदय प्रेम से भर जाता है। एक ख्रीस्त की सच्ची हार बदले की भावना और हिंसा की परीक्षा में पड़ना है जिसके द्वारा वह बुराई का बदल बुराई से देता है। येसु कहते हैं, “मैं तुम्हें भेड़ियों के बीच भेड़ के समान भेजता हूँ (मत्ती. 10.16), अतः हमारे पास कोई हथियार और पंजा नहीं है वरन एक ख्रीस्त को अपने में चालाक और सतर्क रहने की जरूरत है जो सुसमाचार प्रचार हेतु उसका हथियार बनता है। हिंसा कभी नहीं क्योंकि बुराई को मात देने हेतु हम बुराई के तरीकों को नहीं अपना सकते हैं।

संत पापा ने कहा कि हमारी एकमात्र शक्ति सुसमाचार है। मुश्किल की घड़ी में हमें इस बात पर विश्वास करने की जरूरत है कि येसु हमारे साथ खड़ा होते हैं और अपने लोगों का साथ नहीं छोड़े।  सतावट सुसमाचार का विरोध नहीं वरन इसका अंग है क्योंकि उन्होंने हमारे स्वामी को सताया है, और ऐसी स्थिति में हम अपने को संघर्ष से बचे रहने की आशा कैसे कर सकते हैं। यद्यपि हम ख्रीस्तियों को अपने जीवन की मुसीबतों और संकटों के समय यह सोचते हुए आशा का परित्याग नहीं करना है कि उन्होंने हमें छोड़ दिया है। वे हमें अपनी बातों में विश्वास दिलाते हुए कहते हैं, “यहाँ तक कि तुम्हारे सिर के बाल गिने हुए हैं (मत्ती.10.30)।”  अतः हम अपने में यह कैसे कह सकते हैं कि हमारी दुःख तकलीफ ईश्वर की नज़रों से परे हैं। ईश्वर निश्चित रुप से हमें देखते और बचाते हैं। वे हमारे लिए सारी चीज़ें क़ुर्बान कर देते हैं। हमारे बीच में कोई तो है जो बुराई, माफिया, काले करतूतों, निराश की भेष में चमकने वाले और दूसरों पर रोब जमाने वालों से अधिक शक्तिशाली है-वह जिसे हाबिल का खून धरती से पुकारते हुए सुनाई दिया।

संत पापा ने कहा कि इसीलिए ख्रीस्तीयों को सदैव “दूसरी दुनिया” को देखने की जरूरत है जिसे ईश्वर ने हमारे लिए बनाया है अतः हम सताने हेतु नहीं लेकिन सताये जाने, घंमडी, नशा विक्रेता और बेईमान नहीं वरन सत्य और ईमानदारी के प्रवर्तक बनने हेतु बुलाये गये हैं।

हमारी यह निष्ठा येसु की जीवन शैली है, जो आशा की एक शैली है जिसके द्वारा प्रथम ख्रीस्तियों को एक सुन्दर नाम “शहीद” अर्थात “गवाह” प्राप्त हुआ। शब्दकोशों में उनके लिए और कई एक नामों की संभावना थी जिसे हम वीरता, निस्वार्थता, आत्म-त्याग कह सकते हैं लेकिन प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय ने उन्हें शिष्यत्व की खुशबू कहा। संत पापा ने कहा कि शहीद अपने लिए नहीं जीते, वे अपने विचारों को अन्यों पर नहीं थोपते वरन वे सुसमाचार के प्रति निष्ठा में अपने जीवन की आहूति देते हैं। शहादत ख्रीस्तीय जीवन का सर्वोच्च आदर्श नहीं है क्योंकि इसके ऊपर प्रेम है जो ईश्वर और पड़ोसी प्रेम की बात कहता है। प्रेरित संत पौलुस इस प्रेम का जिक्र करते हुए कहते हैं, “मैं भले ही अपनी सारी सम्पति दान कर दूँ और अपना शरीर भस्म होने के लिए अर्पित करुँ, किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है तो इससे मुझे कुछ भी लाभ नहीं (1 कुरू.13.3)।” यह आत्माघाती हमलावरों को “शहीदों” की संज्ञा देने की निन्दा करता है क्योंकि वे अपने इस कृत्य द्वारा किसी भी रुप में अपने को ईश्वर की संतान के निकट नहीं लाते हैं।

कभी-कभी, अतीत और वर्तमान के इतने सारे शहीदों की जीवनी पढने पर हमें अपने में आश्चर्य का अनुभव होता है कि कैसे वे अपने जीवन की परीक्षा में खरा उतरे। यह आशा थी जिसके द्वारा उनमें जीवन का संचार हुआ- “हमें ईश्वर के प्रेम से कोई भी वंचित नहीं कर सकता जो हमें प्रभु ईसा मसीह के द्वारा मिला है (रोमि.8.38-39)।” ईश्वर हमेशा हमें अपनी शक्ति से भर देते हैं जिससे हम उनका साक्ष्य दे सकें। यह हमें ख्रीस्तीय आशा को विशेषकर गुप्त रुप से अपने जीवन में, अपने कार्यों को प्रेम से और प्रेम में करने हेतु मदद करता है।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्राँसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासियों का अभिवादन किया और उन्हें खुशी और शांति की शुभकामनाएँ अर्पित करते हुए अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।


(Dilip Sanjay Ekka)

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