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कलीसिया के संरक्षक संत पेत्रुस एवं संत पौलुस का महापर्व, संत पापा का प्रवचन

In Church on June 29, 2017 at 3:12 pm

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 29 जून 2017 (रेई): संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार 29 जून को काथलिक कलीसिया के संरक्षक एवं महाप्रेरित संत पेत्रुस एवं संत पौलुस के शहादत के महापर्व के उपलक्ष्य में, संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में समारोही ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने प्रवचन में प्रेरितों के जीवन की तीन मुख्य बातों पर प्रकाश डाला- अभिव्यक्ति, अत्याचार एवं प्रार्थना।

अभिव्यक्ति – पेत्रुस सुसमाचार पर अपने विश्वास की अभिव्यक्ति उस समय करता है जब प्रभु ने सार्वजनिक तथा बाद में व्यक्तिगत प्रश्न किया। पहली बार येसु अपने चेलों से पूछा ″लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?″ (मती. 16:13) इस आकलन का परिणाम दिखलाता है कि वे व्यापक रूप से एक नबी के रूप में जाने जाते थे। इसके बाद येसु ने एक व्यक्तिगत सवाल पूछा, ″तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?″ (पद. 15) इस पर पेत्रुस तुरन्त इसका जवाब देता है, ″आप मसीह हैं आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।” (पद. 16).

संत पापा ने कहा कि विश्वास की अभिव्यक्ति का अर्थ है, येसु को स्वीकार करना है जो लंबे समय से प्रतीक्षित मसीहा, जीवन्त ईश्वर एवं हमारे जीवन के प्रभु हैं।

संत पापा ने कहा कि आज प्रभु यही सवाल हम प्रत्येक से कर रहे हैं, खासकर, जो गड़ेरिये हैं। यह एक विशेष सवाल है। यह समर्पण की मांग करता है क्योंकि यह हमारे सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करता है। जीवन का सवाल जीवन के प्रत्युत्तर की मांग करता है। आज प्रभु हमसे पूछ रहे हैं। ″मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ? मानो कि वे कहना चाह रहे हों कि मैं अभी भी तुम्हारे जीवन का मालिक हूँ, तुम्हारे हृदय की अभिलाषा, आशा का कारण एवं तुम्हारे दृढ़ भरोसा का स्रोत। संत पेत्रुस के समान हम भी येसु के शिष्य रूप में अपने जीवन को नवीकृत करें।

संत पापा ने विश्वासियों को सचेत किया कि वे बकवादी ख्रीस्तीय बनने से बचें जो मात्र बहस करना पसंद करते हैं वरन् प्रेरितों के समान अपने जीवन द्वारा येसु की अभिव्यक्ति करें।

दूसरा बिन्दु है, अत्याचार। पेत्रुस एवं पौलुस ने ख्रीस्त के लिए अपना खून बहाया। आज भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में बहुधा मौन रूप से ख्रीस्तीय, हाशिये पर जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं, विकृत तथा भेदभाव एवं हिंसा के शिकार बन रहे हैं। कई बार उन्हें मृत्यु का भी सामना करना पड़ता है। संत पौलुस के शब्दों का हवाला देते हुए संत पापा ने कहा, ″मैं प्रभु को अर्पित किया जा रहा हूँ।” (2 तिम 4:6). मेरे लिए तो जीवन है मसीह। (फिल. 1:21), जिन्होंने उन्हें अपना जीवन अर्पित किया। संत पौलुस ने प्रभु का अनुसरण करते हुए अपना जीवन अर्पित किया क्योंकि ख्रीस्त को क्रूस से अलग नहीं किया जा सकता। ख्रीस्तीय मूल्य न केवल अच्छे कार्य करना है किन्तु बुराई का सामना करना भी है। जैसा कि येसु ने किया। बुराई का सामना केवल धीरज पूर्वक चुपचाप सह लेना नहीं है बल्कि येसु का अनुसरण करना है जिन्होंने क्रूस के बोझ को अपने कंधों पर लिया तथा दूसरों के खातिर उसे उठाया। इसका अर्थ है क्रूस को स्वीकार करना तथा यह दृढ़ विश्वास करना कि प्रभु सदा हमारे साथ हैं ताकि पौलुस की तरह हम भी कह सकें कि ″हम कष्टों से घिरे हैं परन्तु कभी हार नहीं मानते, हम परेशान रहते किन्तु कभी हार नहीं मानते, हम परेशान होते हैं किन्तु कभी निरास नहीं होते हैं।” (2 कोरि. 4:8-9).

बुराई का सामना करने का अर्थ है येसु के साथ तथा उन्हीं के द्वारा दिखाये रास्ते पर चलकर बुराई का सामना करना जो दुनिया का रास्ता नहीं है। इसी तरह के रास्ते पर चलते हुए संत पौलुस विजयी होने की घोषणा करते हैं। वे हमें बतलाते हैं कि उन्होंने विश्वास को छोड़ बाकी सब कुछ का त्याग किया। कष्ट अपमान एवं अत्याचार को उन्होंने खुशी से स्वीकार किया। दुःख के इस रहस्य के द्वारा उन्होंने अपना प्रेम प्रकट किया।

तीसरा शब्द है- प्रार्थना। एक प्रेरित का जीवन जो विश्वास की अभिव्यक्ति से आरम्भ होता एवं कठिनाईयों में आगे बढ़ता है, निरंतर एक प्रार्थना है। प्रार्थना पानी के समान है जो हमारी आशा एवं निष्ठा को सिंचित करती है। प्रार्थना हमें प्रेम किये जाने का एहसास देती एवं बदले में प्रेम करने की क्षमता प्रदान करती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की शक्ति देती है। पहले पाठ में हम देखते हैं कि पेत्रुस जब बंदीगृह में थे तो कलीसिया निरंतर उनके लिए प्रार्थना कर रही थी।

संत पापा ने कहा कि एक कलीसिया जो प्रार्थना करती है प्रभु उसपर दृष्टि रखते एवं उसकी देखभाल करते हैं। प्रार्थना शक्तिशाली है जो एकता के सूत्र में बांधती एवं बल प्रदान करती है। जबकि आत्म निर्भरता आध्यात्मिक मृत्यु की ओर ले जाती है। प्रार्थना के बिना आंतरिक कैदखाना जो हमें कैद कर रखती है खुल नहीं सकती।

संत पापा ने दोनों महान संतों की मध्यस्थता द्वारा प्रार्थना की कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो पवित्र आत्मा हमें सांत्वना प्रदान करे।  उन्होंने पालियुम ग्रहण करने वाले महाधर्माध्यक्षों के लिए प्रार्थना की कि वे अपने रेवड़ की अच्छी देखभाल कर सकें। संत पापा ने पूर्वी कलीसिया से आये प्रतिनिधियों के लिए भी प्रार्थना की कि ईश्वर उनकी रक्षा करे।


(Usha Tirkey)

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