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पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय स्तोत्र ग्रन्थ भजन 86 (भाग-4)

In Church on July 13, 2017 at 2:51 pm

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं।

स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। हम स्तोत्र ग्रंथ के छियासिवें भजन की व्याख्या में संलग्न हैं छियासिवां भजन राजा दाउद के द्वारा लिखी गई विपत्ति से उबरने हेतु प्रार्थना थी। दाऊद के हृदय से निकली जीवन के हताश और निराश घड़ी की उस प्रभु से प्रार्थना थी जिसे वह अच्छी तरह जानता था। राजा दाउद ने प्रभु से उसकी विनय सुनने और पूरा करने की गुहार लगाई थी।

राजा दाऊद के इस विनय प्रार्थना में हम हमारे आध्यात्मिक जीवन में उठने वाले सवालों और उनके जवाब पाते हैं। वे सवाल हैं 1. हमें क्यों प्रार्थना करनी चाहिए। हमें प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि हमें प्रार्थना की बहुत आवश्यकता है।

2.हमें किससे प्रार्थना करनी चाहिए? हमें सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी दयालु, कृपावान, सबके रक्षक और प्रेमी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

3. हमें कैसे प्रार्थना करनी चहिए? विगत सप्ताह हमने इसी प्रश्न पर गौर किया था कि हमें ईमानदारी से, लगातार, कृतज्ञतापूर्वक, नम्रता और पूरे विश्वास एवं भरोसे के साथ विश्वास के साथ प्रार्थना करनी चाहिए।

दाऊद ने प्रभु पर भरोसा किया। वह कहता है,″प्रभु तुझपर भरोसा है अपने दास का उद्धार कर।″ (पद संख्या 2) दाऊद इस बात को भी जानता है कि जब कभी भी उसने संकट की धड़ी में उसे पुकारा प्रभु ने उसकी सुनी। दाउद को इस बात का भी भरोसा है कि प्रभु उसे अधोलोक की गहराईयों से उसका उद्धार करेगा। पद संख्या 17 में हम पढ़ते हैं, ″मुझे अपनी कृपादृष्टि का प्रमाण दे। तब मेरे शत्रु, यह देखकर,हताश होंगे कि प्रभु, तू मुझे सहायता और सांत्वना प्रदान करता है।″ यहाँ दाउद का प्रभु से कृपादृष्टि का प्रमाण मांगना संदेह से पैदा नहीं होता। वह यह नहीं कहता है कि “हे प्रभु, यदि तू मुझे अच्छाई का प्रमाण दे, तभी मैं तुझ पर भरोसा रखूंगा।” बल्कि दाऊद को कुछ लम्बे समय से उसके शत्रुओं ने आक्रमण कर रखा था और उसके दुश्मन यह कहते हुए दाऊद की हँसी उड़ा रहे थे कि ″हा.. देखो, दाऊद ने अपने ईश्वर पर भरोसा किया पर कहाँ उसका ईश्वर उसे बचाने आता है।″ वास्तव में दाऊद के शत्रु खुद ईश्वर का मजाक कर रहे थे। अतः दाऊद ने अपने शत्रुओं को शर्मिंदा करने के लिए प्रभु से एक उत्साहजनक संकेत पूछता है जिससे उसके शत्रु यह देखकर हताश हो जाऐंगे कि दाऊद का प्रभु उसकी सहायता और सांत्वना प्रदान करता है।

श्रोताओ, विश्वास वास्तविकता से अपनी आँखों को बंद करने और अंधेरे में कूदने वाली बात नहीं है। बल्कि,  हमारी प्रार्थना के प्रत्युत्तर के माध्यम से ईश्वर स्वयं को प्रकट करता है। ईश्वर में विश्वास करने का मतलब यह नहीं कि हम जो भी मांगते हैं उसे ईश्वर को देना ही है। संत लूकस के सुसमाचार में हम पाते हैं येसु ने पिता ईश्वर से इसतरह प्रार्थना की थी। ″हे पिता यदि तू चाहे, तो यह प्याला मझसे हटा ले। फिर भी मेरी इच्छा नहीं, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।″ और उन्होंने क्रूस पर मरना स्वीकार करते हुए अपने ईश्वर में विश्वास को अंत तक बनाये रखा। विश्वास ईश्वर की कृपा और प्रेम पर निर्भर है।

4)  अंत में प्रश्न यह उठता है कि हमें क्या के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना करे भी तो क्यों करें?

दाऊद ने प्रभु से प्रार्थना मुक्ति के लिए, परीक्षा की घड़ी में आनंद के लिए; सीखने के लिए, आज्ञाकारी बने रहने के लिए, एकाग्रता के लिए, श्रद्धालु हृदय के लिए; और सभी पर ईश्वर की महिमा और प्रभुता के लिए प्रार्थना की थी।

मुक्ति के लिए प्रार्थना

दाऊद ने प्रभु से अपने शत्रुओं से बचाने के लिए प्रार्थना की थी। (पद संख्या 2 & 16 ) नये व्यवस्थान में हम मुक्ति शब्द विभिन्न अर्थों में पाते हैं। येसु मसीह दुनिया के मुकितुदाता के रुप में प्रकट हुए। लूकस 19, 10 में हम पढ़ते है,″जो खो गया था मानव पुत्र उसी को खोजने और बचाने आये हैं।″ जबकि संत मत्ती के सुसमाचार के अध्याय 1 पद संख्या 21 में हम पढ़ते हैं ″ वे पुत्र प्रसव करेंगी और आप उसका नाम ईसा रखेंगे, क्योंकि वो अपने लोगों को उनके पापों से मुक्त करेगा।″ तिमथी के नाम पहले पत्र में संत पौलुस कहते हैं कि यह कथन सुनिश्चित और नितांत विश्वसनीय है कि येसु मसीह पापियों को बचाने के लिए संसार में आये।″ (1तिम,1:15). येसु हमें हमारे पापों से मुक्त करते हैं वे चाहते हैं कि हम पापा के बंधन में न रहें पर पाप मुक्त स्वतंत्र ईश्वर के बेटे-बेटियों का जीवन जीयें। अतः हमें बिता ईश्वर से उदारता पूर्वक अपने पापों से मुक्ति पाने हेतु प्रार्थना करनी चाहिए।

परीक्षा की घड़ी में आनंद के लिए प्रार्थना

दाऊद ने इस तरह से प्रार्थना की, ″प्रभु, अपने दास को आनंद प्रदान कर, क्योंकि मैं अपनी आत्मा को तेरी ओर उन्मुख करता हूँ।″ (पद 4)  दाउद को प्रभु का दास बनकर रहना अधिक आनंदकर था क्योंकि उसने अनुभव कर लिया था कि प्रभु ही सभी आनंद के श्रोत हैं। दाउद की खुशी उसका आनंद देने वाले सिर्फ और सिर्फ प्रभु ही हैं इस लिए दाउद सब समय परीक्षा का घड़ी में भी प्रभु से आनंद के लिए प्रार्थना की।

दाऊद ने प्रभु से सीखने के लिए, आज्ञाकारी बने रहने के लिए, एकाग्रता के लिए और श्रद्धा के लिए प्रार्थना की। पदसंख्या 11 में हम पढ़ते हैं, ″ प्रभु, मुझे अपना मार्ग दिखा, जिससे मैं तेरे सत्य के प्रति ईमानदार रहूँ। मेरे मन को प्रेरणा दे, जिससे मैं तेरे नाम पर श्रद्धा रखूँ।″ किसी भी परीक्षण के लिए सीखने वाला मन और हृदय आवश्यक है कठिन परिस्थितियों के माध्यम से ईश्वर अपने बारे में प्रकट करता, साथ ही हम अपने बारे में भी सीखते हैं। हममें से अधिकांश सहज उद्धार के लिए प्रार्थना करते हैं जिससे कि जितनी जल्दी हो सके कठिनाईयों से बाहर आ जायें। परंतु संत पौलुस मसीह के दुःखभोग का सहभागी होना चाहते थे जिससे वे पुनरुत्थान के सामर्थ्य का अनुभव कर सके।(फिली 3:10)। दाऊद ने प्रार्थना की कि वह परमेश्वर के मार्ग सीखें ताकि वह परमेश्वर की सच्चाई का पालन में चल सके। उसने प्रार्थना की कि ईश्वर पर से उसकी निष्ठा न बिखरे और न ही विभाजित हो। बल्कि एकजुट तथा एक मन एक हृदय बना रहे। वे प्रभु में पूर्णरुपेण समर्पित होना चाहते थे। दाउद ने प्रभु से सच्ची श्रद्धा के लिए प्रार्थना की।

सभी पर ईश्वर की महिमा और प्रभुता के लिए के लिए प्रार्थना

पदसंख्या 9 में राजा दाऊद भविष्यवाणी करते हैं,″प्रभु तूने राष्ट्रों का निर्माण किया, वे सब आकर तेरी आराधना करेंगे और तेरे नाम की महिमा करेंगे।″ और दाऊद यह भी पुष्टि की है कि ″मेरे प्रभु ईश्वर, मैं सारे हृदय से तुझे धन्यवाद दूँगा, मैं सदा तेरे नाम की महिमा करुँगा।″ ईश्वर हमारे जीवन में कठीनाईयों और दुःख विपत्तियों को आने देता है जिससे कि हम प्रभु के चरणों में जाएँ उससे मिन्नतें करें और जब प्रभु हमें विपत्तियों से उबारे तो हम महिमा गायें। 50 वे भजन के15 में  प्रभु कहते हैं, ″संकट के समय मेरी दुहाई दो। में तुम्हारा उद्धार करुँगा और तुम मेरा सम्मान करोगे।″ श्रोताओ संकट के समय तो हम अनायास ही प्रभु की याद करते है हमें हर समय प्रभु की याद करनी चाहिए और हर बात के लिए प्रभु को धन्यवाद के गीत महिमा के गीत गाना चाहिए जैसा कि राजा दाउद ने किया था। प्रभु तू भला है, तू दयालु है और अपने पुकारने वालों के लिए प्रेममय।  अब हम छियासिवें भजन की व्याख्या को यहीं विराम देते हैं।

 


(Margaret Sumita Minj)

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