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श्रीलंका – 30 साल तक चले संघर्ष में विधवाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं

In Church on August 2, 2017 at 3:20 pm

कोलोम्बो, बुधवार 2 अगस्त 2017 (फीदेस) :  श्रीलंका में 30 वर्षों के गृहयुद्ध का सबसे बुरा असर तमिल महिलाओं को भुगतना पड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय संकट समूह ने फीदेस एजेंसी को रिपोर्ट देते हुए यह दावा किया कि श्रीलंका में गृहयुद्ध के समाप्त होने के आठ साल बाद भी युद्ध उल्लंघन के लिए तमिल महिलाओं द्वारा न्याय और सच्चाई की मांग पूरी नहीं की गई है।” अंतर्राष्ट्रीय संकट समूह के अनुसार दस्तावेज में सन् 2015 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सामने श्रीलंका सरकार ने वादा किया था कि एक योग्य कमीशन, एक विशेष अदालत, लापता लोगों की जांच करने के लिए कार्यालय और घरों की मरम्मत हेतु सहायता प्रदान की जाएगी पर सरकार आज तक अपने वादों को कार्य रुप नहीं दे सकी। यहाँ तक कि संघर्ष-प्रभावित समूहों की जरूरी आर्थिक और मनोसामाजिक जरूरतों को भी अनदेखा कर दिया।

शरणार्थी शिविरों में अनेको महिलाए यौन हिंसा का शिकार बनीं। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की बहुत बड़ी समस्या विधवापन है। रिपोर्ट के अनुसार उतरी प्रांतों में 40 हजार महिलाएँ और पूर्वी प्रांतों में 50 हजार महिलाएँ युद्ध के दौरान विधवा बनी। इसमें खोये हुए या लापता पुरुषों की पत्नियों को सम्मिलित नहीं किया गया है। “एक अनुमान के मुताबिक, उत्तरी प्रांत के 58,000 घरों में जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा महिलाओं का है। इन विधवाओं को युद्ध के गहरे मनोवैज्ञानिक घावों के साथ साथ आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विधवाएँ समाज के लिए कलंक बन जाती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संकट समूह की रिपोर्ट श्रीलंका सरकार और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को सन् 2015 में किये गये बादों को कार्यरुप करने हेतु याद दिलाती है कि पति के बिना वाले परिवारों के सदस्यों को शिक्षा स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता मिले।


(Margaret Sumita Minj)

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