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आध्यात्मिक साधना की समाप्ति उपरान्त संत पापा की कृतज्ञता

In Church on February 23, 2018 at 2:50 pm

वाटिकन रेडियो, 23 फरवरी 2018 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपनी पाँच दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा की समाप्ति पर आध्यात्मिक साधना के संचालक पुरोहित जोसे तोलेनतीनो के प्रति कृतज्ञता के भाव अर्पित किये।

उन्होंने आध्यात्मिक साधना के उपदेशक का धन्यवाद अदा करते हुए कहा,“मैं परमाध्यक्षीय रोमी कार्यालय की ओर से आप का शुक्रगुजार हूँ क्योंकि आप ने आध्यात्मिक यात्रा में हमारी अगवाई की। हमारी यह यात्रा दक्षिणी सूडान, कोंगो और सीरिया के लोगों संग जारी रहेगी जिनके लिए आज हम उपवास करते हुए प्रार्थना कर रहे हैं।”

संत पापा फ्राँसिस ने कहा कि हम आप का धन्यवाद करते हैं क्योंकि आप ने हमें कलीसिया के बारे में बतलाया जो हमें इस छोटे समुदाय से संयुक्त होने हेतु अभिभूत करता है। आपने हमें इस बात से भी अवगत कराया कि हम प्रशासनिक दुनियादारी के शिकार होने से बचे रहें जो कलीसिया को “संकुचित” बना देती है। इस बात को याद दिलाने हेतु हम आप के शुक्रगुजार हैं कि कलीसिया पवित्र आत्मा का पिंजरा नहीं वरन यह बाहर विचरण करती और अपने कार्यों को पूरा करती है। उन्होंने कहा कि आप ने हमें लिए उद्धरणों द्वारा इस बात की चर्चा की कि पवित्र आत्मा कैसे आख्रीस्तीय और दूसरे सम्प्रदाय के विश्वासियों संग कार्य करता है। ईश्वर का आत्मा सार्वभौमिक है जो सभों के लिए है। आज भी बहुत से लोगों है जो सत्य या अपने अंतरात्मा की पुकार को सुनने का प्रयास करते हैं। संत पापा ने कहा कि हम आप के प्रति आभारी हैं क्योंकि आप ने हमें भयविहीन होकर अपने को खोलने, कठोर हुए बिना, पवित्र आत्मा के प्रति नम्रता और संरचनाओं से बाहर निकलने, जो हमारे अपने में बंद कर देता है मदद की है। “मानव के रुप में हम सभी पापी हैं।” संत पापा ने कहा कि आप हमारे लिए प्रार्थना करना जारी रखें।


(Dilip Sanjay Ekka)

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पर्वत प्रवचन कलीसियाई एवं मानवीय तीर्थयात्रा का मार्गदर्शक

In Church on February 23, 2018 at 2:47 pm

आरिच्या, इटली, शुक्रवार, 23 फरवरी 2018 (रेई, वाटिकन रेडियो): इटली के आरिच्या में सन्त पापा फ्राँसिस के साथ चालीसाकालीन आध्यात्मिक साधना में संलग्न परमधर्मपीठीय रोमी कार्यालय के धर्माधिकारियों के समक्ष शुक्रवार, 23 फरवरी को फादर होज़े तोलेनतीनो मेन्दोन्सा ने प्रभु येसु के पर्वत प्रवचन पर चिन्तन प्रस्तुत किया।

फादर मेन्दोन्सा ने कहा कि येसु द्वारा पर्वत पर किया गया प्रवचन मनुष्यों को जीने की राह सिखाता है, वह कानून से भी बढ़कर है जो व्यक्ति को उसकी अस्मिता का एहसास दिलाता है। उन्होंने कहा कि इस प्रवचन में निहित आठ आशीर्वचन कलीसिया एवं मानव की तीर्थयात्रा में उनके मार्गदर्शक बनते हैं।

फादर मेन्दोन्सा ने कहा, “पर्वत प्रवचन के आशीर्वचनों में स्वयं येसु मसीह प्रकट होते हैं, विशेष रूप से जब वे कहते हैं, “धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है”, इस आशीर्वचन में, उन्होंने कहा, “प्रत्येक विश्वासी येसु के मुखमण्डल के दर्शन कर उनपर चिन्तन कर सकता तथा उनके सदृश दीन मना बनने का प्रयास कर सकता है।”

फादर मेन्दोन्सा ने कहा कि प्रभु येसु ख्रीस्त स्वयं वैसे हैं जैसे उन्होंने अपने आशीर्वचनों द्वारा हमसे आग्रह किया है, मन के दीन, विनीत, दयावान, न्याय और शांति के प्यासे, शांति निर्माता, सबका आलिंगन करने को तैयार तथा समाज के निम्न कहलाने वालों की मदद को तत्पर। उन्होंने कहा कि प्रभु येसु ख्रीस्त चाहते हैं कि हम इन आशीर्वनचों का वरण करें तथा उन्हीं की तरह शत्रुता दीवारों को गिराकर शांति का निर्माण करें।

शांति निर्माण कार्यों में संलग्न व्यक्तियों को प्रोत्साहन देते हुए फादर मेन्दोन्सा ने कहा कि प्रभु येसु मसीह ने कहा है, “जो लोग मेल कराते हैं वे धन्य हैं, वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।”

कलीसिया के समस्त कार्यकर्त्ताओं का उन्होंने आह्वान किया कि सुसमाचार में निहित आशीर्वचनों को आत्मसात कर वे लोगों के बीच मैत्री, पुनर्मिलन तथा शांति की स्थापना हेतु वे अपने स्वार्थों का परित्याग करें। उन्होंने कहा, “कलीसिया तब एक सजीव और जीवन्त कलीसिया होती है जब वह सब चुनौतियों का सामना करते हुए ज़रूरतमन्दों के प्रति अपने दरवाज़ों को खोल देती है। वह तब जीवन्त कलीसिया होती है जब वह विश्व के चौराहों पर जीवन यापन करनेवाले लोगों के तनावों का अनुभव करती तथा उन्हें दूर करने का प्रयास करती है।”


(Juliet Genevive Christopher)

धर्मनिरपेक्षता की सुरक्षा का काथलिक धर्मसमाजियों ने किया प्रण

In Church on February 23, 2018 at 2:45 pm

राँची, शुक्रवार, 23 फरवरी 2018 (ऊका समचार): झारखण्ड में सेवारत  31 धर्मसमाजों एवं धर्मसंघों के काथलिक पुरोहितों एवं धर्मबहनों ने भारतीय संविधान में निहित धर्मनिर्पेक्षता एवं प्रजातंत्रवाद की सुरक्षा का प्रण किया है।

हाल में कुछेक हिन्दू चरमपंथी संगठनों द्वारा भारत को एक थेयोक्रेटिक यानि धर्मतंत्रवादी राष्ट्र बनाने की घोषणा के उपरान्त राँची में काथलिक कलीसिया की न्याय एवं शांति सम्बन्धी समिति के तत्वाधान में एक तीन दिवसीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ।

इस सम्मेलन के उपरान्त समन्वयकर्त्ता काथलिक पुरोहित फादर जैकब पिन्नीकापरमपिल ने ऊका समाचार से कहा, “भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक एवं प्रजातंत्रवादी प्रकृति को गौण करनेवाली शक्तियों की वास्तविकता के प्रति सचेत होकर हमें तत्काल इन मूल्यों की रक्षा हेतु प्रयास करने की नितान्त आवश्यकता है।”

उक्त सम्मेलन में विभिन्न धर्मसमाजों एवं धर्मसंघों के 60 से अधिक पुरोहितों एवं धर्मबहनों ने, “वर्तमान भारत में धर्मनिर्पेक्ष प्रजातंत्रवाद के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियों पर विशद विचार-विमर्श किया।

फादर पिन्नीकापरमपिल ने कहा, “जब तक हम अपने संविधान, उसके धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रचार कर उन्हें सुरक्षित रखने हेतु प्रयास नहीं करेंगे तब तक देश में अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित नहीं हो पायेंगे।”

इसी बीच, समाज कार्यकर्त्ता फादर रॉय थॉमस ने शिक्षा द्वारा चरमपंथ एवं अतिवाद पर विजय पाने का परामर्श दिया और कहा, “समस्त ख्रीस्तीय स्कूलों में संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा का प्रसार होना चाहिये ताकि छात्रों को इस बात का एहसास दिलाया जा सके कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को देश में प्रजातंत्रवाद की स्थापना के लिये किस प्रकार का संघर्ष करना पड़ा था।”


(Juliet Genevive Christopher)

भारत की जनजातियों को मान्यता देने का आह्वान

In Church on February 23, 2018 at 2:43 pm

नई दिल्ली, शुक्रवार, 23 फरवरी 2018 (ऊका समचार): संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारी फूलमन चौधरी ने भारत के एक करोड़ चालीस लाख आदिवासियों को आधिकारिक मान्यता देने का आह्वान किया है।

नई दिल्ली में विगत सप्ताहान्त येसु धर्मसमाज द्वारा संचालित भारतीय सामाजिक संस्था में आदिवासियों के अधिकारों पर आयोजित दो दिवसीय मंच के दौरान प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए श्री चौधरी ने कहा, “एक दशक पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासियों के अधिकारों पर एक घोषणा पत्र जारी किया था किन्तु अब तक भारत के आदिवासियों को आधिकारिक मान्यता नहीं मिल पाई है।”

उन्होंने कहा, “जब तक भारत आदिवासी समुदायों की पहचान स्वदेशी लोगों में नहीं करेगा तब तक आदिवासी आबादी पीड़ित रहेगी तथा संयुक्त राष्ट्र संघीय घोषणा पत्र में निहित उनके अधिकारों को सुनिश्चित नहीं किया जा सकेगा।”

उन्होंने ऊकान्यूज़डॉटकॉम से कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा पत्र सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय साधन है क्योंकि यह स्वदेशी लोगों के जीवन, उनकी गरिमा और उनके कल्याण हेतु न्यूनतम मानकों का एक सार्वभौमिक ढांचा स्थापित करता है।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघीय घोषणा पत्र के अनुकूल आदिवासियों को स्वदेशी जातियों रूप में आधिकारिक मान्यता प्रदान करना उन्हें उनके अधिकारों से सम्मानित करना होगा।


(Juliet Genevive Christopher)

सीरिया, संघर्ष विराम पर बातचीत रही नाकाम

In Church on February 23, 2018 at 2:41 pm

न्यूयॉर्क, शुक्रवार, 23 फरवरी 2018 (एएफपी): संयुक्त राष्ट्र संघीय सुरक्षा परिषद में सिरियाई संघर्ष को रोकने हेतु गुरुवार को युद्धविराम प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।

सिरिया में विगत कई दिनों से दमिश्क के निकटवर्ती पूर्वी गूता में संघर्ष सघन हो गया है जिसमें बताया जाता है कि केवल पिछले पाँच दिनों की बमबारी में कम से कम 400 लोगों की हत्या हो चुकी है।

संघर्ष को रोकने के अभिप्राय से गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र संघीय सुरक्षा परिषद की बैठक हुई जिसमें रूस की मनाही के बाद युद्ध विराम का प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।

संघर्षविराम का प्रस्ताव स्वीडन और कुवैत की तरफ से पेश किया गया था, लेकिन रूस इस प्रस्ताव में संशोधन चाहता था क्योंकि उसका कहना था कि मौजूदा प्रस्ताव से सिरियाई सरकार पर ही दबाव बढ़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र में रूस के प्रतिनिधि वेस्ली नेबेनज़्या ने कहा कि रूस इस बात की गांरटी चाहता था कि पेश किया गया प्रस्ताव ज़मीनी तौर पर कारगर साबित हो। रूस का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को यथार्थवादी होना चाहिये केवल लोकप्रिय नहीं।”

पश्चिमी देशों के प्रतिनिधियों ने रूस के इस रवैये को सीरियाई सरकार का समर्थन करने वाला कदम बताया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार लगभग 3 लाख 93 हज़ार लोग गूता के संघर्षरत इलाकों में फँसें हैं जिन्हें मानवतावादी सहायता की नितान्त आवश्यकता है।


(Juliet Genevive Christopher)

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