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संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष परमधर्मपीठ ने उठाया बच्चों के अधिकारों का मुद्दा

In Church on March 6, 2018 at 3:54 pm

जिनिवा, मंगलवार, 6 मार्च 2018 (रेई, वाटिकन रेडियो): जिनिवा में परमधर्मपीठ के स्थायी पर्यवेक्षक और वाटिकन के वरिष्ठ महाधर्माध्यक्ष इवान यूरकोविट्स ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र संघीय मानवाधिकार समिति के 37 वें सत्र में बच्चों के अधिकारों का मुद्दा उठाया।

मानवीय परिस्थितियों में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा पर मानवाधिकार सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्र संघीय उच्चायुक्त की रिपोर्ट पर टीका करते हुए महाधर्माध्यक्ष यूरकोविट्स ने इस बात पर गहन चिन्ता व्यक्त की कि विश्व के 25% बच्चे मानवीय आपदाओं से पीड़ित हैं।

2017 की रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व के 53 करोड़ पचास लाख बच्चे मानवीय आपदाओं से प्रभावित होते हैं।

उन्होंने कहा, “नित्य बढ़ती मानवीय आपदाएँ जैसे युद्ध, स्थानीय संकट एवं प्रकृतिक प्रकोप अनेकानेक लोगों और विशेष रूप से बच्चों को प्रभावित करते हैं जो हमारा भविष्य हैं। परिणामस्वरूप, शरणार्थी, आप्रवासी, आन्तरिक रूप से विस्थापित एवं अनाथ बच्चों की संख्या में नित्य वृद्धि हो रही है। इनमें अधिकांश वे बच्चे हैं जो विश्व के निर्धनतम क्षेत्रों में निवास करते हैं।“

इस बात की ओर भी महाधर्माध्यक्ष यूरकोविट्स ने ध्यान आकर्षित कराया कि इनमें से अनेक बच्चे बेईमान अपराधिक गुटों द्वारा मानव तस्करी के शिकार बनते, अंगों के लिये शोषित किये जाते तथा सेना में भर्ती होने के लिये बाध्य किये जाते हैं।

महाधर्माध्यक्ष यूरकोविट्स ने कहा कि परमधर्मपीठ और काथलिक कलीसिया इस तथ्य की ओर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित कराना चाहती है कि हमारे बच्चों की प्रतिष्ठा ख़तरे में पड़ी हुई है तथा हर मानवीय आपदा के समय यह सुनिश्चित्त किया जाना चाहिये कि हर बच्चे को सुरक्षा मिले। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के भयावह अनुभव बच्चों के अस्तित्व को प्रभावित करते हैं तथा, “उनके मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय विकास के साथ-साथ उनके शारीरिक विकास में भी बाधा बनते हैं।”

सभी बच्चों के लिये महाधर्माध्यक्ष ने जन्म के समय पंजीकरण, नागरिकता, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा तथा प्रत्येक बच्चे की प्रतिष्ठा के सम्मान का आह्वान किया।


(Juliet Genevive Christopher)

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नई पुस्तक के प्राक्कथन में सन्त पापा ने धर्मबहन की उदारता को किया याद

In Church on March 6, 2018 at 3:50 pm

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 6 मार्च 2018 (रेई, वाटिकन रेडियो): सन्त पापा फ्राँसिस ने इताली पत्रकार पाओला बेर्गामीनी की नई पुस्तक के लिये लिखे प्राक्कथन में अपने बाल्यकाल की घटना को याद कर एक धर्मबहन द्वारा दिये उदारता के साक्ष्य का सराहना की है।

साईलेन्ट एन्जल्स की नन्हीं धर्मबहनें नामक धर्मसंघ के संस्थापक फादर स्तेफानो पेर्नेत के जीवन चरित्र पर लिखी नई पुस्तक के प्राक्कथ्न में सन्त पापा फ्राँसिस ने याद किया कि उनके जन्म के तुरन्त बाद धर्मसंघ की एक धर्मबहन ने उन्हें अपनी बाहों में लिया था। उस समय के बाद से उन्होंने बोयनुस आयरस में सदैव धर्मसंघ की धर्मबहनों से सम्पर्क बनाया रखा था। माँ मरियम के स्वर्गोत्थान को समर्पित यह धर्मसंघ विश्व के 25 राष्ट्रों में सेवारत है।

प्राक्कथन में सन्त पापा ने उस घटना को याद किया है जब धर्मबहनों की मदद से उनके पिता का एक सहश्रमिक संक्रमणात्मक रोग से मुक्त हो गया था और जिसके बाद श्रमिक ने उस सहकर्मी को फटकार बताई थी जो धर्मबहनों की आलोचना कर रहा था।

इल वान्जेलो ग्वान्चा आ ग्वानचा में अर्थात् गाल के बदले गाल सुसमाचार शीर्षक से विमोचित पुस्तक में सन्त पापा फ्राँसिस ने लिखा है, “मेरे पास इन धार्मिक महिलाओं की कई यादें हैं, जो धैर्यपूर्वक कठिनाइयों में पड़े लोगों के घरों में प्रवेश करती,  उनकी देखभाल करती, नौकरियां करने वालों के बच्चों के साथ स्कूल जाती और उनके लिए भोजन तैयार करती हैं और फिर अपने मठ में वापस जाकर अपने नियमों का पालन करती तथा प्रार्थना करती हैं।”

सन्त पापा ने कहा कि वह श्रमिक व्यक्ति नास्तिक था किन्तु धर्मबहनों के उदारतापूर्ण साक्ष्य को देखकर उसने प्रभु ईश्वर की करुणा का साक्षात्कार किया था।

प्राक्कथन में सन्त पापा ने धर्मसंघ के संस्थापक, फ्राँस के पुरोहित फादर पेर्नेत द्वारा पेरिस के ज़रूरतमन्दों के पक्ष में सम्पादित अनुपम कार्यों की सराहना की है जिन्हें 1983 में भक्ति योग्य घोषित किया गया था। उन्होंने कहा कि फादर पेर्नेत के कार्य हमें उन लोगों तक ले जाते हैं जो शरीर एवं आत्मा से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर पर विश्वास एवं पड़ोसी की सेवा दूरस्थ व्यक्तियों के हृदयों का भी स्पर्श कर लेती है।


(Juliet Genevive Christopher)

काश्मीर के मुसलमानों ने किया सिरिया में हिंसा का विरोध

In Church on March 6, 2018 at 3:37 pm

काश्मीर, मंगलवार, 6 मार्च 2018 (ऊका समाचार): भारत के कश्मीर क्षेत्र में सैकड़ों मुसलमानों ने सीरिया की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर उसे सरकारी बलों और विद्रोहियों के बीच लड़ाई का ज़िम्मेदार ठहराया है जिसमें हाल के दिनों में 600 से ज्यादा नागरिक मारे गये हैं।

दमिश्क के निकटवर्ती गूता में विगत दो सप्ताहों के दौरान हुए हवाई हमलों में 674 नागरिकों के हताहत हो जाने के बाद विरोध प्रदर्शन करनेवालों ने 4 मार्च को बशर अल-असद सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

अपने फेसबुक पृष्ठ पर विरोधकर्त्ता इरशाद अहमद ने कहा, “हमें इस नंगी बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाने की ज़रूरत है। निर्दोष बच्चों की हत्या इतनी देर तक सहन नहीं की जा सकती। गहरी नींद से जागने तथा असद शासन के बर्बर कृत्यों की निन्दा करने का समय आ गया है।”

सिरिया में अंधाधुंध हवाई बमबारी की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निंदा की गई है किन्तु 24 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र संघीय सुरक्षा परिषद के सदस्यों की सर्वसम्मति से घोषित 30 दिवसीय युद्धविराम विफल होता नज़र आ रहा है।

सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के अलावा, जम्मू और कश्मीर के विश्वविद्यालयीन छात्रों ने श्रीनगर के केंद्रीय बाजार में इकट्ठा होकर सीरिया में हत्याओं के खिलाफ मोमबत्ती जुलूस निकाला।

नजमू साक़िब नामक छात्र ने ऊका समाचार से कहा, “दशकों से संयुक्त राष्ट्र संघ कश्मीर में हिंसा पर चुप रहा है और अब वह सिरिया में हिंसा पर चुप है। हमारा शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन विश्व मंचों के लिये एक सन्देश है कि मानवता के विरुद्ध अपराध करनेवालों पर कड़ी कार्रवाई की जाये।”


(Juliet Genevive Christopher)

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