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विवेकपूर्ण एवं अजेय हथियार प्रेम है जो विश्वास द्वारा प्रेरित होता

In Church on March 17, 2018 at 3:44 pm


सन जोवन्नी रोतोनदो, शनिवार, 17 मार्च 18 (रेई)˸ संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 17 मार्च को सन जोवन्नी रोतोंदो की एक दिवसीय प्रेरितिक यात्रा पर पियेत्रेलचिना के संत पियो को समर्पित गिरजाघर के प्राँगण में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने प्रवचन में संत मती रचित सुसमाचार पर चिन्तन करते हुए तीन मुख्य विन्दुओं पर प्रकाश डाला ˸ प्रार्थना, दीनता एवं प्रज्ञा।

प्रार्थना पर चिन्तन करते हुए संत पापा ने कहा, ̎ आज का सुसमाचार येसु को प्रार्थना करते हुए प्रस्तुत करता है। उनके हृदय से ये शब्द निकलते हैं, ̎ पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरी स्तुति करता हूँ….। ̎ संत पापा ने कहा कि येसु अपनी प्रार्थना में पिता के साथ वार्तालाप को प्राथमिकता देते हैं। इस तरह शिष्यों ने स्वतः पाया कि प्रार्थना कितना महत्वपूर्ण है अतः उन्होंने एक दिन उनसे पूछा, ̎प्रभु हमें प्रार्थना करना सिखलाइये। (लूक. 11: 1) संत पापा ने विश्वासियों से कहा कि यदि हम येसु का अनुसरण करना चाहते हैं तो हम भी वहीं से शुरू करें जहाँ उन्होंने किया, अर्थात् प्रार्थना से।

हम अपने आप से पूछ सकते हैं, क्या हम पर्याप्त प्रार्थना करते हैं? बहुधा प्रार्थना के समय, कई बहाने और आवश्यक चीजें हमारे मन में आ जाते हैं, तब हम प्रार्थना को दरकिनार कर देते हैं, इस तरह हम उत्तम भाग को छोड़ देते हैं। हम भूल जाते हैं कि उनके बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते। संत पियो स्वर्ग चले जाने के 50 सालों बाद भी हमारी मदद करते हैं क्योंकि वे हमारे लिए विरासत में प्रार्थना को छोड़ना चाहते हैं। वे हमें सलाह देते हैं कि हम बहुत प्रार्थना करें, निरंतर प्रार्थना करें तथा प्रार्थना से कभी न थकें।

सुसमाचार में येसु हमें दिखाते है कि हमें किस तरह प्रार्थना करनी चाहिए। सर्वप्रथम वे कहते हैं, ̎ पिता मैं तेरी स्तुति करता हूँ।̎ वे नहीं कहते कि मुझे ये चाहिए अथवा वो चाहिए बल्कि उनकी स्तुति करते हैं। उनकी स्तुति हेतु अपने को खोले बिना हम पिता को नहीं जान सकते, उनके लिए समय दिये बिना, उनकी आराधना किये बिना हम उन्हें नहीं पहचान सकते हैं। प्रार्थना एक व्यक्तिगत सम्पर्क है, उनके साथ आमने- सामने होना है, एकान्त में प्रभु के सम्मुख आने पर हम उनके साथ संयुक्ति में बढ़ते हैं। प्रार्थना एक अर्जी के रूप में उत्पन्न होता है किन्तु स्तुति एवं अराधना में परिपक्व हो जाता है। इस प्रकार यह सचमुच व्यक्तिगत हो जाता है जैसा कि येसु के लिए था जो मुक्त रूप से पिता से बातचीत करते थे, ̎ हाँ, पिता यही तुझे अच्छा लगा।̎  (मती. 11,26) इस तरह मुक्त एवं भरोसापूर्ण बातचीत हमारे जीवन को कृपाओं से भरता तथा हमें ईश्वर के करीब लाता है।

संत पापा ने आत्म जाँच के लिए प्रेरित करते हुए कहा, ̎ क्या हमारी प्रार्थना येसु की प्रार्थना के समान है अथवा क्या हमने उसे यदाकदा मात्र एमरजेंसी कॉल तक सीमित कर दिया है? अथवा क्या हमने उसे अपने आपको शांत करने का नियमित साधन बना दिया है ताकि हम परेशानियों से राहत पा सकें? नहीं, प्रार्थना एक प्रेम का भाव है। यह येसु के साथ होना है आध्यात्मिक दया का एक अपरिहार्य कार्य है। यदि हम अपने भाई-बहनों की परिस्थितियों को प्रभु के पास नहीं लायेंगे तो कौन लायेगा? जरूरतमंद लोगों के लिए प्रभु का द्वार कौन खटखटायेगा। यही कारण है कि संत पियो ने प्रार्थना के दलों को हमारे लिए दिया है। उन्होंने उनसे कहा था, ̎ यह प्रार्थना ही है जो भली आत्माओं की संयुक्त शक्ति है जो दुनिया को बदल सकती है, जो अंतःकरण को नवीकृत कर सकती है जो रोगियों को चंगा करती, कार्यों को पवित्र करती, स्वास्थ्य सेवा को बढ़ाती एवं नैतिक शक्ति प्रदान करती है। यह ईश्वर की मुस्कान को फैलाती तथा हर व्यक्ति को आशीर्वाद देती है। संत पापा ने पुनः अपने आप से पूछने के लिए प्रेरित कर कहा कि क्या मैं प्रार्थना करता हूँ? अपनी प्रार्थना में क्या मैं स्तुति कर सकता हूँ? क्या मैं उनकी अराधना कर सकता एवं अपना जीवन प्रभु के पास ला सकता हूँ?

संत पापा ने दूसरे बिन्दू दीनता पर चिंतन करते हुए कहा, ̎ सुसमाचार में येसु पिता की स्तुति करते हैं जिसमें वे उनके राज्य के रहस्य को प्रकट करते हैं जो दीन-हीन लोगों के लिए है।̎ उन्होंने कहा कि येसु ईश्वर के रहस्यों का स्वागत करना जानते हैं। छोटे लोगों को बड़े लोगों की आवश्यकता होती है क्योंकि वे आत्मनिर्भर नहीं होते। छोटे लोग विनम्र, उदार, गरीब और जरूरतमंद होते हैं जो प्रार्थना करने की आवश्यकता महसूस करते और अपने आप को समर्पित कर एवं सहारा दिये जाने की अवश्यकता महसूस करते हैं। इन छोटे लोगों का हृदय एंटीना के समान होता है जो ईश्वर के सिगनल को पकड़ते हैं क्योंकि ईश्वर सभी के साथ सम्पर्क करना चाहते हैं और इसमें जो बड़ा हो जाता है वह बाधा उत्पन्न करता है। जब एक व्यक्ति अपने आप में पूर्ण महसूस करता है तो उसमें ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। अतः येसु छोटे लोगों को पसंद करते हैं वे उन्हें अपने आप को प्रकट करते हैं। उनके साथ मुलाकात करने के लिए छोटा बनने की आवश्यकता है अपनी आवश्यकताओं को पहचानना है। येसु का रहस्य जिसको हम पवित्र परमप्रसाद में देखते हैं वह छोटा बनने का रहस्य है, विनम्र प्रेम का और जिसको हम छोटे बन कर एवं छोटों के साथ रहकर ही समझ सकते हैं।

संत पापा ने कहा कि क्या हम जानते है कि प्रभु को किस तरह खोजना है? वे किस तीर्थस्थल में रहते हैं। संत पियो कहते हैं, प्रार्थना का मंदिर जहाँ सभी लोग प्रेम के भंडार बनने के लिए बुलाये गये हैं, यह पीड़ा से राहत का घर है। जो व्यक्ति रोगी में येसु को पाता है तथा पड़ोसियों के घावों पर पट्टी बांधता है, जो बच्चो की देखभाल करता एवं नष्ट करने की संस्कृति से बचता है वह मृत्यु के विरूद्ध जीवन की घोषण करता है।

तीसरा बिन्दु प्रज्ञा पर प्रकाश डालते हुए संत पापा ने कहा कि सच्ची प्रज्ञा महान क्षमताओं में नहीं होता तथा सच्चा बल सत्ता से प्राप्त नहीं होता। जो लोग अपने को शक्तिशाली मानते हैं तथा बुराई का उत्तर बुराई से देते हैं वे बुद्धिमान नहीं हो सकते। विवेकपूर्ण एवं अजेय हथियार प्रेम है जो विश्वास द्वारा प्रेरित होता है क्योंकि इसमें बुराई को अस्त्रहीन करने की शक्ति है। संत पियो ने बुराई के साथ बुद्धिमता से जीवनभर संघर्ष किया। प्रभु के समान दीन और आज्ञाकारी बनकर, क्रूस के साथ, प्रेम के लिए अपना दुःख अर्पित किया। सभी लोग उनकी ओर आकर्षित हुए किन्तु कुछ ही लोगों ने उनका अनुकरण किया। ख्रीस्तीय जीवन पसंद करना मात्र नहीं है बल्कि एक कृपा है। जीवन तभी खुशबू बिखेरता है जब यह एक उपहार के रूप में अर्पित किया जाता है। उसके विपरीत जब उसे अपने लिए रखा जाता है तो यह फीका पड़ जाता है। संत पियो ने अपना जीवन अर्पित किया एवं भाई-बहनों को प्रभु से मिलाने के लिए घोर कष्ट सहा। जिसके लिए उन्होंने मेल-मिलाप संस्कार का सहारा लिया। यहीं उनके विवकपूर्ण जीवन की शुरूआत होती है जहाँ प्रेम एवं क्षमा हैं वहीँ हृदय की चंगाई शुरू होती है। पाद्रे पियो पाप स्वीकार संस्कार के प्रेरित थे। वे हमें आज भी निमंत्रण देते हैं और पूछते हैं कि हम कहाँ जा रहे हैं, प्रभु की ओर अथवा उदासी की ओर? संत पापा ने कहा कि प्रभु हमारा इंतजार कर रहे हैं। ऐसा कोई की कारण नहीं है जो हमें उनकी दया को प्राप्त करने से रोक सकता है।

संत पापा ने प्रार्थना, दीनता एवं प्रज्ञा को प्रतिदिन प्राप्त करने के लिए प्रभु से कृपा की याचना करने का परामर्श दिया।


(Usha Tirkey)

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संत पापा ने पादरे पीयो के अस्पताल में बीमार बच्चों से मुलाकात की

In Church on March 17, 2018 at 3:43 pm

संत जोवान्नी रोतोंदो, शुक्रवार 17 मार्च 2018 (रेई) : संत पापा फ्राँसिस संत पीयो के स्टिगमाटा (दिव्य घाव) के प्रकट होने के सौंवी वर्षगांठ और उनकी पचासवीं पुण्यतिथि के अवसर पर शनिवार 17 मार्च को  पियेत्रेलचिना और जोवान्नी रोतोंदों का दौरा किया।

संत जोवान्नी रोतोंदो में संत पादरे पियो ने “कासा सोलिएवो देल्ला सोफरेंजा” (दुःख निवारण गृह) नामक अस्पताल की स्थापना की, जो पादरे पीयो का अस्पताल के नाम से भी जाना जाता है। यह इटली में सबसे उन्नत चिकित्सा सुविधाओं में से एक है।

अपनी यात्रा के दौरान संत पापा फ्राँसिस ने संत जोवान्नी रोतोंदो में अस्पताल के कैंसर पीड़ित बच्चों के वार्ड का दौरा किया। गरीबों, हाशिए पर और कमजोर व लाचार लोगों तक पहुंचने की अपनी अतृप्त इच्छा में, उन्होंने कमजोर और छोटे बीमार बच्चों का आलिंगन किया, उन्हें पुचकारा और बच्चों के साथ कुछ समय बिताया। संत पापा ने बच्चों के माता पिता को सांत्वना दी। वार्ड के कर्मचारियों और नर्सों के साथ बातें की।


(Margaret Sumita Minj)

पियेत्रेलचिना के पियाना रोमाना प्रांगण में ख्रीस्तीयों को संत पापा का संदेश

In Church on March 17, 2018 at 3:41 pm


पियेत्रेलचिना, शुक्रवार 17 मार्च 2018 (रेई) : पियेत्रेलचिना के संत पीयो के स्टिगमाटा (दिव्य घाव) के प्रकट होने के सौंवी वर्षगांठ और उनकी पचासवीं पुण्यतिथि के अवसर पर संत पापा फ्राँसिस शनिवार 17 मार्च को सुबह 8 बजे संत पापा हेलीकॉप्टर से पियेत्रेचिना पहुचें। पहले “संत फ्राँसिस” प्रार्थनालय में पाद्रे पीयो के स्टिगमाटा के ताबुत के सामने कुछ देर मौन प्रार्थना की। उसके बाद पियाना रोमाना प्रार्थनालय के प्रांगण में विश्वासियों से मुलाकात की।

संत पापा ने कहा,“ मुझे इस पवित्र भूमि में कदम रख पाने की बहुत खुशी है यहाँ फाँसिस फोरजोने का  जन्म हुआ था, इसी भूमि में उन्होंने प्रार्थना करना सीखा, गरीबों में येसु को पहचाना और येसु की सेवा में उन्होंने कपुचिन फ्रायर माइनर धर्मसमाज में प्रवेश कर पियेत्रेलचिना के पादरे पीयो बन गये। यह वही स्थान है जहाँ उन्होंने माता कलीसिया को एक बेटे के रुप में प्रेम करना शुरु किया। उन्होंने माता कलीसिया को उनकी सभी कमजोरियों, पापों और समस्याओं के बावजूद प्रेम किया। ईश्वर की आत्मा पापी कलीसिया को पवित्र बनाती है। उन्होंने प्रभु और कलीसिया को बहुत प्रेम किया। संत पौलुस के समान उन्होंने भी इस रहस्य पर विशवास किया,“मैं मसीह के साथ क्रूस पर मर गया हूँ। मैं जीवित नहीं रहा, बल्कि मसीह मुझमें जीवित हैं। (गलाति, 2,20)

संत पापा ने कहा,“संत फ्राँसिस के इस शिष्य को सम्मान के साथ याद करते हुए मैं इस धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष फेलीचे अक्रोका, पल्ली पुरोहित, महापौर महोदय, कपुचिन सनुदाय के सभी पुरोहितों और पल्ली वासियों का सस्नेह अभिवादन करता हूँ।

संत पापा ने कहा,“आज जिस धरती पर हम खड़े हैं संत पीयो 1911 में बीमारी के कारण स्वास्थय लाभ पाने हेतु अपनी जन्म भूमि लौटे थे। जिससे कि अपने पसंद की चाजों का सेवन कर सके और खुली हवा में रहकर जल्द ही उनके स्वास्थ्य में सुधार हो। उनके लिए अपना गाँव लौटना एक तरह से तकलीफ दायक था। उन्हें डर था कि वे परीक्षा में न पड़ जायें। शैतान उन्हें अपने फंदे में न डाल दे।

संत पापा ने उपस्थित विश्वसियों से कहा,“क्या आप विश्वास करते हैं कि शैतान मौजूद है?”

उन्होने कहा, “जी हाँ ”

संत पापा ने कहा, “हाँ शैतान हमें परीक्षा में डालता है, हमें धोखा देने की कोशिश करता है। पादरे पीयो भी डरते थे कि कहीं शैतान उनपर हमला ना कर बैठे। धोखे से अपने चंगुल में न फंसा ले। उन्होंने प्रधान पुरोहित साल्वातोरे पन्नुल्लो को पत्र लिखकर अपने भय और मन में उठ रहे भावों को प्रकट कर उनसे सलाह मांगी थी। (पत्र संख्या 57) अपने जीवन के भयानक क्षणों में भी पादरे पीयो ने निरंतर प्रार्थना की और ईश्वर में अपने विश्वास को बनाये रखा। उन्होंने अनुभव किया कि वे येसु की बाहों में हैं और शैतान ने उसे छोड़ दिया है। पर उससे कहा जाता था कि वह उदास है, वह बीमार है शायद उसे कुछ समस्या है इसपर उन्होंने मार्च 1911 में धर्मप्रांतीय अधिकारी फादर बेनेदिक्त को अपनी स्थिति के बारे एक पत्र में इस प्रकार लिखा कि वे सुबह में पवित्र संस्कार में प्रभु से मिलने के पहले एक प्रकार की अनोखी शक्ति का अनुभव करते थे और प्रभु के शरीर को ग्रहण करने के बाद भी प्रभु के लिए भूख और प्यास बढ़ती ही जाती थी।(पत्र संख्या 31) पादरे पीयो पवित्र यूखारिस्त समारोह के दौरान येसु की साक्षात उपस्थिति का अनुभव करते थे। अतः प्रभु ने उनके शरीर में अपने दुखभोग के रहस्य का दिव्य घाव उपहार में दिया।

संत पापा ने संत पादरे पीयो का अनुसरण करने हेतु प्रेरित करते हुए कहा,“पेत्रेलचिना के भाईयो और बहनो, आप सभी इस महान संत का अनुसरण कर ईश्वर के प्रेम का साधन बनें। समाज के कमजोर और बीमार लोगों के बीच आप भी ईश्वर के प्रेम का साक्ष्य दें। आप एकता में रहकर शांति की स्थापना के लिए काम करें। एक दूसरे से प्रेम भाव रखें। वह देश जहाँ लोग आपस में झगड़ते रहते हैं वह देश उन्नति नहीं कर सकता। वहाँ दुख ही दुख है। संत पापा ने कहा,“आप लड़ाई-झगड़े में बेकार ही अपनी शक्ति खर्च न करें। इससे किसी को फायदा नहीं होता, उलटे देश कमजोर होता है।”

संत पापा ने कहा कि इस वर्तमान समय में संत पीयो की शिक्षा हमें जीवन के नये आयाम की ओर प्रेरित करता है। विशेषकर इस क्षेत्र के युवा जो काम की खोज में देश के अन्य भागों में चले गये हैं और इस क्षेत्र का आबादी कम होती जा रही है। हम प्रार्थना करें कि माता मरियम इस धरती में भी युवाओं को काम पाने में सहायता करें। सत पापा ने युवाओं को संबोधित कर कहा कि बुजुर्ग हमारे समाज के खजाने हैं उन्हें अकेला न छोड़ें। उन्हें दर किनार न करें। संत पापा ने हास्यप्रद लहजे में कहा कि यहाँ आने से कुछ देर पहले उन्हें 97 और 99 वर्षीय सुन्दर युवतियों से मुलाकात करने की खुशी मिली। बुजुर्ग हमारे देश और समाज के अतुलनीय विरासत हैं।

अंत में संत पापा ने संत पादरे पीयो के पदचिन्हों पर चलते हुए, इस भूमि की पवित्रता को बरकरार रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि वे उदारता के कार्यों द्वारा अपने दैनिक जीवन को खुशी के साथ पूरी तरह से जीयें। माता मरियम जिन्हें वे “स्वतंत्रता की माता मरियम” कहते हैं उन्हें पवित्रता के मार्ग पर चलने की खुशी प्रदान करें।

संत पापा ने अपने लिए प्रार्थना की मांग करते हुए उनसे विदा ली।


(Margaret Sumita Minj)

करुणा के महान संत पाद्रे पियो

In Church on March 17, 2018 at 3:39 pm

सन जोवान्नी रोतोनदो, शनिवार, 17 मार्च 2018 (वाटिकन न्यूज)˸ करुणा के महान संत पाद्रे पियो के निधन की 50वीँ बरसी एवं उनके स्तीगमता (दिव्य घाव) के 100 साल पूरा होने पर, संत पीयो के सम्मान में संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 17 मार्च को संत जोवन्नी रोतोनदो की प्रेरितिक यात्रा की।

पाद्रे पियो के नाम से प्रसिद्ध संत पियो एक आधुनिक कापुचिन संत हैं। लोग उनका अत्यधिक सम्मान करते हैं क्योंकि उनका विश्वास बहुत गहरा था और वे एक आज्ञाकारी, प्रार्थनामय व्यक्ति थे। वे प्रभु के सेवक माने जाते हैं जिन्होंने बहुत अधिक दुःख सहा जिसमें उनका दिव्य घाव भी शामिल है।

कपुचिन फादर ब्रैन शोर्टाल के अनुसार उन्होंने इसलिए बहुतों का हृदय जीत लिया था क्योंकि ̎ वे लोगों तक पहुँचते थे।̎ उन्होंने बतलाया कि 1918 में पाद्रे पियो ने पवित्र घाव का पहली बार अनुभव किया था जो पचास सालों तक बना रहा। प्रथम विश्व युद्ध के एक साल बाद उनके पवित्र घाव की बात इटली में एवं दूसरी जगहों में फैलने लगी किन्तु अपनी प्रसिद्धि बढ़ने पर भी वे साधारण एवं प्रार्थनामय व्यक्ति बने रहे। उन्हें कई बार पूछा गया कि वे कौन हैं तब उनका जवाब होता था कि वे एक गरीब धर्मबंधु हैं जो प्रार्थना करता है किन्तु प्रभु की योजना अलग थी।

फादर शोर्टाल ने बतलाया कि ̎वे हर दिन प्रभु के क्रूस पर चढ़ते थे तथा प्रत्येक दिन शारीरिक पीड़ा एवं अकेलापन महसूस करते थे जैसा कि ख्रीस्त ने क्रूसित किये जाने पर महसूस किया था। इस प्रकार उनके विश्वास की परीक्षा ली गयी एवं अपने विश्वास के लिए उन्हें बहुत अधिक दुःख उठाना पड़ा किन्तु वे धीर बने रहे। उन्होंने प्रार्थना कभी नहीं त्यागा।

पाद्रे पियो के पदचिन्हों पर चलते हुए संत पापा फ्राँसिस पेत्रेलचिना गये जहाँ पाद्रे पियो बढ़े, उसके बाद वे सन जोवन्नी रोतोन्दो की ओर रवाना हुए जहाँ उन्होंने ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

दो साल पहले संत पापा फ्राँसिस ने करुणा के असाधरण जयन्ती वर्ष में उनके पवित्र अवशेष का संत पेत्रुस महागिरजाघर में स्वागत किया था। कपुचिन फादर के अनुसार ये दोनों ही अवसर संत पियो को करुणा के मिशनरी के रूप में प्रचार करना है, उन्हें ख्रीस्त के सच्चे सेवक तथा उनके लिए दुःख सहने वाले पुरोहित के रूप में प्रकट करना है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सन जोवन्नी रोतोन्दो एवं पेत्रोलचिना की यात्रा के द्वारा संत पापा पाद्रे पियो के महान प्रेम को स्वीकार करना चाहते हैं।

पाद्रे पियो का निधन सन् 1958 में 81 वर्ष की आयु में हुआ जो अब पच्चास साल हो चुका है फिर भी हम उनसे क्या सीख सकते हैं, इस पर फादर शोर्टाल ने कहा कि उनकी विरासत है कि पीड़ा बेकार नहीं जाती। येसु उन लोगों को अनदेखा नहीं करते जो दुःख सहते हैं। ईश्वर पीड़ितों की ओर से आँखें बंद नहीं कर लेते बल्कि उनके साथ रहते हैं क्योंकि उन्होंने स्वयं क्रूस पर दुःख सहा है। वे हमें प्रोत्साहन देते हैं कि हम दुःखों से न डरें किन्तु अपनी आस्था प्रभु पर बनाये रखें।

ख्रीस्तयाग के उपरांत अपनी एक दिवसीय प्रेरितिक यात्रा समाप्त कर संत पापा फ्राँसिस वाटिकन लौटेंगे।

कपुचिन धर्मसमाज में प्रवेश करने के बाद जब पाद्रे पियो 16 साल के थे उन्होंने बीमारी के साथ संघर्ष किया। एक युवा पुरोहित के रूप में उन्हें दूसरो के लिए उन्हें शारीरिक एवं नैतिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों के लिए एक चैपलिन के रूप में उन्हें अपने हाथ में पीड़ा का साक्ष्य देना पड़ा।

1918 में उन्होंने शारीरिक चिन्ह स्टिगमटा प्राप्त किया जो उनकी प्रार्थना के प्रत्युत्तर के रूप में था। पाद्रे पियो स्वयं कहते हैं कि इसेक लिए उन्हें लगातार दर्द होता था।

पाद्रे पियो पाप-स्वीकार संस्कार के द्वारा ईश्वर की करुणा एवं दया को पश्चतापी लोगों के लिए प्रदान करने हेतु घंटो व्यतीत करते थे।

पाद्रे पियो ने कहा था, ̎ मैंने प्रभु से एक समझौता किया है कि जब मेरी आत्मा शोधकाग्नि की ज्वाला से शुद्ध हो जाएगी और स्वर्ग में प्रवेश करने के योग्य हो जाएगी, मैं स्वर्ग के द्वारा पर तब तक खड़ा रहूँगा जब तक कि मैं अपने अंतिम बेटे, बेटियों को प्रवेश करते न दे लूं।̎

पाद्रे पीयो लोगों को आध्यात्मिक के साथ-साथ शारीरिक सहायता प्रदान करना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने एक अस्पताल की स्थापना करने का स्वप्न देखा था। उनका स्वप्न 1956 में साकार हो गया जब सन जोवन्नी रोतोन्दो में ̎कासा सोल्लियेवो देल्ला सोफ्रेंत्सा ̎ नामक एक अस्पताल की स्थापना की गयी।

पाद्रे पियो ने अस्पताल के संबंध में अपनी कल्पना को बतलाया था कि यह उस स्तर तक बढ़ेगा जहाँ तकनीकी रूप से उत्तम चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध की जा सकेंगी।

उनकी सोच थी कि यह प्रार्थना एवं विज्ञान का स्थल होगा जहाँ मानवजाति क्रूसित ख्रीस्त में ही अपना एक मात्र चरवाहा प्राप्त करेगी।

आज अस्पताल में 1000 पलंग की सुविधा उपलब्ध है और जहाँ देश और विदेश के लोग भी चंगाई पाने के लिए आते हैं।


(Usha Tirkey)

प्रेम में आशा

In Church on March 17, 2018 at 3:38 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 17 मार्च 2018 (रेई)˸ जहाँ प्रेम है वहीं आशा जगती है किन्तु प्रेम त्याग की मांग करता है। संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 17 मार्च को एक ट्वीट प्रेषित कर त्याग करने हेतु प्रोत्साहन दिया।

उन्होंने संदेश में लिखा, ̎येसु ने अपने को गेंहूँ के दाने के समान बनाया जो भूमि पर गिरता और जीवन देने के लिए मर जाता है। हमारी आशा उसी प्रेम भरे जीवन से प्रस्फूटि होती है।̎


(Usha Tirkey)

आज्ञाकारिता ख्रीस्तीय जीवन को एक साथ मिलाये रखती है

In Church on March 17, 2018 at 3:37 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 17 मार्च 2018 (वीआर,रेई) :  वाटिकन में  संत पापा और रोमन कूरिया के अधिकारियों के लिए चालिसे के चौथे सप्ताह के शुक्रवार 15 मार्च को उपदेशक फादर कांतालामेस्सा ने ख्रीस्तीय जीवन में आज्ञाकारिता की महता पर प्रकाश डाला।

फादर रानिएरो कांतालामेस्सा ने रोमियों के नाम संत पौलुस के पत्र में प्रस्तुत किये गये आज्ञाकारिता पर चिंतन किया जो कहता है कि “हर व्यक्ति को शासन अधिकारियों के अधीन रहना चाहिए।”

सुसमाचार में आज्ञाकारिता

फादर कांतालामेस्सा ने कहा कि संत पौलुस और येसु के अन्य चेले, जो उस व्यक्ति के पीछे चल रहे थे जिसका “राज्य इस दुनिया का नहीं था।” उन्होंने यह समझना शुरु किया कि देश के कानूनों को मानने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और व्यापक था सुसमाचार की आज्ञाकारिता। हर प्रकार की ख्रीस्तीय आज्ञाकारिता मनुष्य पर नहीं अपितु ईश्वर पर आधारित होना चाहिए।

फादर ने मकड़ी का उदाहरण देते हुए कहा कि मकड़ी अपना जाल बुनने के लिए सबसे पहले मुख्य धागा को मजबूत बनाती है और उसी पर केंद्र बनाते हुए वह चारों ओर जाल बुनती है। बीच का धागा टूट जाता है तो वह उसे पुनः बुन लेती है पर अगर मुख्य धागा टूट जाता है तो मकड़ी अपने बुने हुए घर को छोड़कर नया घर बनाना शुरु कर देती है। यह बात कलीसिया और मानवीय समुदाय में आज्ञाकारिता के लागू होती है।

मसीह की आज्ञाकारिता

फादर कांतालामेस्सा ने येसु की आज्ञाकारिता की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि सुसमाचार में येसु को “आज्ञाकारी” कहा गया है। संत पौलुस कहते है कि उनकी आज्ञाकारिता हमें धर्मी बना देता है। येसु “मृत्यु तक आज्ञाकारी बने रहे।” (सीएफ फिलिपियों 2: 8), और “उन्होंने पीड़ा सहन द्वारा आज्ञाकारिता सीखा” (इब्रानियों 5: 8) फादर ने कहा, हमें “आज्ञाकारिता के इस अधिनियम की प्रकृति” को भी समझना चाहिए। यह “आदम की अवज्ञा के विपरीत है …। सभी आज्ञाओं के उलंघन की उत्पत्ति ईश्वर के प्रति अवज्ञा है और सभी आज्ञाकारिता की उत्पत्ति ईश्वर के प्रति आज्ञाकारिता है।”

आज्ञाकारी मसीह उन सभी के प्रधान हैं जो आज्ञाकारिता का चयन करते हैं और इसके विपरीत आदम उनके प्रधान हैं जो अवज्ञा करते हैं। संत पौलुस कहते हैं कि हमने बपतित्मा संस्कार में स्वतंत्र रुप से ख्रीस्त की अधीनता स्वीकार की है। अतः बपतिस्मा के साथ ही हमारे जीवन में परिवर्तन आया। “बपतिस्मा के साथ स्वामियों में परिवर्तन, राज्यों में परिवर्तन, पाप से धर्म की ओर, अवज्ञा से आज्ञाकारिता की ओर तथा आदम से मसीह में परिवर्तन।”

दैनिक जीवन में आज्ञाकारिता

ख्रीस्तीय जीवन में आज्ञाकारिता एक अनिवार्य अंग है। स्तोत्र संख्या 40 में हम पाते हैं कि प्रतिदिन हम आज्ञाकारिता का पालन कर सकते हैं। इब्रानियों के पत्र में लेखक येसु के मुँह से इस स्तोत्र को उचरित कराता है,”जैसा कि पुस्तक में मेरे बारे में लिखा गया है, देखो, मैं आपकी इच्छा पूरी करने के लिए आया हूँ, हे ईश्वर।” (इब्रा 10: 7) फादर ने कहा, “अब हमारी बारी है,” हे ईश्वर मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ “इन शब्दों के बैनर के तले हम अपना सारा जीवन व्यतीत कर सकते हैं। किसी नये कार्य को करने से पहले या किसी सभा में जाने से पहले हम अपने आप से कहें, “हे ईश्वर मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ।”


(Margaret Sumita Minj)

 

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