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आज्ञाकारिता ख्रीस्तीय जीवन को एक साथ मिलाये रखती है

In Church on March 17, 2018 at 3:37 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार, 17 मार्च 2018 (वीआर,रेई) :  वाटिकन में  संत पापा और रोमन कूरिया के अधिकारियों के लिए चालिसे के चौथे सप्ताह के शुक्रवार 15 मार्च को उपदेशक फादर कांतालामेस्सा ने ख्रीस्तीय जीवन में आज्ञाकारिता की महता पर प्रकाश डाला।

फादर रानिएरो कांतालामेस्सा ने रोमियों के नाम संत पौलुस के पत्र में प्रस्तुत किये गये आज्ञाकारिता पर चिंतन किया जो कहता है कि “हर व्यक्ति को शासन अधिकारियों के अधीन रहना चाहिए।”

सुसमाचार में आज्ञाकारिता

फादर कांतालामेस्सा ने कहा कि संत पौलुस और येसु के अन्य चेले, जो उस व्यक्ति के पीछे चल रहे थे जिसका “राज्य इस दुनिया का नहीं था।” उन्होंने यह समझना शुरु किया कि देश के कानूनों को मानने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और व्यापक था सुसमाचार की आज्ञाकारिता। हर प्रकार की ख्रीस्तीय आज्ञाकारिता मनुष्य पर नहीं अपितु ईश्वर पर आधारित होना चाहिए।

फादर ने मकड़ी का उदाहरण देते हुए कहा कि मकड़ी अपना जाल बुनने के लिए सबसे पहले मुख्य धागा को मजबूत बनाती है और उसी पर केंद्र बनाते हुए वह चारों ओर जाल बुनती है। बीच का धागा टूट जाता है तो वह उसे पुनः बुन लेती है पर अगर मुख्य धागा टूट जाता है तो मकड़ी अपने बुने हुए घर को छोड़कर नया घर बनाना शुरु कर देती है। यह बात कलीसिया और मानवीय समुदाय में आज्ञाकारिता के लागू होती है।

मसीह की आज्ञाकारिता

फादर कांतालामेस्सा ने येसु की आज्ञाकारिता की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि सुसमाचार में येसु को “आज्ञाकारी” कहा गया है। संत पौलुस कहते है कि उनकी आज्ञाकारिता हमें धर्मी बना देता है। येसु “मृत्यु तक आज्ञाकारी बने रहे।” (सीएफ फिलिपियों 2: 8), और “उन्होंने पीड़ा सहन द्वारा आज्ञाकारिता सीखा” (इब्रानियों 5: 8) फादर ने कहा, हमें “आज्ञाकारिता के इस अधिनियम की प्रकृति” को भी समझना चाहिए। यह “आदम की अवज्ञा के विपरीत है …। सभी आज्ञाओं के उलंघन की उत्पत्ति ईश्वर के प्रति अवज्ञा है और सभी आज्ञाकारिता की उत्पत्ति ईश्वर के प्रति आज्ञाकारिता है।”

आज्ञाकारी मसीह उन सभी के प्रधान हैं जो आज्ञाकारिता का चयन करते हैं और इसके विपरीत आदम उनके प्रधान हैं जो अवज्ञा करते हैं। संत पौलुस कहते हैं कि हमने बपतित्मा संस्कार में स्वतंत्र रुप से ख्रीस्त की अधीनता स्वीकार की है। अतः बपतिस्मा के साथ ही हमारे जीवन में परिवर्तन आया। “बपतिस्मा के साथ स्वामियों में परिवर्तन, राज्यों में परिवर्तन, पाप से धर्म की ओर, अवज्ञा से आज्ञाकारिता की ओर तथा आदम से मसीह में परिवर्तन।”

दैनिक जीवन में आज्ञाकारिता

ख्रीस्तीय जीवन में आज्ञाकारिता एक अनिवार्य अंग है। स्तोत्र संख्या 40 में हम पाते हैं कि प्रतिदिन हम आज्ञाकारिता का पालन कर सकते हैं। इब्रानियों के पत्र में लेखक येसु के मुँह से इस स्तोत्र को उचरित कराता है,”जैसा कि पुस्तक में मेरे बारे में लिखा गया है, देखो, मैं आपकी इच्छा पूरी करने के लिए आया हूँ, हे ईश्वर।” (इब्रा 10: 7) फादर ने कहा, “अब हमारी बारी है,” हे ईश्वर मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ “इन शब्दों के बैनर के तले हम अपना सारा जीवन व्यतीत कर सकते हैं। किसी नये कार्य को करने से पहले या किसी सभा में जाने से पहले हम अपने आप से कहें, “हे ईश्वर मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ।”


(Margaret Sumita Minj)

 

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