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संत पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उद्बोधन “गाउदेते एत एक्सुलताते” की प्रस्तावना

In Church on April 9, 2018 at 3:33 pm

वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (रेई) : सोमवार 09 अप्रैल को वाटिकन स्थित परमधर्मपीठीय प्रेस कार्यालय में पवित्रता विषय पर सन्त पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उदबोधन “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” अर्थात् खुश हो और हर्ष मनाओ को प्रस्तावित किया गया।

नवीन प्रेरितिक उदबोधन की प्रस्तावना हेतु आयोजित प्रेस सम्मेलन में रोम धर्मप्रान्त के प्रतिधर्माध्यक्ष आन्जेलो दे दोनातिस, इताली पत्रकार ज्यान्नी वालेन्ते तथा काथलिक एक्शन इटली नामक संस्था की पूर्वाध्यक्ष पाओला बिन्यार्दी पत्रकारों को सम्बोधित किया।

सन्त पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उदबोधन”गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” का संश्लेषण इस प्रकार है। “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” इस विचार समर्पित है कि पवित्रता का अर्थ येसु के पीछे चलना है।

हम वर्तमान में, दुनिया की धारा से विपरीत चलते हुए तथा धन्यताओं को जीते हुए संत बन सकते हैं। कलीसिया हमें सिखाती है कि हम संत बनने के लिए बुलाये गये हैं। कई संतों ने अपने जीनव द्वारा इस बात की साक्षी दी है कि “पवित्रता का जीवन” दया के जीवन से जुड़ा हुआ है। यह “स्वर्ग की कुँजी” है। इसलिए पवित्र या संत वही है जो गरीबों की मदद करता है। दूसरों के दुःखों को दूर करता है। जो पुरानी विरासत की भ्रांतियों और विधर्मों से बचता है, वह ‘त्वरित’ और आक्रमक दुनिया में आनंद और खुशी के साथ जीवन जी सकता है।

यह वास्तव में खुशी की भावना है कि संत पापा फ्राँसिस ने अपने अंतिम प्रेरितिक उदबोधन “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” अर्थात् ‘खुश हो और हर्ष मनाओ’ (मत्ती 5,12) शीर्षक का चुनाव किया है। वे उन शब्दों को दोहराते हैं जिन्हें येसु ने “उनके कारण सताए या अपमानित किए गए लोगों के लिए” संबोधित किया था। पांच अध्यायों और 44 पृष्ठों के दस्तावेज़ में, संत पापा ने महसूस किया है कि कलीसिया दुःख सहते हुए ख्रीस्त के दृश्यमान शरीर के करीब है। उनका कहना है कि 177 परिच्छेदों का प्रेरितिक उदबोधन पवित्रता पर कई परिभाषाओं और विशिष्टताओं का प्रकरण मात्र नहीं है बल्कि एक बार फिर से पवित्रता का आह्वान करने का तरीका है, इसके जोखिमों और चुनौतियों को दर्शाने का अवसर है।”(नंबर 2)

तीसरे अध्याय में, संत पापा फ्राँसिस प्रत्येक धन्यता को पवित्र मानने के रुप में समझाते हैं धन्यतायें हमें पवित्रता का अर्थ बताते हैं। साथ ही सुसमाचार हमें वो मानदंड दिखाता है, जिसके द्वारा हमारा न्याय होगा, “मैं भूखा था और तुमने मुझे खाना दिया … प्यासा था और तुमने मुझे पानी दिया … मैं एक अजनबी था और तुमने मेरा स्वागत किया … नंगा था और तुमने मुझे पहनाया … बीमार था और तुमने मेरी सेवा की … जेल में था और तुम मुभसे मिलने आये।

संत पापा फ्राँसिस चौथे अध्याय को “पवित्रता को बनाये रखने के कुछ पहलुओं” को समर्पित करते हैं जो कि उन्हें लगता है कि “आज की दुनिया में धीरज, धैर्य और नम्रता, खुशी और विनोद की भावना, साहस और जुनून, पवित्रता का सांप्रदायिक आयाम,  निरंतर प्रार्थना विशेष रूप से सार्थक साबित होगा।”

अंत में, प्रेरितिक उदबोधन पवित्रता को हासिल करने हेतु व्यावहारिक सुझाव देती है। संत पापा कहते हैं, “ख्रीस्तीय जीवन निरंतर लड़ाई है” “हमें शैतान की परीक्षाओं का सामना करने और सुसमाचार की घोषणा करने के लिए शक्ति और साहस की आवश्यकता है।”

पांचवें अध्याय में, वे “युद्ध” और सतर्कता की आवश्यकता के बारे में चर्चा करते हैं। आज मनन चिंतन और आत्मपरख बहुत जरुरी है। “संसार में इतनी सारी शक्तियाँ हैं जो हमें ईश्वर की आवाज़ सुनने से रोकती हैं।

संत पापा फ्राँसिस ने निष्कर्ष में कहा, “मेरी आशा है कि यह प्रेरितिक उदबोधन पवित्रता की इच्छा को बढ़ावा देने के लिए खुद को समर्पित करने हेतु पूरी कलीसिया को सक्षम बनाने में सहायक साबित होगा।”

 


(Margaret Sumita Minj)

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संत पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उद्बोधन “गाउदेते एत एक्सुलताते” से लिये गये ट्वीट संदेश

In Church on April 9, 2018 at 3:31 pm


वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (रेई) : वाटिकन स्थित परमधर्मपीठीय प्रेस कार्यालय ने सोमवार 9 अप्रैल को पवित्रता विषय पर सन्त पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उदबोधन “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” अर्थात् खुश हो और हर्ष मनाओ को प्रस्तावित किया। संत पापा फ्राँसिस ने अपने प्रेरितिक उद्बोधन “गाउदेते एत एक्सुलताते” से संदेश लेते हुए ट्वीट प्रषित किया।

उन्होंने संदेश में लिखा,“ मैं फिर से पवित्रता का आह्वान करने का अनुरोध करना चाहता हूँ, आनंदित हो और खुशियाँ मनाओ! ”

“ईश्वर हम प्रत्येक को पवित्र बनने के लिए बुलाते हैं, आपको भी।”

आगे संत पापा ने समर्पित और विवाहित लोगों को पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा देते हुए लिखा,“क्या आप समर्पित जीवन जीने के लिए बुलाये गये हैं? आनन्द के साथ अपनी वचनबद्धता को जीते हुए पवित्र बनें।”

“क्या आप विवाहित हैं? आप अपने पति या पत्नी से प्रेम करें, उनकी देखभाल करते हुए पवित्र बने रहें जैसे मसीह ने कलीसिया के लिए किया है।”

“क्या आप जीने के लिए काम करते हैं? अपने भाइयों और बहनों की सेवा में निपुणता और कौशल के साथ श्रमिक बनकर पवित्र बनें।”


(Margaret Sumita Minj)

ईश्वर को आज भी मरियम की तरह खुले दिल वालों की तलाश है,संत पापा फ्राँसिस

In Church on April 9, 2018 at 3:29 pm

वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (रेई) :  काथलिक कलीसिया आज प्रभु के शरीर धारण के संदेश का पर्व मनाती है। आज के दिन ईश्वर ने स्वर्गदूत गाब्रिएल को कुवांरी मरियम के पास मानव जाति के मुक्तिदाता को जन्म देने का संदेश देने हेतु भेजा। मरियम ने अपने सम्मति-वचन द्वारा गर्भ-धारण किया।

इस पर्व के दिन संत पापा ने सभी ख्रीस्तीयों को माता मरियम के मनोभाव को ग्रहण करने की प्रेरणा देते हुए अपने ट्वीट संदेश में लिखा,“ईश्वर को आज भी मरियम की तरह खुले दिल वालों की तलाश है जो पूरी तरह से उनपर भरोसा करने के लिए तैयार हैं।”

काथलिक कलीसिया  ने पास्का पर्व के अठवारे अर्थात 8 अप्रैल को ‘दिव्य करुणा रविवार’ मनाया। इस दिन संत पापा ने ट्वीट संदेश में लिखा, “ईश्वर ने हमें अपनी दया दिखायी है वे येसु ख्रीस्त के साथ हमें भी अपनी बाहों में लेते हैं जिससे कि हम उनकी तरह भलाई के साधन बन सकें।”


(Margaret Sumita Minj)

सीरिया में शांति हेतु संत पापा की अपील

In Church on April 9, 2018 at 3:25 pm

वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (वीआर,रेई) : संत पापा फ्राँसिस ने रविवार 8 अप्रैल दिव्य करुणा रविवार को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में हजारों की संख्या में देश-विदेश से आये तीर्थयात्रियों और विश्वासियों के साथ स्वर्ग की रानी की प्रार्थना का पाठ करने के पश्चात सीरिया वासियों के लिए विशेष प्रार्थना की अपील की।

संत पापा ने कहा, “आजकल सीरिया से बहुत ही दुःखद समाचार सुनने को मिल रही है। सीरिया में लगातार चल रही बमबारी की दर्जनों लोगों की मौत हुई है, उनमें से कई महिलाएं और बच्चे हैं। इसके अलावा, खबर मिली है कि वहाँ रासायनिक बम का प्रयोग किया गया है। आइये, हम उन सभी मृतकों, घायल लोगों और पीड़ित परिवारों के लिए प्रार्थना करें।”

आगे संत पापा ने कहा, “कोई भी अच्छा युद्ध या बुरा युद्ध नहीं है युद्ध तो विनाशकारी है और निहत्थे लोगों और आबादी के खिलाफ विनाश के ऐसे साधनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। रासायनिक हमलों के औचित्य को किसी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है।”

“राजनीतिक और सैन्य नेताओं द्वारा अन्य मार्ग का चयन करने के लिए प्रार्थना करें। मृत्यु और विनाश के साधनों से नहीं वरण वार्तालाप ही वह साधन है जो शांति ला सकता है।”

विदित हो कि शनिवार, 7 अप्रैल को नवीनीकृत हवाई हमलों ने दमास्कुस के निकट विद्रोहियों के कब्जे वाले शहर डौमा को तबाह कर दिया है। इन हमलों में “जहरीले क्लोरीन गैस” का उपयोग करने का आरोप राष्ट्रपति बाशर अल असद के प्रति वफादार बल पर लगाया था।


(Margaret Sumita Minj)

तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को संत पापा का अभिवादन

In Church on April 9, 2018 at 3:24 pm

 

वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (वीआर, रेई) : संत पापा फ्राँसिस ने रविवार 8 अप्रैल दिव्य करुणा रविवार को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में हजारों की संख्या में देश-विदेश से आये तीर्थयात्रियों और विश्वासियों के साथ युखारिस्तीय महासमारोह का अनुष्ठान करने के बाद स्वर्ग की रानी की प्रार्थना का पाठ करने के पहले वहाँ समारोह में उपस्थित सभी विश्वासियों का अभिवादन किया।

संत पापा ने युखारिस्तीय समारोह में सक्रिय भाग लेने के लिए सभी को धन्यवाद दिया। संत पापा ने विशेष रुप से दया के मिशनरी पुरोहितों का अभिवादन किया जो इन दिनों एक सेमिनार में भाग लेने रोम आये हुए हैं। संत पापा ने कहा, “आपकी सेवा के लिए धन्यवाद!”

संत पापा ने पूर्वी कलीसियाओं के ख्रीस्तीयों को जी उठे प्रभु येसु की शुभकामनायें दी जो पास्का पर्व की मना रहे हैं। ” जी उठे प्रभु उन्हें अपनी शांति और प्रकाश से भर दें और विशेष रूप से उन समुदायों को प्रभु सांत्वना दे जो कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं।”

अंतर्राष्ट्रीय रोमानी दिवस के अवसर पर, संत पापा  फ्राँसिस ने वहाँ उपस्थिति रोमा और सिन्तियों का स्वागत किया। “मैं उन लोगों के लिए शांति और सामंजस्य की कामना करता हूँ जो इन प्राचीन लोगों से तालुकात रखते है और आशा करता हूँ कि हर दिन एक दूसरे के बारे में जानने और एक-दूसरे को पारस्परिक रूप से सम्मान करने की अच्छी इच्छा से मुलाकात की संस्कृति को बढ़ावा मिले।”

गौरतलब है कि 1992 में अंतर्राष्ट्रीय रोमा संघ, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के प्रस्ताव पर 8 अप्रैल अंतर्राष्ट्रीय रोमा दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया। इस दिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रोमा पीड़ितों को दुनिया भर में श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। इस दिन को रोमानी संस्कृति के साथ मनाया जाता है और रोमानी लोगों के समक्ष आने वाली समस्याओं के प्रति जागरूक किया जाता है।

अंत में संत पापा ने उपस्थित सभी विश्वासियों को  करुणा की माता मरिया की छत्रछाया तले सिपुर्द करते हुए स्वर्ग की रानी की प्रार्थना का पाठ किया और अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

विदित हो कि विश्व के अनेक देशों से करीब 900 दया के मिशनरी सेमिनार में भाग लेने रोम आये हुए हैं। इनका सेमिनार 7 से 11 अप्रैल तक चलेगा। भारत से सलेशियन पुरोहित लियोन क्रूज भी इस सेमिनार भों भाग लेने आये हुए हैं। इन्हें 2017 में संत पापा फ्राँसिस ने दया के मिशनरी(एमओएम) के रूप में नियुक्त किया था।


(Margaret Sumita Minj)

ईश्वर के असीम प्रेम पर चिंतन करें, संत पापा

In Church on April 9, 2018 at 3:22 pm

वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (रेई)˸ वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में 8 अप्रैल को, दिव्य करुणा रविवार के अवसर पर संत पापा फ्राँसिस ने समारोही ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने संत योहन रचित सुसमाचार से लिए गये पाठ पर चिंतन करते हुए प्रवचन में कहा, “आज के सुसमाचार पाठ में हम बार बार “देखना” क्रिया को सुनते हैं। “शिष्य आनन्दित हो उठे जब उन्होंने प्रभु को देखा।” (यो.20.20) उन्होंने थोमस से कहा, “हमने प्रभु को देखा है।” (पद 25) संत पापा ने कहा किन्तु सुसमाचार यह नहीं बतलाता कि उन्होंने किस तरह उन्हें देखा। यह पुनर्जीवित प्रभु के बारे नहीं बतलाता बल्कि घटना की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करता है, उन्होंने “उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखाई।” मानो कि सुसमाचार हमें बतलाना चाहता हो कि शिष्य किस तरह उनके घावों के माध्यम से येसु को पहचान पाये। यही बात थोमस के साथ भी हुई। वह येसु के हाथों में कीलों के निशान देखना चाहता था और उसे देखने के बाद उसने विश्वास किया। (पद.27)

संत पापा ने थोमस की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा, “उसके विश्वास की कमी के बावजूद, हमें थोमस के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए क्योंकि वह दूसरों से सुनकर कि येसु जीवित हैं अथवा उनके शरीर को देखने मात्र से संतुष्ट नहीं था। वह अंदर देखना, अपने हाथों से उनके घावों का स्पर्श करना चाहता था जो उनके प्रेम के चिन्ह थे।”

संत पापा ने कहा कि हमारे लिए भी यह काफी नहीं है कि हम ईश्वर के अस्तित्व को जानें। ईश्वर जो पुनर्जीवित हैं किन्तु हमसे दूर हैं वे हमारे जीवन को भर नहीं सकते। हमें उन्हें देखने की जरूरत है हमारे हाथों से उनका स्पर्श करने तथा यह जानने की कि वे हमारे लिए जी उठे हैं।

हम किस तरह उन्हें देख सकते हैं? संत पापा ने कहा कि हम भी शिष्यों के समान उनके घावों के द्वारा उन्हें देख सकते हैं। उन घावों पर दृष्टि डालने के द्वारा शिष्यों ने उनके प्रेम के गहराई को समझा। उन्हें मालूम हो गया कि उन्हें क्षमा किया गया है यद्यपि उनमें से कुछ ने उन्हें अस्वीकार किया था एवं उन्हें त्याग दिया था।

येसु के घावों में प्रवेश करने का अर्थ है उनके असीम प्रेम पर चिंतन करना जो उनके हृदय से प्रवाहित होता है। यह एहसास करना कि उनके हृदय मेरे लिए, आपके लिए एवं सभी लोगों के लिए धड़कता है।

संत पापा ने कहा कि हम अपने को ख्रीस्तीय मान सकते हैं एवं विश्वास के सुन्दर मूल्यों की चर्चा कर सकते हैं किन्तु, हमें भी शिष्यों के समान येसु के प्रेम का एहसास करते हुए उन्हें देखने की आवश्यकता है। केवल इसी के द्वारा हम विश्वास के केंद्र में जा सकते हैं तथा शिष्यों के समान हर संदेह से मुक्त होकर शांति और आनन्द का अनुभव कर सकते हैं।

प्रभु के घावों के निशान को देखने के बाद थोमस बोल उठा, “मेरे प्रभु मेरे ईश्वर।” संत पापा ने थोमस द्वारा दुहराये गये सर्वनाम “मेरे” की व्यख्या करते हुए कहा कि यह एक सं‍बंधवाचक सर्वनाम है। जब हम इस पर विचार करते हैं तब यह हमें लग सकता है कि इसे ईश्वर के लिए प्रयोग करना उचित नहीं है। किस तरह ईश्वर मेरा हो सकता है। किस तरह मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर को अपना बना सकता हूँ? वास्तव में, मेरे कहने के द्वारा हम ईश्वर को अपवित्र नहीं करते बल्कि उनकी दया को सम्मानित करते हैं। क्योंकि ईश्वर हमारा होना चाहते हैं। जैसा कि हम प्रेम कहानी में उन्हें कहते हैं आप मेरे लिए मानव बन गये, मर गये एवं मेरे लिए जी उठे, इस तरह आप न केवल ईश्वर हैं किन्तु मेरे ईश्वर हैं आप मेरे जीवन हैं, आपमें मैंने जीवन पाया है, जिसकी खोज मैं कर रहा था।”

ईश्वर हमारे होने में अपमानित महसूस नहीं करते हैं बल्कि हमसे साहस की मांग करते हैं। वे दया के लिए भरोसा की आवश्यकता है। दस आज्ञाओं के आरम्भ में ही ईश्वर कहते हैं, “मैं तुम्हारा प्रभु ईश्वर हूँ” वे पुनः इसकी पुष्टि देते हुए कहते हैं, उन देवमूर्तियों को दण्डवत कर उनकी पूजा मत करो क्योंकि मैं प्रभु तुम्हारा ईश्वर ऐसी बातें सहन नहीं करता। (पद. 5). यहाँ हम देखते हैं कि ईश्वर अपने आपको एक ईर्ष्यालु प्रेमी की तरह प्रस्तुत करते हुए खुद कहते हैं, “तुम्हारा ईश्वर।” थोमस के अंतःस्थल से यही प्रत्युत्तर निकलता है, “मेरे प्रभु और मेरे ईश्वर।” आज, जब हम ख्रीस्त के घाव, उनके रहस्य पर चिंतन कर रहे हैं तब हम यह एहसास करते हैं कि दया केवल उनके सदगुणों में से एक नहीं है किन्तु उनके हृदय की धड़कन है। इसको जानने के बाद हम अन्य शिष्यों की तरह नहीं बल्कि थोमस की तरह प्रेम किये जाने का एहसास करते हैं और हम भी प्रभु से प्रेम करने लगते हैं। किस तरह हम उनके प्रेम का एहसास करें? आज, येसु की दया का स्पर्श हम किस तरह अपने हाथों से कर सकते हैं? सुसमाचार इसका संकेत देता है, जब यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि पास्का की संध्या, जी उठने के तुरन्त बाद, येसु पापों की क्षमा प्रदान करते हैं। प्रेम का एहसास करने के लिए हमें क्षमा किये जाने का एहसास करना आवश्यक है। हम अपने आप से पूछे कि क्या मैं क्षमा किये जाने के लिए तैयार हूँ? उस प्रेम का अनुभव करने के लिए हमें वहीं शुरूआत करने की आवश्यकता है। संत पापा ने कहा कि पाप स्वीकार संस्कार के लिए जाना हम में से कई लोगों के लिए कठिन लग सकता है, ईश्वर के सामने हम भी उस तरह के प्रलोभन में पड़ सकते हैं जिस तरह सुसमाचार में शिष्यों ने किया था। हम अपने को उनसे दूर रखने के लिए द्वार बंद कर सकते हैं। उन्होंने भय से ऐसा किया था, हम भी डर से अथवा अपना हृदय खोलने एवं अपने पापों को स्वीकार करने के शर्म से ऐसा करते हैं। ईश्वर हमें कृपा प्रदान करे कि हम लज्जा को समझ सकें, अपना द्वार बंद न करें किन्तु मुलाकात हेतु अपना पहला कदम उनकी ओर बढ़ायें। जब हम लज्जा महसूस करते हैं हमें कृतज्ञ होना चाहिए। इसका अर्थ है कि हम बुराई को स्वीकार नहीं करते बल्कि अच्छाई को अपनाते हैं। लज्जा आत्मा का एक गुप्त निमंत्रण है जिसके लिए प्रभु की आवश्यकता है ताकि बुराई पर विजय पा सकें। दुःखद बात तब होती है जब हम किसी चीज पर लज्जा नहीं रखते। संत पापा ने कहा कि हम लज्जा रखने से न डरें। हम लज्जा से क्षमाशीलता की ओर बढें।

संत पापा ने कहा कि एक दरवाजा ऐसा है जो प्रभु की क्षमाशीलता के सामने बंद रहता है परित्याग करने का द्वार। शिष्यों ने पास्का में अनुभव किया कि जब उन्होंने निराशा में येसु को पहचाना तब सब कुछ पहले की तरह हो गया। वे अब भी येरूसालेम में थे पूरी तरह निस्र्त्साहित। ऐसा लगा मानो उनके जीवन से येसु का अध्याय समाप्त हो गया। येसु के साथ बहुत अधिक समय व्यतीत करने के बाद भी कुछ नहीं बदला, उन्होंने परित्यक्त महसूस किया। हम भी सोच सकते हैं, “मैं लम्बे समय से ख्रीस्तीय हूँ किन्तु मुझ में कुछ नहीं बदला। मैं उन्हीं पापों में फिर पड़ जाता हूँ।” इस प्रकार हम निराश होकर दया को छोड़ देते हैं किन्तु प्रभु हममें परिवर्तन लाते हैं। क्या तुम विश्वास नहीं करते हो कि मेरी दया तुम्हारी दुर्दशा से बढ़कर है। संत पापा ने कहा, “क्या तुम एक पापी हो”? उन्होंने कहा, “यदि तुम एक पापी हो तो दया की याचना करने वाला पापी बनो और तुम देखोंगे कि कौन ऊपर आता है। जब भी हमें क्षमा मिलती है हमें सांत्वना एवं प्रोत्साहन भी प्राप्त होता है क्योंकि हरेक बार हम अधिक प्रेम किये जाने तथा पिता द्वारा आलिंगन किये जाने का एहसास करते हैं। जब हम फिर गिर जाते हैं हमें बहुत दुःख होता है क्योंकि हम प्रेम किये जाने का एहसास करते हैं यह दुःख हमें धीरे-धीरे पाप से दूर करता है। तब हम पाते हैं कि जीवन की शक्ति को खोजने का अर्थ है ईश्वर की क्षमाशीलता को स्वीकार करना। इसी तरह लज्जा से लज्जा एवं क्षमाशीलता से क्षमाशीलता द्वारा जीवन आगे बढ़ता है। यही ख्रीस्तीय जीवन है।

लज्जा और त्याग के बाद एक दूसरा बंद दरवाजा है। जब हम आत्मामारू पाप करते हैं हम पूरी ईमानदारी से अपने आपको क्षमा देते और अपने को ईश्वर से दूर रखते हैं। किन्तु यह द्वार सिर्फ हमारी ओर बंद है क्योंकि ईश्वर के लिए कोई भी द्वार पूरी तरह बंद नहीं होता। जैसा कि सुसमाचार हमें बतलाता है कि वे बंद द्वार में भी प्रवेश कर गये। वे हमें कभी नहीं छोड़ना चाहते हैं किन्तु हम उनसे दूर होना चाहते हैं। जब हम पाप स्वीकार करते हैं हम पाते हैं कि वही पाप जो हमें ईश्वर से दूर रखता था, ईश्वर से मुलाकात का स्थल बन जाता है। जहाँ वे हमारे प्रेम के खातिर घायल हुए ख्रीस्त हमारे घावों को देखने आते हैं। वे हमारे घावों को अपने घावों के समान सम्मानित बनाते हैं। इससे बदलाव आता है हमारे नीच घाव उनके महिमामय घावों के समान हो जाते हैं क्योंकि वे दयालु हैं तथा हमारे घावों में चमत्कार कर सकते हैं।

संत पापा ने सभी विश्वासियों का आह्वान किया कि हम प्रेरित संत थोमस के समान ईश्वर को पहचानने की कृपा की याचना करें ताकि उनकी क्षमाशीलता में द्वारा आनन्द तथा उनकी दया द्वारा आशा प्राप्त कर सकें।


(Usha Tirkey)

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