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संत पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उद्बोधन “गाउदेते एत एक्सुलताते” की प्रस्तावना

In Church on April 9, 2018 at 3:33 pm

वाटिकन सिटी, सोमवार, 9 अप्रैल 2018 (रेई) : सोमवार 09 अप्रैल को वाटिकन स्थित परमधर्मपीठीय प्रेस कार्यालय में पवित्रता विषय पर सन्त पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उदबोधन “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” अर्थात् खुश हो और हर्ष मनाओ को प्रस्तावित किया गया।

नवीन प्रेरितिक उदबोधन की प्रस्तावना हेतु आयोजित प्रेस सम्मेलन में रोम धर्मप्रान्त के प्रतिधर्माध्यक्ष आन्जेलो दे दोनातिस, इताली पत्रकार ज्यान्नी वालेन्ते तथा काथलिक एक्शन इटली नामक संस्था की पूर्वाध्यक्ष पाओला बिन्यार्दी पत्रकारों को सम्बोधित किया।

सन्त पापा फ्राँसिस के प्रेरितिक उदबोधन”गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” का संश्लेषण इस प्रकार है। “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” इस विचार समर्पित है कि पवित्रता का अर्थ येसु के पीछे चलना है।

हम वर्तमान में, दुनिया की धारा से विपरीत चलते हुए तथा धन्यताओं को जीते हुए संत बन सकते हैं। कलीसिया हमें सिखाती है कि हम संत बनने के लिए बुलाये गये हैं। कई संतों ने अपने जीनव द्वारा इस बात की साक्षी दी है कि “पवित्रता का जीवन” दया के जीवन से जुड़ा हुआ है। यह “स्वर्ग की कुँजी” है। इसलिए पवित्र या संत वही है जो गरीबों की मदद करता है। दूसरों के दुःखों को दूर करता है। जो पुरानी विरासत की भ्रांतियों और विधर्मों से बचता है, वह ‘त्वरित’ और आक्रमक दुनिया में आनंद और खुशी के साथ जीवन जी सकता है।

यह वास्तव में खुशी की भावना है कि संत पापा फ्राँसिस ने अपने अंतिम प्रेरितिक उदबोधन “गाउदेते एत एक्ज़ुलताते” अर्थात् ‘खुश हो और हर्ष मनाओ’ (मत्ती 5,12) शीर्षक का चुनाव किया है। वे उन शब्दों को दोहराते हैं जिन्हें येसु ने “उनके कारण सताए या अपमानित किए गए लोगों के लिए” संबोधित किया था। पांच अध्यायों और 44 पृष्ठों के दस्तावेज़ में, संत पापा ने महसूस किया है कि कलीसिया दुःख सहते हुए ख्रीस्त के दृश्यमान शरीर के करीब है। उनका कहना है कि 177 परिच्छेदों का प्रेरितिक उदबोधन पवित्रता पर कई परिभाषाओं और विशिष्टताओं का प्रकरण मात्र नहीं है बल्कि एक बार फिर से पवित्रता का आह्वान करने का तरीका है, इसके जोखिमों और चुनौतियों को दर्शाने का अवसर है।”(नंबर 2)

तीसरे अध्याय में, संत पापा फ्राँसिस प्रत्येक धन्यता को पवित्र मानने के रुप में समझाते हैं धन्यतायें हमें पवित्रता का अर्थ बताते हैं। साथ ही सुसमाचार हमें वो मानदंड दिखाता है, जिसके द्वारा हमारा न्याय होगा, “मैं भूखा था और तुमने मुझे खाना दिया … प्यासा था और तुमने मुझे पानी दिया … मैं एक अजनबी था और तुमने मेरा स्वागत किया … नंगा था और तुमने मुझे पहनाया … बीमार था और तुमने मेरी सेवा की … जेल में था और तुम मुभसे मिलने आये।

संत पापा फ्राँसिस चौथे अध्याय को “पवित्रता को बनाये रखने के कुछ पहलुओं” को समर्पित करते हैं जो कि उन्हें लगता है कि “आज की दुनिया में धीरज, धैर्य और नम्रता, खुशी और विनोद की भावना, साहस और जुनून, पवित्रता का सांप्रदायिक आयाम,  निरंतर प्रार्थना विशेष रूप से सार्थक साबित होगा।”

अंत में, प्रेरितिक उदबोधन पवित्रता को हासिल करने हेतु व्यावहारिक सुझाव देती है। संत पापा कहते हैं, “ख्रीस्तीय जीवन निरंतर लड़ाई है” “हमें शैतान की परीक्षाओं का सामना करने और सुसमाचार की घोषणा करने के लिए शक्ति और साहस की आवश्यकता है।”

पांचवें अध्याय में, वे “युद्ध” और सतर्कता की आवश्यकता के बारे में चर्चा करते हैं। आज मनन चिंतन और आत्मपरख बहुत जरुरी है। “संसार में इतनी सारी शक्तियाँ हैं जो हमें ईश्वर की आवाज़ सुनने से रोकती हैं।

संत पापा फ्राँसिस ने निष्कर्ष में कहा, “मेरी आशा है कि यह प्रेरितिक उदबोधन पवित्रता की इच्छा को बढ़ावा देने के लिए खुद को समर्पित करने हेतु पूरी कलीसिया को सक्षम बनाने में सहायक साबित होगा।”

 


(Margaret Sumita Minj)

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