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संत पापा ने करुणा के मिशनरियों के साथ ख्रीस्तयाग अर्पित किया

In Church on April 10, 2018 at 3:44 pm

करुणा के मिशनरियों के साथ ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा – REUTERS

10/04/2018 16:28

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 10 अप्रैल 2018 (रेई)˸ संत पापा फ्राँसिस ने मंगलवार 10 अप्रैल को करुणा के मिशनरियों के साथ वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उन्होंने प्रवचन में प्रेरित चरित से लिए गये पाठ पर चिंतन किया जहाँ शिष्यों द्वारा येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य बड़े उत्साह के साथ देने का जिक्र है।

संत पापा ने कहा, “सब कुछ का आरम्भ येसु के पुनरूत्थान के बाद हुआ, यहीं से शिष्यों के साक्ष्य की शुरूआत हुई। इसके द्वारा विश्वास एवं नये जीवन में समुदाय के सदस्य बने।” आज का पाठ दो अविभाज्य पहलुओं को प्रस्तुत करता है, व्यक्तिगत रूप से दुबारा जन्म लेना एवं सामुदायिक जीवन।

संत पापा ने करुणा के मिशनरियों को सम्बोधित कर कहा, “मैं आपके मिशन की याद करता हूँ जिसको आप करुणा की जयन्ती के समय से ही करते आ रहे हैं। एक ऐसा मिशन है जो दोनों ही दिशाओं में आगे बढ़ता है। यह ऊपर से आता है तथा समुदाय की सेवा में समर्पित होता है ताकि प्रेम की आज्ञा को आनन्द एवं मेल-मिलाप के साथ जीया जा सकें।”

संत पापा ने प्रवचन में दो मुख्य संकेतों पर चिंतन किया, पवित्र आत्मा से उत्पन्न होना तथा समुदाय की सेवा।

उन्होंने कहा कि सुसमाचार हमें स्मरण दिलाता है कि जो लोग ख्रीस्त के पुनरूत्थान का साक्ष्य देने के लिए बुलाये गये हैं उन्हें “पवित्र आत्मा से उत्पन्न होना है,” अन्यथा, हम निकोदेमुस की तरह हो जायेंगे जो इस्राएल का शिक्षक होने के बावजूद, येसु के शब्दों को नहीं समझ सका, जब उन्होंने कहा कि ईश्वर के राज्य को देखने के लिए हमें दुबारा जन्म लेना अर्थात् जल एवं पवित्र आत्मा से जन्म लेना आवश्यक है। (पद. 3-5)

निकोदेमुस ईश्वर के तर्क को नहीं समझ सका जो कृपा एवं दया का तर्क है ताकि जो छोटा है वह बड़ा बन सके, जो पिछला है वह पहला बन सके, जो अपनी बीमारी को पहचानता है उसे चंगाई मिल सके। इसका अर्थ है पिता, पुत्र एवं पवित्र आत्मा के लिए अपने जीवन की प्राथमिकता को सचमुच त्याग देना। संत पापा ने सचेत किया कि वे ईश्वर से प्राप्त असाधारण कृपा के लिए अपने को विशिष्ठ समझने से बचें बल्कि अपने को सामान्य, सरल एवं सौम्य व्यक्ति के रूप में संतलित रखते हुए पवित्र आत्मा से पोषित होते रहें, उनके सामर्थ्य के प्रति उदार बनें एवं अपने आप को मुक्त किये जाने दें क्योंकि “पवन जिधर चाहता, उधर बहता है हम उसकी आवाज सुनते हैं किन्तु यह नहीं जानते कि वह किधर से आता और किधर जाता है।” (यो. 3, 8).

दूसरा संकेत समुदाय की सेवा पर चिंतन करते हुए संत पापा ने कहा, “एक पुरोहित के रूप में दुनिया के मरूस्थल से पार हो पाना मुक्ति का चिन्ह है, यही ख्रीस्त का क्रूस है, परिवर्तन का स्रोत तथा पूरे समुदाय एवं विश्व का नवीनीकरण।

संत पापा ने इस बात पर जोर दिया कि प्रभु जो मर गये एवं फिर जी उठे, यही वह शक्ति है जो कलीसिया में एवं कलीसिया के द्वारा समस्त मानवता में एकता का निर्माण करती है। येसु ने अपने दुखभोग के पहले कहा था, “जब मैं पृथ्वी से ऊपर उठाया जाऊँगा, तो सब मनुष्यों को अपनी ओर आकर्षित करूँगा। ” (यो. 12: 32).

यही एकता की शक्ति है जो येरूसालेम में आरम्भिक ख्रीस्तीय समुदाय में दिखाई पड़ता था जैसा कि प्रेरित चरित में बतलाया गया है, “विश्वासियों का समुदाय एक हृदय और एक प्राण था।” (4,32) यह एक ऐसी एकता थी जिसने सभी चीजों को साझा करने के लिए उन्हें प्रेरित किया और जिसके कारण उनके बीच कोई भी अभाव ग्रस्त नहीं था, किन्तु समुदाय की यह जीवन शैली बाहर के लोगों के लिए भी “संक्रामण” के समान थी। समुदाय में पुनर्जीवित ख्रीस्त की उपस्थिति ने आकर्षण की ऊजा उत्पन्न की जो कलीसिया के साक्ष्य एवं विभिन्न तरह से सुसमाचार के प्रचार के द्वारा सभी तक पहुँचने का प्रयास करने लगे, उनके बीच कोई बहिष्कृत नहीं था।

संत पापा ने करुणा के मिशनरियों को सम्बोधित कर कहा कि वे अपने इस मिशन को लोगों की सेवा के लिए उसी तरह अर्पित करें। कलीसिया एवं दुनिया दोनों की सेवा में करुणा की खास अवश्यकता है क्योंकि एकता हेतु ईश्वर की अभिलाषा, ख्रीस्त द्वारा बुराई पर अच्छाई की विजय द्वारा जीती गयी है जो आधुनिक उपकरणों का लाभ उठाता है। यह अपने आप में अच्छा है किन्तु उसका गलत प्रयोग किया जाता है एवं यह जोड़ने के बदले तोड़ता है। हम सभी जानते हैं कि एकता संघर्ष से बढ़कर है और हम यह भी जानते हैं कि करुणा के बिना इस सिद्धांत को ठोस जीवन एवं इतिहास में लागू नहीं किया जा सकता है।

संत पापा ने सभी मिशनरियों को प्रोत्साहन दिया कि वे करुणा के मिशन में पक्का होकर आनन्द के साथ जाएँ। सबसे पहले अपने आप को पवित्र आत्मा की कृपाओं से भरें एवं ईश्वर के प्रेम से सिंचित हों। येसु के उस चिन्ह को भी धारण करें जिसमें वे उठाये गये क्योंकि समुदाय, दुनिया में एकता का चिन्ह एवं माध्यम है।


(Usha Tirkey)

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