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गुमला में आदिवासियों द्वारा रैली का आयोजन

In Church on April 28, 2018 at 11:50 am

नई दिल्ली, शनिवार, 28 अप्रैल 2018 (ऊकान)˸ झारखंड राज्य के गुमला शहर में हजारों आदिवासियों ने एक रैली में भाग लेकर अपने पारंपरिक धर्मों की मान्यता की मांग की।

24 अप्रैल को लगभग 10,000 लोगों की रैली ने हिंदू भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा संचालित राज्य की सरकार पर दबाव डाला, जो आदिवासियों को हिंदु मानता है और सरना धर्मों को आधिकारिक दर्जा देने से इंकार करता है।

आदिवासियों के लिए काम कर रहे कलीसिया के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कहा कि रैली विभिन्न समूहों और धर्मों के आदिवासी लोगों को एक साथ लाने में सफल रही।

गुमला धर्मप्रांत के विकर जेनेरल फादर सिप्रियन कुल्लू ने कहा कि सरकार एक राजनीतिक खेल के तहत सरना धर्म मानने वालों को हिन्दूओं की गिनती में रखती है।

उन्होंने रेली के बारे ऊका समाचार से कहा, “यह निश्चय ही एक सकारात्मक कदम है क्योंकि इस क्षेत्र में यह पहली बार था कि सभी धर्मों के आदिवासी एक मंच पर आए हैं और अपने अधिकारों की मांग की।”

फादर ने कहा कि सत्ताधारी सरकार और हिंदू समूह, राज्य के आदिवासी लोगों को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए विभाजित रखने और उनके अधिकारों की मांग पर जोर देने के प्रयासों को कमजोर करने के लिए काम कर रहे हैं।

उनके अनुसार “विशाल रैली की सफलता ने साबित कर दिया है कि लोगों ने ‘फूट डालो और शासन करो की नीति’ की राजनीति के पीछे के एजेंडे को समझ लिया है।

आधिकारिक तौर पर, आदिवासियों की संख्या झारखंड के 33 मिलियन लोगों का केवल 26 प्रतिशत है।

कलीसियाई नेता बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के मध्य-पूर्वी राज्यों में सरना धर्मों की मान्यता के लिए मांग का समर्थन कर रहे हैं।

नेताओं ने कहा कि सदियों पुरानी धर्म की आधिकारिक मान्यता आदिवासी लोगों को अपने पारंपरिक प्रथाओं को स्थापित करने और उनकी मूल पहचान बहाल करने में मदद करेगी। लेकिन हिन्दू समुदाय भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के अपने लक्ष्य में जनजातीय लोगों के पहचान को ध्वस्त करने का काम कर रहा है।

सरकार ने आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा करने वाले कानून में बदलाव लाने की कोशिश की थी किन्तु कलीसियाई समूहों द्वारा समर्थित बड़े पैमाने पर विरोध ने सरकार को इसे वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया।

सरकार ने कहा था कि भूमि अधिग्रहण आदिवासियों के लिए नौकरियां और विकास लाएगा किन्तु कलीसिया ने उसका विरोध किया क्योंकि आलोचकों का कहना था कि कानूनी संशोधन का उद्देश्य बड़ी कंपनियों के लिए जमीन उपलब्ध कराना था।

नई दिल्ली में इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में जनजातीय अध्ययन विभाग के प्रमुख फादर विन्सेंट एकका ने कहा कि सरकारी नीतियों का उद्देश्य है आदिवासी लोगों की पहचान और संसाधनों को खत्म करना।

फादर ने कहा, “सरकार जनजातीय पहचान और अस्तित्व को खत्म करना चाहती है, लेकिन सरकार चलाने वाले लोग यह भी जानते हैं कि उन्हें अगले साल चुनाव का सामना करना पड़ेगा। वोट जीतने के लिए धर्म और जातीयता का उपयोग करना उनकी रणनीति है।”

झारखंड में 1.4 मिलियन ईसाई लगभग पूरी तरह से आदिवासी समुदाय से आते हैं लेकिन 8.5 मिलियन आदिवासी भी राज्य की आधिकारिक गिनती में अल्पसंख्यक हैं।

2014 में बीजेपी शासन के तहत राज्य ने हिंदू कट्टरपंथियों की ईसाई विरोधी गतिविधियों को देखा है। कई दलित और जनजातीय नेताओं का आरोप है कि उनके समुदायों को हिंसा से धमकी दी जाती है ताकि उन्हें ईसाई बनने से मना किया जा सके।


(Usha Tirkey)

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