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बपतिस्मा संस्कार, ख्रीस्त के वस्त्र धारण करना

In Church on May 16, 2018 at 3:17 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 16  मई 2018 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को बपतिस्मा संस्कार पर अपनी धर्मशिक्षा देते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

आज हम बपतिस्मा पर शुरू की गई अपनी धर्मशिक्षा माला का समापन करेंगे। इस संस्कार के आध्यात्मिक प्रभाव हमारी अपनी आंखों के लिए अदृश्य हैं लेकिन यह उनके हृदयों में कार्यशील होता जो इसके द्वारा नये जीवन को प्राप्त करते हैं। हम इसे प्रत्यक्ष रुप में सफेद वस्त्र और जलती हुई मोमबत्ती के रुप में देख सकते हैं जो इस संस्कार की धर्मविधि के दौरान दीक्षार्थियों को दी जाती है। ये दो निशानियां हमारे लिए बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति के सम्मान और ख्रीस्तीय बुलाहट को दिखलाती है जिसे संत पौलुस कहते हैं, “जितने लोगों ने मसीह का बपतिस्मा ग्रहण किया, उन्होंने मसीह को धारण किया है।” (गला.3,27, रोमि. 13,14)

संत पापा ने कहा कि बपतिस्मा के बाद हम एक नवीन स्वभाव को धारण करते हैं जिसकी सृष्टि ईश्वर के अनुसार होती है जो धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में व्यक्त होती है।(ऐफि. 4.24) प्राचीन काल से बपतिस्मा प्राप्त वाले अपने में नये वस्त्र धारण करते थे जो स्वाभाविक रुप में जीवन की नवीनता का प्रतीक होता था। सफेद वस्त्र बपतिस्मा संस्कार में होने वाली बातों को एक चिन्ह के रुप में व्यक्त करता है। यह ईश्वरीय महिमा में हमारे जीवन के रुपानंतर को घोषित करता है। इस वस्त्र को लाने की आज्ञा हमें इसे “अनंत जीवन तक दूषित होने से” बचाये रखने की मांग करती है। वास्तव में प्रकाशाना ग्रंथ इसकी चर्चा करते हुए कहता है,“विजयी इस प्रकार उजले वस्त्र धारण करेगा।”(प्रका.3.5)

अपने में ईश्वरीय वस्त्र धारण करने का अर्थ क्या है। संत पौलुस इसकी चर्चा करते हुए कहते हैं “आप लोग ईश्वर की पवित्र एवं परम प्रिय चुनी हुई प्रजा हैं। इसलिए आप लोगों को अनुकम्पा, सहानुभूति, विनम्रता, कोमलता और सहनशीलता धारण करनी चाहिए। आप एक-दूसरे को सहन करें और यदि किसी को किसी से कोई शिकायत हो, तो एक दूसरे को क्षमा करें। प्रभु ने आप लोगों को क्षमा कर दिया है आप लोग भी ऐसा ही करें। इसके अतिरिक्त, आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बांध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है।” (कलो.3.12-14)

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि पास्का मोमबत्ती की लौ से प्रज्जवलित की गई मोमबत्तियाँ हमें बपतिस्मा के प्रभाव की याद दिलाती हैं, “प्रभु की ज्योति को ग्रहण कीजिए।” ये वचन हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि हम ज्योति नहीं है वरन प्रभु येसु ख्रीस्त हमारी ज्योति हैं।(यो.1.9.46) वे मृतकों में से जी उठकर बुराई के अंधकार में विजयी हुए हैं। हम अपने को उनके दिव्य प्रकाश से आलोकित होने दें। पास्का मोमबत्ती जिस भांति हरएक मोमबत्ती को आलोकित करती है उसी भांति पुनर्जीवित प्रभु का प्रेम हर बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति के हृदय को अपनी ज्योति और ताप से भर देता है। प्राचीन काल में बपतिस्मा संस्कार “आलौकिक” कहलाती थी और दीक्षार्थियों को “प्रबुद्ध”   कहा जाता था। येसु स्वयं इसे अपने शब्दों में कहते हैं,“संसार की ज्योति मैं हूँ, जो मेरा अनुसरण करता है वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी।” (यो.8.12)

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि यह वास्तव में ख्रीस्तीय बुलाहट है,“जहाँ हम ईश्वर की संतान स्वरुप ज्योति में चलते, अपने विश्वास में बने रहते हैं।” बच्चों के संबंध में, यह माता-पिता और दादा-दादियों का उत्तरदायित्व है जो बच्चों में बपतिस्मा की कृपा को ज्योति स्वरुप प्रज्जवलित करने और उन्हें विश्वास में मजबूत बनाने हेतु बुलाये जाते हैं। “ख्रीस्तीय जीवन की शिक्षा बच्चों का अधिकार है, यह उन्हें ईश्वर की योजना को अपने जीवन में देखने और जानने हेतु मदद करने की मांग करता है, जिससे वे अपने जीवन में विश्वास को व्यक्तिगत रुप से मजबूत कर सकें जिसे उन्होंने बपतिस्मा संस्कार में प्राप्त किया है।”

संत पापा ने कहा कि येसु ख्रीस्त की उपस्थिति को हमारे जीवन में सुरक्षित रखते हुए उसे विकसित करने की जरुरत है। यह वह ज्योति है जो हमारा मार्ग प्रशस्त करती, हमारे जीवन में चुनाव को सुगम बनती, तथा येसु से मिलन हेतु हमारे हृदय में एक उत्साह जागृत करती है। इस भांति हम अपने जीवन को उनके लिए खोलते जो हमारे पास अपने जरुरत के समय में आते हैं और यह तबतक होता है जबतक हमारा मिलन ईश्वर से न हो जाये। उस दिन जैसा कि प्रकाशना ग्रंथ हमें कहता है, “वहाँ फिर कभी रात नहीं होगी। उन्हें दीपक या सूर्य के प्रकाश की जरुरत नहीं होगी, क्योंकि प्रभु-ईश्वर उन्हें आलोकित करेंगे और वे युग-युगों तक राज्य करेंगे।” (प्रका, 22.5)

बपतिस्मा की धर्मविधि “हे पिता हमारे प्रार्थना” के द्वारा समाप्त होती है। वास्तव में बपतिस्मा के द्वारा नव जीवन प्राप्त बच्चे दृढ़करण संस्कार में पवित्र आत्मा की कृपा से परिपूर्ण किये जाते और परमप्रसाद संस्कार ग्रहण करते हैं। इस भांति वे कलीसिया में ईश्वर को “पिता” कहने के अर्थ को समझते हैं।

संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा के अंत में कहा कि प्रेरितिक पत्र “गाऊदेते एत एसुलताते” में की गई मैं अपनी अपील को आप सभों के समक्ष दुहराता हूँ, “बपतिस्मा में मिली कृपा आप के पवित्र जीवन में फलहित हो। हम ईश्वर के हाथों में सारी चीजों को खुला रखें और सारी बातों में ईश्वर का चुनाव करें। आप हताशा न हो क्योंकि पवित्र आत्मा की शक्ति हमारे साथ है जो सारी चीजों को संभव बनाती है, हमारे जीवन में पवित्रता की कृपा पवित्र आत्मा का वरदान है।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्राँसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासी समुदाय का अभिवादन किया।

अपनी धर्मशिक्षा के उपरांत विश्वासियों को अपने संबोधन में संत पापा ने येरुसलेम और मध्य पूर्वी क्षेत्रों में युद्ध और हिंसा को लेकर अपनी चिंता जताई। उन्होंने युद्ध और हिंसा में मारे गये लोगों के प्रति अपनी संवेदना अर्पित की और घायलों को अपनी प्रार्थना का सामीप्य प्रदान किया। संत पापा ने कहा कि युद्ध के कारण हम शांति की स्थिति से दूर चले जाते हैं। किसी भी हिंसा के द्वारा हम शांति की स्थापना नहीं कर सकते हैं। उन्होंने युद्ध से पीड़ित लोगों के लिए माता मरिया से विचवाई करते हुए शांति स्थापना हेतु विश्वासी समुदाय संग दूत संवाद प्रार्थना का प्राठ किया।

अंत में संत पापा ने युवाओं, बुजुर्गों, बीमारों और नव विवाहितों की याद की और सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों के साथ हे हमारे पिता प्रार्थना का पाठ किया और सबों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।


(Dilip Sanjay Ekka)

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