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मांसपेशीय दुर्विकास की बीमारी से संघर्ष करनेवाले संघ से संत पापा की मुलाकात

In Church on June 2, 2018 at 2:43 pm


वाटिकन सिटी, शनिवार, 2 जून 2018 (रेई)˸ संत पापा फ्राँसिस शनिवार 2 जून को वाटिकन के पौल षष्ठम सभागार में मांसपेशीय दुर्विकास संबंधी बीमारी के विरूद्ध संघर्ष करने वाले इताली संघ के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा उन्हें प्रोत्साहन दिया कि वे न्यूरोमस्कुलर की बीमारी से पीड़ित लोगों के प्रति एकात्मता एवं सुसमाचारी उदारता का साक्ष्य अधिक से अधिक देने का प्रयास करें।

उन्हें सम्बोधित कर संत पापा ने कहा कि वे अस्पतालों और सामाजिक क्षेत्र में रोगियों को सहायता तथा बहुमूल्य सेवा प्रदान करते हैं इस तरह वे न केवल शारीरिक पीड़ा से संघर्ष करने में उन्हें मदद देते बल्कि परित्यक्त अथवा अकेलापन जैसी मानसिक पीड़ा से भी राहत प्रदान करते हैं।

संत पापा ने उनकी सेवाओं की विशेषता पर गौर करते हुए कहा कि इसकी सेवा स्वेच्छिक है जो अभिरूचि की स्वतंत्रता या विचारधाराओं के साथ संयुक्त है। स्वेच्छा दान में व्यावसायिकता और निरंतरता जुड़ा है जो उनके सदस्यों से, आत्म-जाँच, निष्ठा, ध्यान, तत्परता, रोगी के अव्यक्त परेशानी को भी समझने की क्षमता, विनम्रता, गंभीरता, दृढ़ इच्छाशक्ति, समयपबंद, धीरज तथा हर आवश्यकता में रोगी के प्रति सम्मान जैसे गुणों की मांग करता है। संत पापा ने उन्हें प्रोत्साहन देते हुए कहा कि वे इस रास्ते पर आगे बढ़ते रहें तथा एकात्मता एवं सुसमाचारी उदारता का अधिक से अधिक साक्ष्य दें। उन्होंने संगठन के उन सभी कार्यों की सराहना की जिसके द्वारा वे व्यक्ति की मानव प्रतिष्ठा एवं उनकी आशाओं की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट करते हैं।

संत पापा ने कहा, “जो कार्य वे करते हैं उसके द्वारा वे यह अनुभव कर सकें कि केवल प्रेम एवं देने के द्वारा ही व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह पहचान सकता है। येसु ईश्वर के पुत्र हैं जो मानव बने और उन्होंने मानव अनुभूति के इस गहरे अर्थ को बतलाया। उन्होंने ईश्वर के चेहरे को प्रकट किया जो प्रेम है। वे प्रकट करते हैं कि उनके अस्तित्व का सबसे बड़ा नियम है, प्रेम। उन्होंने इस धरा पर अपने जीवन के द्वारा ईश्वर की कोमलता प्रकट की तथा मानव के समान शरीर धारण कर एक सेवक की तरह अपने को पूरा खाली कर दिया। मृत्यु से पार होकर उन्होंने प्रेम से जीना सिखाया।

उदारता, सुसमाचारी साक्ष्य का सबसे अर्थपूर्ण तरीका प्रस्तुत करता है क्योंकि उनकी ठोस आवश्यकताओं का प्रत्युत्तर देते हुए वह मनुष्यों के लिए ईश्वर का प्रेम प्रकट करता है। संत पापा ने इटली के उदार पुरोहितों, फादर जुसेप्पे कोत्तोलेंगो, लुईजी क्वानेल्ला और लुईजी ओरियोने की याद करते हुए कहा कि उनकी उदारता ने इताली समाज में गहरी छाप छोड़ी है। हमारे समय में भी कई लोग अपने पड़ोसियों के लिए कार्य कर रहे हैं और उसके द्वारा अपने विश्वास की खोज करते हैं क्योंकि वे रोगियों में ईश्वर के पुत्र ख्रीस्त से मुलाकात करते हैं। वे कमजोर भाई बहनों में सेवा किये जाने की मांग करते हैं।

संत पापा ने कहा कि मदद करना महत्वपूर्ण है किन्तु उससे भी बढ़कर है हृदय समर्पित करना। उन्होंने उनकी प्रेरिताई की याद दिलाते हुए कहा कि वे जीवन के लिए उत्साह बनने हेतु बुलाये गये हैं, खासकर, युवाओं को एकात्मता एवं स्वागत की संस्कृति की शिक्षा देने के द्वारा, वे सबसे कमजोर लोगों की आवश्यकताओं के प्रति उदार बनने के लिए बुलाये गये हैं। उन्होंने कहा कि यह सीख पीड़ा से आती है जिसको हम बीमार एवं पीड़ित लोगों से सीखते हैं क्योंकि जो जितना अधिक कष्ट सहते हैं उतना ही अधिक जीवन के दिव्य उपहार के मूल्य को समझते हैं और उसे गर्भ से लेकर प्राकृतिक मृत्यु तक प्रोत्साहन एवं सुरक्षा प्रदान करते हैं।

संत पापा ने सभी प्रतिनिधियों एवं स्वयंसेवकों को प्रोत्साहन दिया कि वे उदारता की अपनी इस यात्रा में अपने परिवारों, मित्रों एवं अपने पड़ोसियों के साथ आगे बढ़ें। वे माता मरियम के समान आनन्द एवं मुक्ति के संदेश वाहक बनें जो इलिजाबेथ की सेवा में शीघ्रता से चल पड़ी थी। संत पापा ने उपस्थित बीमार लोगों का अभिवादन किया एवं उनसे प्रार्थना का आग्रह किया।


(Usha Tirkey)

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विश्व समुदाय ही स्थायी शांति की कुंजी, सीरियाई पुरोहित

In Church on June 2, 2018 at 2:41 pm

अलेप्पो, सीरिया, शनिवार, 2 जून 2018 (सीएनए)˸ सीरिया में चल रहे संघर्षों का अंत स्थानीय लोगों से नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के नेताओं द्वारा ही संभव है। यह बात सीरिया के फ्राँसिसकन पुरोहित फादर इब्राहिम अलसाबाह ने 31 मई को पत्रकारों से कही।

उन्होंने कहा, “हम जानते हैं एक सीरियाई के रूप में आज समाधान हमारे हाथों में नहीं है। सीरिया के बाहर शांति निर्माण की कुँजी कई लोगों के हार्थों में है, खासकर, विश्व के बड़े देशों के हाथों में।”

अलेप्पो में आयोजित एक प्रेस सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए फादर ने कहा कि वे अपने पूरे हृदय से प्रार्थना करते हैं कि प्रभावशाली देश हर प्रकार के सकटों का समाधान निकाल दें जिन्हें वे सीरिया में झेल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अलेप्पो एवं समस्त मध्यपूर्व में अल्पसंख्यक अपने भविष्य के लिए चिंतित हैं, खासकर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय सीरियाई संकटों को दूर करने पर विचार करें क्योंकि इसका दुष्प्रभाव समुदाय में बहुत गहरा है।

47 वर्षीय फादर अलसाबाह का जन्म दमिश्क में हुआ है और वे 2014 में रोम में अपनी सेवा दे चुके हैं। “सवेरा आता है” फादर अलसाबाह की दूसरी किताब है जो अलेप्पो पर आधारित है।

फादर अलसाबाह ने कहा, “मैं हमेशा प्रार्थना की मांग करता हूँ क्योंकि मैं प्रार्थना की शक्ति पर गहरा विश्वास करता हूँ, साथ ही साथ, प्रेरिताई को जारी रखने के लिए भी प्रार्थना की आवश्यकता है। हम जो कुछ भी किया है वह इसलिए क्योंकि बहुत सारे लोग हमारे लिए प्रार्थना करते हैं।” उन्होंने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि लोग अपने हृदय में पवित्र आत्मा की प्रेरणा को सुनें क्योंकि जब हम ऐसा करेंगे तभी हम दुनिया में शांति को प्राप्त कर सकेंगे तथा कई संकटों और समस्याओं का समाधान प्राप्त करेंगे।

उनके अनुसार सीरिया में ख्रीस्तीयों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है हृदय में शांति प्राप्त करना।


(Usha Tirkey)

चिली के अतिथि पुरोहितों के साथ संत पापा ने ख्रीस्तयाग का अनुष्ठान किया

In Church on June 2, 2018 at 2:39 pm

वाटिकन सिटी, शनिवार 2 जून 2018 (रेई) : शनिवार 2 जून को संत मार्था के प्रार्थनालय में संत पापा फ्राँसिस ने चिली से आये पुरोहितों के साथ ख्रीस्तयाग समारोह का अनुष्ठान किया।

वाटिकन प्रेस कार्यालय द्वारा प्राप्त विज्ञप्ति अनुसार चिली से आये यौन अत्याचार से पीड़ित पाँच पुरोहित, दो लोकधर्मी और उनकी आध्यत्मिक मदद करने वाले दो पुरोहित 1जून से ही संत पापा फ्राँसिस निवास स्थान संत मार्था में रह रहे हैं। आज अपराहन 4 बजे संत पापा फ्राँसिस उनके साथ पवित्र युखारिस्त समारोह के अनुष्ठान किया। उसके बाद वे व्यक्तिगत हरएक से मिलेंगे।

संत पापा फ्राँसिस द्वारा आयोजित इस बैठक का उद्देश्य विश्वासियों और चिली के पुरोहितों द्वारा किये गये अनुभव की वास्तविकता को गहरा करना है। यौन अत्याचार से पीड़ित पाँच पुरोहितों की मदद से, संत पापा समुदाय के आंतरिक घावों की चंगाई का उपाय ढूँढ़ना चाहते है। जब हर कोई अपने घावों से अवगत हो जाए,तो लोकधर्मियों और उनके पुरोहितों के बीच एक स्वस्थ रिश्ते का पुनः शुरू किया जा सकता है।


(Margaret Sumita Minj)

पादरे पीयो की आध्यात्मिक पुत्री, दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा धन्य घोषित की गई

In Church on June 2, 2018 at 2:38 pm

नेपल्स, शनिवार 2 जून 2018 (रेई) : पवित्र हृदय के प्रेरित धर्मबहनों के धर्मसमाज की संस्थापिका दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा आज शनिवार 2 जून को नेपल्स के महागिरजाघर में धन्य घोषित की गईं। पवित्र मिस्सा समारोह के दौरान संत पापा फ्राँसिस के प्रतिनिधि और संत प्रकरण के लिए गठित धर्मसंघ के अध्यक्ष कार्डिनल अंजेलो अमातो धर्मबहन दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा को धन्य घोषित किया।

जीवनी

मरिया गारगानी (बपतिस्मा नाम) का जन्म एक धार्मिक एवं कुलीन परिवार में 23 दसम्बर 1892 को  इटली के अवेलीनो प्रांत स्थित मोर्रा दे सान्तिस में हुआ था। आठ भाई-बहनों में मरिया सबसे छोटी थी। परिवार में सभी भाई बहन पढ़े लखे थे। उनके पिताजी को लोग प्रोफेसर कहा करते थे। नेपल्स में विश्वविद्यालय की शिक्षा समाप्त कर 1913 से 1928 तक संत मार्का ला कतोला के एक स्कूल में शिक्षण कार्य में संलग्न रहीं। येसु के पवित्र हृदय के प्रति उनकी गहरी भक्ति थी। इसी बीच उनका परिचय पादरे पीयो से हुआ और वे उनके आध्यात्मिक सलाहकार बने। 1933 में अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनते हुए तथा पादरे पीयो की सहायता से एक धार्मिक संगठन की स्थापना की, जो ख्रीस्तीय मुल्यों को पुनः कलीसिया में अनुप्राणित करने के लिए पुरोहितों के साथ मिलकर काम करने लगी। 1936 में उन्होंने बच्चों के लिए पहला बालवाड़ी खोला। स्कूल के बाद वे पल्ली की गरीब महिलाओं और बीमार लोगों से मिलने जाया करती थी।

उन्होंने अपनी धर्मबुलाहट को पहचानते हुए एक धर्मबहन बनने का निणय लिया। 1945 में धार्मिक संगठन को एक धर्म समाज में परिणत करने के लिए कलीसियाई कार्य विधि शुरु हुई। 1956 में कलीसियाई कार्य विधि पूरी हुई और नये धर्मसमाज ‘पवित्र हृदय के प्रेरित धर्मबहनों के धर्मसमाज’ की स्थापना हुई। संस्थापिका दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा 1956 से 1971 तक धर्मसमाज की मदर जेनरल बनीं। 81 वर्ष की उम्र में 1973 में उनकी मृत्यु हुई।

16 मई 2002 में वे प्रभु सेविका से सम्मानित की गईं। वे हर परिस्थिति में शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अपने विश्वास का साक्ष्य साहस के साथ दिया। वे बहुत ही परिश्रमी और साहसी महिला थीं। दैनिक जीवन में उन्होंने कार्य और प्रार्थना में संतुलन बनाये रखा। उनके मिशन का लक्ष्य था प्रार्थना और ईश्वर की दया से आत्माओं को जीतना तथा अधिक से अधिक आत्माओं को येसु के पवित्र हृदय तक पहँचाना।

कार्डिनल अमातो ने समारोह के दौरान कहा, “पवित्र हृदय के प्रति सच्चा और समर्पित प्रेम के माध्यम से पवित्र बनने की उनकी इच्छा थी। वे कहा करती थी कि उन्होंने केवल प्रभु लिए काम किया था और उनके लिए वह खुद को आग में झोंकने के लिए भी सक्षम थीं।” यह धन्य दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा का अपनी धर्मबहनों के लिए आध्यात्मिक विरासत है।


(Margaret Sumita Minj)

पादरे पीयो की आध्यात्मिक पुत्री, दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा धन्य घोषित की गई

In Church on June 2, 2018 at 2:36 pm

नेपल्स, शनिवार 2 जून 2018 (रेई) : पवित्र हृदय के प्रेरित धर्मबहनों के धर्मसमाज की संस्थापिका दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा आज शनिवार 2 जून को नेपल्स के महागिरजाघर में धन्य घोषित की गईं। पवित्र मिस्सा समारोह के दौरान संत पापा फ्राँसिस के प्रतिनिधि और संत प्रकरण के लिए गठित धर्मसंघ के अध्यक्ष कार्डिनल अंजेलो अमातो धर्मबहन दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा को धन्य घोषित किया।

जीवनी

मरिया गारगानी (बपतिस्मा नाम) का जन्म एक धार्मिक एवं कुलीन परिवार में 23 दसम्बर 1892 को  इटली के अवेलीनो प्रांत स्थित मोर्रा दे सान्तिस में हुआ था। आठ भाई-बहनों में मरिया सबसे छोटी थी। परिवार में सभी भाई बहन पढ़े लखे थे। उनके पिताजी को लोग प्रोफेसर कहा करते थे। नेपल्स में विश्वविद्यालय की शिक्षा समाप्त कर 1913 से 1928 तक संत मार्का ला कतोला के एक स्कूल में शिक्षण कार्य में संलग्न रहीं। येसु के पवित्र हृदय के प्रति उनकी गहरी भक्ति थी। इसी बीच उनका परिचय पादरे पीयो से हुआ और वे उनके आध्यात्मिक सलाहकार बने। 1933 में अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनते हुए तथा पादरे पीयो की सहायता से एक धार्मिक संगठन की स्थापना की, जो ख्रीस्तीय मुल्यों को पुनः कलीसिया में अनुप्राणित करने के लिए पुरोहितों के साथ मिलकर काम करने लगी। 1936 में उन्होंने बच्चों के लिए पहला बालवाड़ी खोला। स्कूल के बाद वे पल्ली की गरीब महिलाओं और बीमार लोगों से मिलने जाया करती थी।

उन्होंने अपनी धर्मबुलाहट को पहचानते हुए एक धर्मबहन बनने का निणय लिया। 1945 में धार्मिक संगठन को एक धर्म समाज में परिणत करने के लिए कलीसियाई कार्य विधि शुरु हुई। 1956 में कलीसियाई कार्य विधि पूरी हुई और नये धर्मसमाज ‘पवित्र हृदय के प्रेरित धर्मबहनों के धर्मसमाज’ की स्थापना हुई। संस्थापिका दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा 1956 से 1971 तक धर्मसमाज की मदर जेनरल बनीं। 81 वर्ष की उम्र में 1973 में उनकी मृत्यु हुई।

16 मई 2002 में वे प्रभु सेविका से सम्मानित की गईं। वे हर परिस्थिति में शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अपने विश्वास का साक्ष्य साहस के साथ दिया। वे बहुत ही परिश्रमी और साहसी महिला थीं। दैनिक जीवन में उन्होंने कार्य और प्रार्थना में संतुलन बनाये रखा। उनके मिशन का लक्ष्य था प्रार्थना और ईश्वर की दया से आत्माओं को जीतना तथा अधिक से अधिक आत्माओं को येसु के पवित्र हृदय तक पहँचाना।

कार्डिनल अमातो ने समारोह के दौरान कहा, “पवित्र हृदय के प्रति सच्चा और समर्पित प्रेम के माध्यम से पवित्र बनने की उनकी इच्छा थी। वे कहा करती थी कि उन्होंने केवल प्रभु लिए काम किया था और उनके लिए वह खुद को आग में झोंकने के लिए भी सक्षम थीं।” यह धन्य दिव्य प्रेम की मारिया क्रूचिफिस्सा का अपनी धर्मबहनों के लिए आध्यात्मिक विरासत है।


(Margaret Sumita Minj)

वैश्विक माता-पिता दिवस के अवसर पर महाधर्माध्यक्ष औजा का स्वागत भाषण

In Church on June 2, 2018 at 2:35 pm

न्यूयॉर्क,शनिवार 2 जून 2018 (रेई) :  संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए वाटिकन के स्थायी पर्यवेक्षक एवं प्रेरितिक राजदूत महाधर्माध्यक्ष बेर्नादीतो औजा ने 1जून को न्यूयॉक में वैश्विक माता-पिता दिवस के अवसर पर आयोजित सभा को संबोधित किया।

उन्होंने सभा में उपस्थित प्रतिभागियों और अतिथियों का स्वागत कर कहा कि 17 सितम्बर 2012 को संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने संकल्प 66/292 को 1 जून को माता-पिता का वार्षिक वैश्विक दिवस होने का ऐलान किया, जो दुनिया भर में जीवनभर अपने निःस्वार्थ, समर्पण के लिए समर्पित हैं ताकि वे अपने बच्चों को पोषित और संरक्षित कर सकें और मनुष्यों के रूप में उनकी पूर्ण परिपक्वता में उनकी मदद कर सकें।

महाधर्माध्यक्ष बेर्नादीतो ने कहा, “वाटिकन के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन और विश्व शांति संघ द्वारा वैश्विक माता-पिता दिवस के इस छठी वर्षगांठ पर इस सम्मेलन में आपका स्वागत करने के लिए मुझे विशेष खुशी मिली। इस दिन माता-पिता का बच्चों और समाज पर महत्वपूर्ण और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।”

माताओं और पिताजी का महत्व  और अगली पीढ़ी को बढ़ाने में उनकी संयुक्त प्रतिबद्धता को कभी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। मानवता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि “गृह विद्यालय” में शिक्षकों के रूप में उनके मिशन में माता और पिता कितनी अच्छी तरह से करते हैं, जहां वे अपने बच्चों को सामाजिककरण, विश्वास, आपसी सम्मान और जिम्मेदारी, शिक्षा, कड़ी मेहनत, स्नेह, करुणा, क्षमा, एकजुटता, और नैतिक विकास जैसे कई आवश्यक मानव मूल्यों के साथ उन्हें बड़ा करते हैं।

महाधर्माध्यक्ष औजा ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के चार स्तंभों में शांति सबसे मौलिक है, इसके बिना अन्य स्तंभों को हासिल नहीं किया जा सका। लेकिन अच्छे माता-पिता की देखभाल  अन्य तीनों के लिए आवश्यक है, जो विकास, मानव अधिकारों के प्रचार एवं रक्षा और अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधि को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

लोगों को गरीबी से बाहर उठाने के लिए उचित परिवारिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, समानता आदि आवश्यक है। मानव गरिमा के आधार पर मानवाधिकारों का सम्मान लोगों के परिवार के सदस्यों के प्रति सम्मान सीखने के तरीके से होता है, इस प्रकार हम परिवार में एक दूसरे के लिए प्रेम, एकता, भाईचारे, सच बोलना, सच्चाई के लिए खड़ा होना आदि बचपन से ही माता पिता से पाते हैं।

वैश्विक माता-पिता के दिवस के इस वार्षिक समारोह का उद्देश्य पारिवारिक बंधन बहाल करना है। माता-पिता के इस वैश्विक दिवस को विशेष रूप से बच्चों और समाज के अच्छे पक्षों के लिए माताओं और पिता के योगदान को समझना और स्वीकार करना चाहिए। दुनिया केवल अपने परिवारों के रूप में मजबूत होगी, और परिवार केवल अपने माता-पिता के रूप में मजबूत होंगे। हमारे ग्रह पर शांति घर में शांति से शुरू होती है। हमारे समाज का टिकाऊ विकास माता-पिता के काम पर निर्भर करता है जो न सिर्फ बच्चों को पैदा करते बल्कि उन्हें पूरी तरह से विकसित वयस्क के रुप बढ़ने में मदद करते हैं। मानव गरिमा और अधिकारों का सम्मान पारिवारिक प्रेम के स्कूल से अधिक आसानी से विकसित होता है। चूंकि दुनिया का भविष्य आज परिवारों पर निर्भर करता है, इसलिए माता-पिता और भावी माता-पिता को एक प्रतिबद्ध गतिशील जोड़ी के रूप में व्यक्तिगत रूप से और पारस्परिक रूप से अपनी अनिवार्य भूमिका निभाने के लिए तैयार, समर्थित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।


(Margaret Sumita Minj)

प्रार्थना का महत्व

In Church on June 2, 2018 at 2:33 pm


वाटिकन सिटी, शनिवार, 2 जून 2018 (रेई)˸ प्रार्थना एक आध्यात्मिक क्रिया है। इसके द्वारा हम ईश्वर के करीब आते एवं उनसे बातचीत करते हैं। प्रार्थना में चाहे हम कृतज्ञता अर्पित करते अथवा निवेदन, हम उसमें ईश्वर की उपस्थिति का एहसास करते हैं जो हमें जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए साहस के साथ आगे बढ़ने का बल प्रदान करता है।

संत पापा ने 2 जून को एक ट्वीट प्रेषित कर प्रार्थना करने का प्रोत्साहन दिया। उन्होंने संदेश में लिखा, “प्रार्थना में प्रभु को ढूढ़ो˸ वे ही हैं जिन्होंने आपको बुलाया है।”


(Usha Tirkey)

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