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Archive for the ‘Peace & Justice’ Category

अयोध्या पर सुफ्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत

In Peace & Justice, Uncategorized on May 11, 2011 at 5:49 am

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफ़र

फा. सेड्रिक प्रकाश, ये.स.

गुजरात, 10 मई सन् 2011 (ऊका समाचार): गुजरात
में येसु धर्मसमाज द्वारा संचालित मानवाधिकार केन्द्र “प्रशान्त” के
निदेशक येसु धर्मसमाजी पुरोहित फादर सैड्रिक प्रकाश ने अयोध्या पर सुफ्रीम कोर्ट
के फ़ैसले का स्वागत किया है

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में
बांटने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम
और न्यायमूर्ति आर.एम. लोधा की पीठ ने फ़ैसले में कहा था कि “किसी भी पक्ष ने
जमीन बांटने की मांग नहीं की थी, लिहाजा हाई कोर्ट का फैसला अजीब और
आश्चर्यजनक है।”

गौरतलब है कि विगत वर्ष 30 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राम
जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया था, जिसमें एक
हिस्सा भगवान राम विराजमान, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा
हिस्सा मुसलमानों को देने का फैसला सुनाया गया था। कोर्ट के इस फैसले पर सभी
पक्षों ने असंतोष जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उक्त फ़ैसले पर रोक लगाने के तुरन्त बाद फादर प्रकाश ने एक
वकतव्य जारी कर कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने उचित रूप से
हाईकोर्ट के निर्देश को अजीब और आश्चर्यजनक निरूपित किया है।”

उन्होंने कहा कि इलाहबाद हाई कोर्ट ने “आस्था” एवं “भावनाओं” को तो ध्यान
में रखा किन्तु  क्या सही है, क्या
न्यायोचित है तथा क्या प्रमाणित किया जा सकता है आदि प्रश्नों को नज़र अन्दाज़ कर
दिया।

फादर प्रकाश ने कहा कि उनकी आशा है कि अन्तिम फ़ैसला अन्ततः सत्य और न्याय पर आधारित होगा तथा
इससे संलग्न सभी पक्ष इस दीर्घकालीन विवाद के मैत्रीपूर्ण समाधान का आश्वासन पा
सकेंगे।

Source: http://www.radiovaticana.org/in1/index.asp

ग़ैर सरकारी संगठनों को मिलनेवाले विदेशी अंशदान पर नियंत्रण

In Peace & Justice on May 8, 2011 at 6:38 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफ़र

नई दिल्ली, 7 मई सन् 2011 (एशिया न्यूज़): विदेशी अंशदान नियंत्रण अधिनियम में नया संशोधन पहली मई से प्रभावी हो गया है। नये नियम ग़ैरसरकारी संगठनों तथा काथलिक एवं ख्रीस्तीय संगठनों की स्वतंत्रता को कम करते हैं।

अहमदाबाद में, न्याय और शांति सम्बन्धी येसु धर्मसमाजी मानवाधिकार केन्द्र “प्रशांत” के निदेशक फादर सैडरिक प्रकाश ने कहा कि दलितों, आदिवासियों एवं कमज़ोर वर्गों के लिये कार्यरत संगठनों पर उक्त परिवर्तन के नकारात्मक परिणाम होंगे।

वास्तव में, संशोधन काथलिक एवं अन्य लोकोपकारी संगठनों को मिलनेवाले अंशदान पर सरकार के नियंत्रण को और अधिक मज़बूत करता है।

संशोधन की खास बातें इस प्रकार हैं: स्थायी पंजीकरण को हटा दिया गया है तथा पाँच वर्षीय पंजीकरण का प्रावधान रख दिया गया है ताकि निष्क्रिय संगठन अपने आप ही बन्द हो जायें। सभी मौजूदा पंजीकृत संगठनों की वैधता पाँच वर्ष तक सीमित कर दी गई है।

द्वितीय, “व्यक्ति” को व्यापक अर्थ में परिभाषित किया गया है। तृतीय, राजनीतिक प्रकृति के संगठन विदेशी अंशदान प्राप्त नहीं कर सकेंगे। चौथा बिन्दु, प्रशासन और व्यवस्था सम्बन्धी खर्च की सीमा निर्धारित कर दी गई है।

पाँचवा, निलंबन और पंजीकरण रद्द करने की प्रक्रिया निर्धारित कर दी गई है। छठवाँ, विनियमन में बैंकिंग क्षेत्र को वैधानिक भूमिका प्रदान की गई है।

सातवाँ, अधिकारियों की जवाबदेही के लिए समय सीमा बाँध दी गई है और आठवाँ, ग़ैरसरकारी संगठनों की नेकनियति सम्बन्धी ग़लतियों से निपटने के लिये अपराधों के प्रशमन का प्रावधान रखा गया है।

फादर प्रकाश का कहना है कि स्पष्टता की कमी के कारण अब सरकार का नियंत्रण और अधिक मज़बूत हो जायेगा क्योंकि आसानी से इसकी मिथ्या व्याख्या की जायेगी।

उदाहरणार्थ, उन्होंने कहा कि लोगों के वैध अधिकारों की मांग करनेवाले किसी भी संगठन पर राजनीति में लिप्त रहने का आरोप लगाकर उसके अंशदान को बन्द किया जा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे विकास कार्यक्रम को भारी क्षति पहुँचेगी।

ग़ौरतलब है कि धर्म प्रचार एवं धर्मान्तरण के रोकने के बहाने उक्त संशोधन का प्रस्ताव, सन् 2000 में, भारतीय जनता पार्टी ने रखा था।

 source: http://www.radiovaticana.org/in1/index.asp

भारत को निगरानी सूची पर रखने हेतु अमरीका के निर्णय का भारतीय ख्रीस्तीयों द्वारा स्वागत

In Peace & Justice on May 5, 2011 at 12:26 pm

नई दिल्ली, 3 मई सन् 2011 (ऊका): धार्मिक स्वतंत्रता एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों के क्षेत्र में, भारत को
निगरानी सूची पर रखने हेतु अमरीका के निर्णय का भारत के ख्रीस्तीयों ने स्वागत
किया है।

अन्तरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता सम्बन्धी अमरीकी आयोग “यूसिर्फ” ने 28 अप्रैल को
प्रकाशित अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि सन् 2007-2008 में उड़ीसा में
ख्रीस्तीयों विरुद्ध बड़े पैमाने पर हुई हिंसा, सन् 2002 में गुजरात
की हिंसा तथा सन् 1984 में सिक्खों पर ढाई गई हिंसा के शिकार हुए लोगों के लिये
न्याय “मन्द एवं निष्प्रभावी” रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस एवं न्यायिक अधिकारी “हिंसा के विरुद्ध ठोस कदम उठाने तथा
लोगों को सुरक्षा का आश्वासन देने में असमर्थ रहे हैं। साथ ही अपराधियों की
जवाबदेही की उम्मीद कम ही प्रतीत होती है।”

अमरीकी आयोग की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दर्शाते हुए ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के सचिव जॉन
दयाल ने कहा कि इसका यह अर्थ है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता सम्बन्धी गम्भीर
प्रश्न हैं जिनपर क़रीब से निगरानी रखी जाना अनिवार्य है।

उड़ीसा में ख्रीस्तीय विरोधी हिंसा के सन्दर्भ में रिपोर्ट में इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया गया कि मामलों की
जाँचपड़ताल के लिये संरचनाएँ बहुत ही सीमित हैं जो राजनैतिक भ्रष्टाचार तथा धर्म
पर आधारित पूर्वाग्रहों के कारण बेकार सिद्ध हुई हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि
दर्जनों हत्याओं के लिये किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया है।

अमरीकी आयोग ने भारत सरकार का आह्वान किया है कि वह धर्मान्तरण विरोधी कानूनों को रद्द करे तथा
धर्म, जाति एवं आदिवासी स्थिति के आधार पर किसी भी प्रकार
भेदभाव न करे क्योंकि इन्हीं की आड़ में चरमपंथी देश के अल्पसंख्यकों को बेवजह
उत्पीड़ित किया करते हैं।

उड़ीसा में बेहरामपुर के धर्माध्यक्ष शरत चन्द्र नायक ने भी अमरीकी आयोग के निर्णय का स्वागत
किया तथा कहा कि कन्धामाल में अभी भी असुरक्षा एवं दण्ड मुक्ति का माहौल बना हुआ
है तथा सरकार हिंसा के शिकार लोगों की शिकायतों को अनसुना कर रहीं है।

त्रिपोलीः नागरिकों के सम्मान के लिये इटली एवं नाटो से युद्धविराम का आग्रह

In Peace & Justice on May 4, 2011 at 6:48 pm

जूलयट जेनेविव क्रिस्टफ़र

लिबिया के लोग सड़को पर

 त्रिपोली, 4 मई सन् 2011 (एशियान्यूज़): लिबिया में जारी युद्ध को रोकने का आह्वान करते हुए त्रिपोली के काथलिक महाधर्माध्यक्ष जोवानी मारतीनेल्ली ने इटली एवं नाटो सैन्य दलों से आग्रह किया है कि वे मानव जीवन एवं लिबिया के परिवारों के प्रति सम्मान के ख़ातिर एक सप्ताह के लिये युद्धविराम की व्यवस्था करें।

एशियान्यूज़ से बातचीत में मंगलवार को महाधर्माध्यक्ष ने कहा कि युद्ध विराम मानवता का कृत्य होगा और ऐसे कृत्यों के प्रति, युद्ध की नाराज़गी के बावजूद, लिबिया के नागरिक संवेदनशीलता दर्शायेंगे।

लिबियाई नेता गद्दाफ़ी के एक पुत्र एवं तीन नातों के मारे जाने के बाद महाधर्माध्यक्ष ने युद्ध में शरीक सभी देशों से आग्रह किया है कि वे बमबारी एवं नागरिकों को मारना बन्द करें।

उन्होंने कहा कि, “अनवरत जारी बमबारी से लोग थक चुके हैं तथा शत्रुता का अन्त चाहते हैं।” उन्होंने कहा, “हमें एक बम द्वारा उत्पन्न शोक और विनाश को समझना चाहिये जो लोगों के घरों को बरबाद कर देता तथा उनकी जानें लेता है।”

गद्दाफ़ी के छोटे बेटे सैफ आल अरब की मंगलवार को दफन क्रिया सम्पन्न कर दी गई जिसमें महाधर्माध्यक्ष मारतीनेल्ली भी शरीक हुए। उन्होंने कहा कि युद्ध लिबियाई देश एवं लिबियाई लोगों के विरुद्ध है इसलिये इसे तत्काल रोका जाना चाहिये।

लिबिया के पूर्व मित्र इटली का उन्होंने आह्वान किया कि वह अपनी नीति में बदलाव करे तथा बमबारी को रुकवाये। उन्होंने कहा कि लिबियाई सरकार के साथ वार्ता ही सर्वोत्तम समाधान हो सकती है।

उन्होंने प्रश्न किया कि अनवरत जारी बमबारी के प्रति गद्दाफ़ी उदासीन कैसे रह सकते हैं? उन्होंने दलील दी कि विदेशी सरकारें गद्दाफ़ी से बातचीत नहीं कर रहीं हैं इसीलिये वे आप्रवासियों को इटली भेज रहे हैं। 

  Source: http://www.radiovaticana.org/in1/index.asp

सैकड़ों लोगों की गवाही पोप जोन पौल द्वितीय ने उनके जीवन को बदला, बचाया

In Audience, Church, Church Document, Dialogue, Journey, News, Peace & Justice, Uncategorized, Unity, VR Hindi e-Samachar, Youth on April 29, 2011 at 11:56 pm
संत पापा जोन पौल की कब्र के पास विनती करती हुई धर्मबहनें

जोसेफ कमल बाड़ा

 वाटिकन सिटी, 29 अप्रैल, 2011 (सीएनएस ) सैकड़ों लोग सार्वजनिक रूप से गवाही दे रहे हैं कि पोप जोन पौल द्वितीय ने उनके जीवन को बदल दिया है या उनके जीवन को बचाया है। विभिन्न आयु वर्ग तथा देशों के लोगों ने अपना साक्ष्य वेबसाईट http://www.karol-wojtyla.org को भेजा है।

इस बेवसाइट का संचालन रोम धर्मप्रांत द्वारा किया जाता है जो स्वर्गीय संत पापा की धन्य और संत घोषणा प्रकरण के लिए समर्पित है। 28 अप्रैल तक विभिन्न भाषाओं वाली इस साईट में 400 से अधिक लोगों के साक्ष्यों को प्रकाशित किया गया है कि संत पापा जोन पौल द्वितीय की मध्यस्थता से उनकी प्रार्थनाएं पूरी हुई या वे कलीसिया में वापस आये हैं।

अनेक लोगों ने अपने साक्ष्यों में संत पापा जोन पौल द्वितीय की मध्यस्थता से प्रार्थनाओं या निवेदनों के पूरा होने, जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक सम्पन्न होने या पारिवारिक कठिनाईयों का समाधान होने के लिए धन्यवाद व्यक्त किया है।

पोप की विभिन्न प्रेरितिक यात्राओं के समय उनसे मुलाकात होने या उन्हें देखने से मिले अनुभवों के बारे में अनेक लोगों ने कहा कि उन्होंने पवित्र और करिश्माई व्यक्ति की उपस्थिति का अनुभव पाया।

1 मई को सम्पन्न होनेवाले पोप जोन पौल द्वितीय की धन्य घोषणा समारोह के लिए रोम शहर और वाटिकन परिसर में व्यापक और भव्य तैयारी की

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