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Archive for the ‘Sunday Reflection’ Category

खजूर रविवार, दुःखभोग रविवार

In Sunday Reflection on March 28, 2012 at 9:26 pm

1 अप्रैल, 2012

इसायस 50: 4-7

फिलिप्पियों के नाम पत्र  2: 6-11 

संत मारकुस: 1-10; 14: 1-15:47

जस्टिन तिर्की, ये.स.

कोयला श्रमिक की कहानी

आज के रविवार को खजूर रविवार या दुःखभोग के रविवार के रूप में जाना जाता है। आज मैं आपलोगों को एक घटना के बारे में बताता हूँ। एक बार ऐसा हुआ कि एक कोयले के खदान के धँस जाने से कुछ लोग उसमें फँस गये थे। कंपनी वालों के प्रयास से बहुतों को तो सुरक्षित निकाल लिया गया। पर अंत में पाया गया कि तीन लोग फँसे रह गये। लोगों को यह भी जानकारी दी गयी कि जहाँ वे तीनों काम कर रहे थे उस क्षेत्र में विषैली गैस की संभावना प्रबल थी। तीनों परिवार के लोगों ने कंपनी से गुहार लगाया कि उनके परिवार के लोगों को बचाने का उपाय किया जाये। जो खानों में बचाने के अनुभवी लोग थे उन्हें भी भय होने लगा कि बचाने के सिलसिले में कहीं उनकी ही जान न चली जाये। जब इसकी बात चल ही रही थी कि एक बचाव दल के एक नौजवान ने कहा कि वह खदान के अंदर जायेगा और उन तीन लोगों को बचाने का प्रयास करेगा। सब कुछ तैयार हो गया। वह व्यक्ति खदान के अंदर जाने की पूरी तैयारी कर ली। अपने हेलमेट पहन लिये और ऑक्सीजन का सेलिन्डर अपने अपनी पीठ पर बाँध लिया। इसी समय समाचार पत्र वालों ने उस व्यक्ति को घेर लिया और कहा, “भाई साहब आप खदान के अंदर जा रहे हैं?” उस युवक ने कहा ‘हाँ’ । “क्या आप सोचते हैं कि वे जीवित होंगे उसका जवाब था ‘हाँ’।” उनका अगला सवाल था, “क्या आपको मालूम है कि अंदर जहरीली गैस है?” उसका जवाब था ‘हाँ’। “आप फिर भी जा रहे हैं? उसका जवाब था ‘हाँ’। और उनके देखते-देखते उस युवक ने उस सीढ़ी की ओर अपना कदम रखा जहाँ से उतर कर लोग कोयले की खदान की गहराई में उतरते हैं।

कर्त्तव्य का पालन

मित्रो, कर्त्तव्य का पालन वफ़ादारी से करने वाले ही ईश्वर की इच्छा का भी पालन करते हैं और ऐसे लोग महान् होते हैं। ऐसे लोग इसीलिये जीते और मरते हैं ताकि दूसरों का कल्याण हो। Read the rest of this entry »

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चालीसे का पाँचवा रविवार

In Church, Sunday Reflection on March 21, 2012 at 8:49 am

25 मार्च, 2012
नबी येरेमियस का ग्रंथ 31, 31-34
इब्रानियों के नाम 5, 7-9
संत योहन 12, 20-33
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जस्टिन तिर्की, ये.स.

सैनिक की कहानी
आज आप लोगो को सैनिक के बारे में बताता हूँ। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान में कुछ सैनिकों को बंधक बना लिया गया था। उनसे रोज़ काम कराया जाता था। एक कमरे में 100 बन्दियों को रखा गया था और काम करने के लिये बंदी सैनिकों को 100 औज़ार दिये जाते थे। जापानी सैनिक रोज दिन गिन कर औज़ारों को बंदियों के बीच बाँटते और शाम को फिर गिन कर ही वापस ले लेते थे। जापानी सुरक्षा कर्मी बहुत सतर्क थे कि कहीं कोई ज़मीन खोदने वाला औज़ार छुपा न ले, उससे ज़मीन की खुदाई कर कोई सुरंग न बना ले और बंदी-कैंप से भाग जायें। एक दिन की घटना है – शाम का समय था- काम समाप्त हो चुका था और बंदियों ने अपना सामान जमा कर दिया था। जापानी सुरक्षा कर्मी ने औज़ारों की गिनती की और गिनती के बाद पाया कि उसमें सिर्फ़ 99 औज़ार हैं। तब जापानी सुरक्षाकर्मी ने चिल्लाते हुए कहा कि जब तक कोई व्यक्ति यह न बताये कि किसने औजार छिपाया है वह सबों को बारी-बारी से पीटता रहेगा। सुरक्षाकर्मी की मार से सबों को बहुत डर लगा क्योंकि वह बड़े ही बेरहमी से मार-पीट करते थे। पूरे कैम्प में हडकंप मच गया कि किसने औज़ार छिपाया है। किसी ने नहीं बताया कि किसने ऐसा किया है । कुछ देर के बाद जापानी सुरक्षाकर्मी ने कहा कि अब सभी बंदी मार खाने के लिये तैयार हो जायें। जेल के सुपरिनटेनडेंट ने कहा कि तुम में से किसी ने नहीं बताया कि किसने औज़ार छुपाया है अब तुम सबों को सजा मिलनी चाहिये। उसने कोड़ा उठाया इसी समय एक युवा बन्दी सैनिक सामने आया और कहा कि औज़ार उसने छिपाये हैं। इतना कहना था उस जापानी सुरक्षाकर्मी ने उसे सबके सामने पीटना शुरु किया जब तक वह वहीं बेहोश न हो गया। पीटने के बाद उसने औज़ारों की फिर से गिनती की तब उसने पाया कि पूरे के पूरे 100 औज़ार वहाँ पर हैं। दरअसल सुरक्षाकर्मियों ने गिनने की गलती की थी उस युवा बन्दी ने औज़ार नहीं छुपाये थे पर उन्होंने गलती इसलिये स्वीकार ली ताकि बाकी मार खाने से बच जायें। बाद में सूचना दी गयी औज़ारों की संख्या तो 100 रह गयी पर बन्दियों सैनिकों की संख्या उस युवा बन्दी के त्याग और बलिदान के कारण 99 हो गयी। अत्यधिक रक्तप्रवाह के कारण युवा बन्दी सैनिक की मृत्यु हो गयी थी। Read the rest of this entry »

चालीसा का चौथा रविवार

In Church, Sunday Reflection on March 16, 2012 at 7:24 am

चालीसा का चौथा रविवार

2 इतिहास ग्रंथ 36:14-16, 19-23;                                                                                                                                                    एफ़ेसियों 2:4-10;
योहन 3:14-21
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जस्टिन तिर्की, ये.स.

प्रकाश की कहानी
आज आप लोगों को एक कहानी बतलाता हूँ – एक बालक के बारे में, उसका नाम था – प्रकाश। प्रकाश सात साल का था। उसकी बहुत इच्छा थी की वह एक दिन पहाड़ पर चढ़े और पूरी दुनिया की सुन्दरता को निहारे। एक दिन स्कूल के शिक्षक ने एक योजना बनायी और उसके तहत् 20 विद्यार्थियों को पास के एक पहाड़ में ले जाया गया। सभी बच्चों ने पहाड़ का आनन्द लिया। जब बच्चे पहाड़ पर थे तो बच्चों का एक और दल भी पहाड़ पर पहुँचा। बच्चे चिल्लाने लगे और अपने आवाज़ की प्रतिध्वनि सुन-सुनकर बहुत आनन्दित थे। प्रकाश भी प्रसन्न था क्योंकि पहाड़ पर जाने का उसका यह पहला अनुभव था। जब सभी बच्चे खाना खा चुके थे तो शिक्षक ने कहा कि उनके पास अब सिर्फ़ एक घंटा है वे अंतिम बार पहाड़ के ऊपर से दुनिया को देखने का आनन्द ले लें फिर वे अपने घर वापस जायेंगे। प्रकाश बिना समय गँवाये अपने दोस्तों से हटकर एक पत्थर पर चढ़ गया और चिल्लाया “हैलो” और आवाज़ आयी ‘हैलो’ प्रकाश ने कहा, “तुम कौन? ” आवाज़ आयी ‘तुम कौन’? प्रकाश ने चिल्लाया,”पहले तुम” आवाज़ आयी, ‘पहले तुम’ प्रकाश ने कहा, “मैंने पहले पूछा” प्रतिध्वनि गूँजी, ‘मैने पहले पूछा’ प्रकाश ने कहा, “मैंने पहले” आवाज़ आयी,”मैंने पहले” प्रकाश ने नाराज़ होते हुए कहा, “आइ हेट यू” और उसका जवाब भी वही था ‘आइ हेट यू’।

प्रकाश रुँआसा हो कर शिक्षक के पास गया और कहा, सर आपने कहा कि यह पहाड़ इतना सुन्दर है अच्छा है पर उसने मुझे ‘आइ हेट यू’ कहा। शिक्षक ने कहा, “प्रकाश जाओ उसी पत्थर पर चढ़ो और तीन बार चिल्लाओ, “आइ लव यू, आइ लव यू, आइ लव यू” प्रकाश तुरन्त गया और चिल्लाया “आइ लव यू” और आवाज़ आयी “आइ लव यू”। प्रकाश खुश हो गया और बार-बार चिल्लाया आइ लव यू और बार-बार प्रतिध्विनि सुनाई पड़ी आइ लव यू, लव यू, लव यू —–।

जो हम दुनिया को देते हैं वही पाते हैं। प्रेम बाँटने से प्रेम वापस आता है प्रेम प्रतिध्वनित होता है और प्रेम का विस्तार होता है। Read the rest of this entry »

चालीसा का तीसरा रविवार

In Church, Sunday Reflection on March 6, 2012 at 7:43 pm

11 मार्च, 2012

निर्गमन ग्रंथ  20, 1-17

कुरिंथियों के नाम  1, 22-25

संत योहन  2, 13-25

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जस्टिन तिर्की,ये.स.

 फादर जोन की कहानी

आज एक पल्ली पुरोहित के बारे बतलाता हूँ जिनका नाम था जोन। जब उन्हें एक नये पारिश में भेजा गया तो वे उस पल्ली के हर एक परिवार में  जाकर, परिवार के सदस्यों से मिलना शुरु किया। वे दिन को पल्ली के कार्य करते और शाम होते ही वह अपनी साईकिल में सवार होकर निकल जाते थे। जब वे उस किसी परिवार में जाकर प्रार्थना समाप्त करते तब ही घर आते और खाना खाते और फिर सो जाया करते थे। फादर जोन की यह दिनचर्या बन गयी थी। चालीसा का समय था। उस शाम को मौसम कुछ ठंढा होने के कारण फादर जोन ने कुछ गर्म कपड़े पहने, सिर में एक टोपी लगायी, अपनी साईकिल में सवार हो पास के एक गाँव की ओर चल पड़े। जब उन्होंने प्रार्थना समाप्त की तब रात के करीब नौ बज चुके थे।जब वे घर लौटने लगे तो रास्ते में किसी ने उन्हें रोका और रिवाल्वर दिखाया और कहा,”पैसा दो नहीं तो गोली मार दूँगा।” फादर जोन घबराये। वह कुछ बोल ही नहीं पा रहा थे। तब उस डकैत ने उसका कॉलर पकड़ा और कहा,”पैसा प्यारी है या जान।” फादर ने सफाया देते हुए कहा,”उसके पास पैसे नहीं हैं वह एक पास के गाँव में प्रार्थना करने गया था और अभी लौट रहा है।” जब उस डकैत को मालूम हुए कि वे एक फादर हैं तब उसने भी दया दिखाते हुए कहा, “ओ… तो आप फादर है तो आप जा सकते हैं। फादर जोन आश्चर्य चकित हो गया और वहाँ से आगे बढ़ने लगा। फिर उस व्यक्ति के द्वारा दिखाये गये स्नेह और आदर के उत्तर में उन्होंने उस व्यक्ति की ओर सिगरेट बढ़ाया और कहा,”सिगरेट पी लीजिये। अभी भी ठंढ है।” तब उस व्यक्ति ने कहा, “फादर मैं चालीसा काल में सिगरेट का सेवन नहीं करता हूँ।” हम कई बार छोटी बातों में धार्मिकता दिखाते हैं किन्तु जिस धार्मिकता से हमारा जीवन सुरक्षित हो सकता है उसे भूल जाते हैं।  कई बार हम रीति रिवाज़ पूरा करने में पीछे नहीं रहते पर वास्तव में दिल से अपने विश्वास को नहीं जीते हैं। प्रभु येसु ने अपने जीवन काल में किसी भी प्रकार के ढोंग का विरोध किया। उनकी इच्छा थी कि व्यक्ति अपने शरीर का, अपने मंदिर का रक्षक बनने का ढोंग न रचे पर दिल से उसकी रक्षा करे, उसे संवारे और हर पल उसे ईश्वर के योग्य बनाने के लिये कार्य करे। Read the rest of this entry »

चालीसा का दूसरा रविवार,

In Church, Sunday Reflection on March 3, 2012 at 12:08 pm
  • जस्टिन तिर्की, ये.स,

4 मार्च, 2012, ‘B’
उत्पति ग्रंथ 22, 1-2, 9-13, 15-18
रोमियों के नाम पत्र 8, 31-34
संत मारकुस 9, 2-10

मारकुस की कहानी
आज आपलोगों को एक कहानी बतलाता हूँ, एक बूढ़े के बारे में जिसका नाम था मारकुस। इस कहानी को आध्यात्मिक और प्रेरणादायक कहानी बतानेवाले फादर अंतोनी डेमेल्लो येसु समाजी लोगों का बतलाया करते थे। मारकुस जब 35 साल का एक छरहरा जवान था तो बह बहुत ही क्रांतिकारी था और भगवान से उसकी सिर्फ़ एक ही प्रार्थना होती थी। “हे प्रभु कृपा दे कि मैं दुनियां को बदल सकूँ।” यही प्रार्थना करते-करते उसके पचास साल हो गये पर दुनिया में कुछ ख़ास परिवर्त्तन नहीं हुआ। उसने ऐसा महसूस किया कि उसकी आधी ज़िदगी तो गुज़र गयी है और अबतक उसने किसी एक व्यक्ति को भी नहीं बदला है। तब उसने अपनी प्रार्थना ही बदल दी। उसने कहना आरंभ किया “हे प्रभु मुझे कृपा दे कि मैं अपने परिवार के सदस्यों और अपने मित्रों को बदल सकूँ।” समय बीतता गया पर उसे लगने लगा कि किसी के जीवन में कोई ख़ास बदलाव नहीं आये हैं। कुछ और साल बीते अब तो मारकुस बुढ़ापे की दहलीज़ पर था। उसने अपने आप से कहा ये तो गज़ब हो गया, न तो दुनिया बदली, न उसके परिवार वाले और न ही उसके मित्रगण। उसे यह भी आभास हो गया कि अब उसके दिन गिने हुए है। तब उसने अपनी प्रार्थना फिर से बदल डाली। उसने कहना आरंभ किया, “हे प्रभु मुझे कृपा दे कि मैं अपने आप को ही बदल सकूँ।” इस प्रार्थना के बाद मारकुस ने पाया कि उसकी उस प्रार्थना से उसका जीवन बदलने लगा और उसने यह भी अनुभव किया कि इससे न केवल उसका जीवन पर उसके आस-पास रहने वाले लोगों का जीवन भी बदलने लगा। आंतरिक बदलाव ही अर्थपूर्ण और प्रभावकारी होता है। Read the rest of this entry »

रविवारीय सुसमाचार पर चिन्तन 26 फरवरी, 2012

In Sunday Reflection on February 23, 2012 at 1:24 pm

चालीसे का पहला रविवार वर्ष ‘ब’

26 फरवरी, 2012

उत्पति ग्रंथ 9, 8-15

संत पेत्रुस का पत्र 3, 12-15

संत मारकुस 1, 12-15

अजय की कहानी

आप लोगों को आज एक बालक की कहानी बताता हूँ जिसका नाम था – अजय। अजय के घर में सिर्फ उसकी माँ थी। अजय जब पाँच साल का था उसी समय उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी। उसकी माँ शहर में रोज काम करने जाती थी और जो पैसे मिलते थे उसी से उन दोनों का जीवन-बसर हो रहा था। जब अजय सुबह को स्कूल जाता था तब उसकी माँ भी अपने काम पर चली जाती थी। एक दिन की बात है अजय स्कूल से एक पेंसिल लाया और उसने उसे अपनी माँ को दिखाया। माँ ने उससे पूछा तक नहीं कि उसे वह पेंसिल कहाँ से मिली। इसके ठीक विपरीत उसने उसे प्रोत्साहन देते हुए कहा कि शाबाश बेटे यह अच्छी पेंसिल तुमने घर ले आया। दूसरे दिन अजय ने एक किताब लायी फिर माँ का प्रोत्साहन मिला। फिर अगले दिन कोई कॉपी कोई रबर तो कोई नयी कलम घर आती गयी। माँ ने बच्चे के इस व्यवहार के लिये न हीं कोई सवाल किया न नहीं कोई परेशानी ही दिखायी। अजय घर से बाहर जाता तो अवश्य ही कोई- न-कोई नयी वस्तु ले आता था। कभी-कभी तो माँ ने उसकी जेब में कुछ पैसे भी देखे। पर माँ को इस बात का साहस ही न होता कि वह पूछे कि वे पैसे कहाँ से आते हैं। समय बीतता चला गया। अजय जवान हो गया अब तो वह 20 साल का एक छरहरा जवान ल़ड़का बन गया था। एक समय की बात है कि अजय कुछ दिनों के लिये बाहर चला गया था और वह सप्ताह भर भी नहीं आया। माँ परेशान हो गयी कि आख़िर अजय गया कहाँ। एक दिन किसी ने बताया कि स्थानीय समाचार पत्र में उसका नाम छपा था। वह किसी बैंक डकैती के आरोप में गिरफ़्तार हुआ उसे फाँसी की सजा सुनायी गयी। जब अजय को उसकी अंतिम इच्छा के बारे में पूछा गया तब उसने अपनी इच्छा जतायी कि वह अपनी माँ से मिलेगा। उसकी माँ उससे मिलने जेल गयी । अजय अपनी माँ से गले मिला और उसके बाद उसने कहा चुम्बन देते हुए अपनी माँ की जीभ काट लिया। वहाँ पर उपस्थित लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया है तब उसन कहा कि अगर मेरी माँ ने मेरी चोरी करने की आदत के बारे में बचपन में ही टोका होता तो मुझे आज फाँसी की सज़ा नहीं होती। छोटी बुरी आदत के प्रलोभन में फँसकर व्यक्ति कई बड़ी गलतियाँ कर बैठता है।पर अगर प्रलोभनों को जीत जाता है तो वह एक मजबूत और शक्तिशाली इंसान बन जाता है। रविवारीय आराधना विधि कार्यक्रम के अन्तर्गत् पूजन-विधि पंचांग के वर्ष के चालीसा काल के पहले रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं। प्रभु हमें अपने उदाहरण से ही यह बताना चाहते हैं कि प्रलोभन हमारे जीवन का एक हिस्सा है। अगर हम जीत जाते हैं तो ईश्वर के कार्य को मजबूती से बढ़ा पाते हैं पर अगर हम छोटे-छोटे प्रलोभनों पर विजय प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो हम कमजोरियों के ऐसे दलदल में फँसते हैं जहाँ से हम जितना बाहर आना चाहते हैं हैं उतने ही नीचे खिसकते जाते हैं। श्रोताओ आइये हम आज के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठ को पढ़ें जिसे संत मारकुस रचित सुसमाचार के पहले अध्याय के 12 से 15 पदों से लिया गया है।

सुसमाचार पाठ

येसु के बपतिस्मा के बाद आत्मा उन्हें निर्जन प्रदेश में ले चला। येसु चालीस दिन वहां रहे और शैतान ने उनकी परीक्षा ली। वह बनैले पशुओं के साथ रहते थे और स्वर्गदूत उनकी सेवा करते थे। योहन के गिरफ़्तार हो जाने के बाद येसु गलीलिया आये और यह कह कर सुसमाचार का प्रचार करने लगे, ” समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज निकट आ गया है । पश्चात्ताप करो और सुसमाचार पर विश्वास करो। ”

मेरा विश्वास है कि आपने आज के सुसमाचार को ध्यान से पढ़ा है। आज प्रभु के दिव्य वचन बहुत लम्बे तो नहीं है पर इसमें जिन बातों की चर्चा की गयी है वे हमारे लिये अति महत्त्वपूर्ण हैँ। जिन बातों की आज के सुसमाचार में इंगित सिर्फ़ किया गया है उनमें पहली बात है कि येसु को शैतान ने परीक्षा ली। आपको यह जान कर परेशानी हुई होगी या फिर बार-बार सुनते-सुनते अब परेशानियाँ भी नहीं होतीं होगी। मैं तो परेशान हुआ कि प्रभु को भी शैतान की परीक्षा झेलनी पड़ी। क्या प्रभु को भी प्रलोभनों का सामना करना पड़ा। जी हाँ , प्रभु को भी आम ईशभक्तों की तरह परीक्षाओं में पास होना पड़ा और तब ही वे सच्चे रूप में विजयी हुए और सच्चे रूप में लोगों के लिये प्रलोभनों और जीवन के अवरोधों को पार करते हुए मुक्ति का मार्ग दिखाने में सक्षम हो पाये। कई बार मेरे मन में यह विचार उठता है कि ईश्वर मनुष्य से परीक्षायें क्यों लेते हैं। कभी तो मुझे यह सोचने का मज़बूर होना पड़ा है कि ईश्वर अपने प्रियजनों को क्यों शैतान से पूर्णतः बचा नहीं लेते हैं। मेरे आध्यात्मिक फादर ने मुझे बताया कि ईश्वर हमारा कल्याण चाहते हैं पर हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं ताकि हम पूरी स्वतंत्रता से ईश्वर को हाँ कहें और उसकी इच्छा के अनुसार अपना जीवन जीते हुए एक दिन येसु के योग्य बन सकें। कई बार हम सोचते हैं कि ईश्वर कमजोरियों में फँसने के लिये हमें छोड़ देते हैं। कई बार हम यह भी सोचने लगते हैं कि जब भी हम कुछ अच्छा कार्य करना चाहते हैं तो हम प्रलोभनों और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। क्या आपने कभी इस बात पर भी ग़ौर किया है कि प्रलोभन और परीक्षायें अपने आप में बुरी भी नहीं हैं।

प्रलोभन

अगर आप अपने जीवन को ग़ौर करेंगे तो आप पायेंगे कि इन प्रलोभन हमारे जीवन में कई अनमोल वरदान ले आयें हैं। धर्म के विद्वानों ने बताया है कि प्रलोभन आना मानव जीवन का अभिन्न अंग है और हमारे जीवन में लगातार आने वाले प्रलोभनों के कई अच्छे कारण हैं और इससे मानव जीवन को बहुत लाभ होता रहा है। पहली बात तो यह कि ईश्वर हमारे जीवन में प्रलोभनों को आने देते हैं ताकि हम अनुभव के द्वारा यह सीखें कि हम जीवन में विजयी हो सकते हैं ताकि हम रोज दिन शैतान के सामने मजबूत होते रहे। दूसरी बात ईश्वर हमें इस भ्रम से बचाना चाहते हैं कि सब कुछ ईश्वरीय वरदान है और मनुष्यों को इस जीवन में कुछ नहीं करना है ताकि भाग्यावादी न वन जाये। तीसरी बात कि प्रलोभनों से शैतान को यह पता चले कि मानवपु्त्र ने शैतान पर पूर्ण रूप से विजय पायी है और शैतान मानव से बड़ा नहीं है।चौथी बात श्रोताओ कि जब हम जीवन में संघर्ष करें तो हम अपने जीवन में सुदृढ़ होवें। और पाँचवी बात जिस जो हमें प्रलोभन से मिलते हैं वह है कि हमें यह आभास मिले कि ईश्वर का वरदान कितना मूल्यवान है। इन्हीं कारणों से ईश्वर हमारे जीवन में प्रलोभनों को आने देते हैं। प्रभु स्वयं ही प्रलोभनों पर विजयी होकर हमें यह बताया है कि हर प्रलोभन के समय हमें इस गुण और विश्वास में सुदृढ़ होना है कि हम ईश्वर की संतान हैं और हम ईश्वर के लिये ही आजीवन कार्य करते रहेंगे।

ईश्वर का राज्य, पश्चात्ताप और विश्वास

आज के सुसमाचार में हम और तीन महत्त्वपू्र्ण बातों की चर्चा पाते हैं। येसु पूरी दुनिया को सुसमाचार सुनाने लगे। अगर उनकी बातों को बहुत ही संक्षेप में कहा जाये तो हम कह सकते हैं उन्होंने कहा समय के बारे में ईश्वर का राज्य बारे में, पश्चात्ताप और विश्वास के बारे में। कभी आपने सोचा है कि इन चार बातों को समझने से हमें जीवन की खुशी मिल सकती है। प्रभु ने समय के बारे में कहा कि यह पूरा हो चुका है। कई बार हम यह सोचते-सोचते ही अपना जीवन गँवा देते हैं कि हम भली बातें सोचेंगे, करेंगे और भला बनेंगे। प्रभु का कहना है जो अच्छी बातें सोचते हैं उसे करने का समय आ गया। दूसरी बात प्रभु हमें बता रहे हैं वह कि हम इस बात को जानें कि ईश्वर का राज्य हमारे पास है हमारे घरों में है हमारे दिलों में है। बस ज़रुरत है कि हम उसे देखें पहचानें और उसे अपने जीवन में उचित स्थान दें। कई बार आपने लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि दुनिया ख़राब है लोग ख़राब है कोई अपने नहीं हैं दुनिया रसातल की ओर जा रही है। इन सब सोच-विचारों के जवाब में प्रभु आज कह रहे हैं कि स्वर्ग का राज्य मुझमें है हर दूसरे जन में है हमारे अन्तरतम् है हमारे चारों ओर है। बस हमें ज़रुरत है उसे देख पाने की। प्रभु की तीसरी बात भी स्वर्ग राज्य को खोजने के क्रम की अगली कड़ी है। प्रभु का आमंत्रण है कि हम पश्चाचत्ता करें। पश्चात्ताप अर्थात् हम प्रभु की ओर मुढ़ें। प्रभु के मार्ग को पहचानें और उसकी ओर लौटें।अपने पुराने रास्ते को छोड़ कर हम प्रभु की इच्छा के अनुसार आचरण करें। श्रोताओ यह भी सत्य है कि प्रभु की इच्छा के अनुसार चलने के लिये यह भी ज़रुरी है कि उनकी इच्छा को जानें । प्रभु हमें इस बात के लिये भी हमें आमंत्रित कर रहे हैं कि हम उनकी बातों पर विश्वास करें। मुझे इस बात का भी पक्का विश्वास है कि जिन बातों की प्रभु ने आज चर्चा की है उस हमने कई बार सुना है पर आज जब हम चालीसे के विशेष काल में हैं तो मैं आप लोगों का ध्यान इस ओर करना चाहूँगा कि क्या आपने इन बातों को सुन कर क्या आपने ने खुद को सुन्दर बेहत्तर और भला बनाने का प्रयास किया है। क्या आपने कभी सोचा है कि ईश्वर मेरे पास ही है कि हर दूसरे व्यक्ति में ईश्वर का वास है कि हमें विभिन्न नासमझियों के बावजूद एक-दूसरे के साथ अच्छा रिश्ता बनाने के लिये प्रयासरत रहना है। क्या कभी आपने इस बात पर ग़ौर किया है कि मानव के ईश्वर का प्रतिरूप है और उसके अंदर में अच्छाई और भलाई का केन्द्र है और इसी की ओर उसे बार-बार लौट के आना है ताकि हम ईश्वर का गहरा अनुभव कर सकें। हम अच्छाई, भलाई और सच्चाई को पाने के लिये जितने उत्साहित है शैतान भी उतनी उत्साह से हमें अपने मार्ग से भटकाने के लिये प्रयत्नशील है और हम कई बार उसके भंवर में फँस जाते हैं ठीक उस अजय की तरह जिसने कभी अपने कर्मों पर विचार नहीं किया और छोटे-छोटे प्रलोभनों में फँसता चला गया और ईश्वर से दूर चला गया।

प्रभु हमें इस चालीसे काल में झकझोरते हुए बुला रहे हैं और कह रहे हैं भले काम के लिये पश्चात्ताप के लिये और ईश्वर की ओर लौटने के लिये कभी देर नहीं होती। प्रभु तो सदा हमारे पास रहते हैं हम ही प्रभु से दूर भटक जाते हैं। हम कभी न समझें कि समस्या हमसे बड़ी है बुराई हमसे बड़ी है या प्रलोभन हमसे बड़े हैं। प्रलोभन और परीक्षायें तो हमारे लिये एक अवसर है जिसमें हम शैतान को बता सकते हैं कि हम अपने विश्वास में कितने मजबूत है कि हम ईश्वर को कितना प्यार करते हैं और सत्य भला और अच्छा ही जीतेगा भला ही राज्य करेगा।

वर्ष का सातवाँ रविवार

In Sunday Reflection on February 15, 2012 at 11:00 pm

19 फरवरी, 2012, ‘B’

नबी इसायस का ग्रंथ 43 : 18-19, 21-22, 24-25

कुरिन्थियों के नाम 1 : 18-22

संत मारकुस 2 : 1-12


जस्टिन तिर्की,ये.स.

राजू और विजय

आइये आज आप लोगों को दो दोस्तों के बारे में एक कहानी बतलाता हूँ। एक का नाम था राजू और दूसरे का नाम था विजय। राजू की सिर्फ माँ जीवित थी और विजय के माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी। विजय सदा ही राजू के घर में ही आकर रहा करता था। दोनों साथ-साथ पढ़ते, खेला करते, हँसी मज़ाक किया करते थे और जब भी कहीं जाते तो साथ ही जाते थे। दोनों की दोस्ती से माँ बहुत खुश हो गयी। एक बार की बात है कि राजू और विजय में किसी बात के लिये मनमुटाव हो गया। दोनों झगड़ पड़े और झगड़ा की इतनी हद तक हो गयी कि लडाई के क्रम में राजू की मृत्यु हो गयी। राजू की माँ बहुत रोयी। पुलिस ने विजय को पकड़ा और उसे जेल की सजा सुनायी गयी। उसे जेल के अन्दर बन्द कर दिया गया। विजय जेल में किसी से मिलना नहीं चाहता था। एक दिन राजू की माँ विजय से मिलने आयी । विजय ने मिलने से साफ़ इन्कार कर दिया। कुछ दिनों के बाद राजू की माँ विजय से फिर मिलने आयी पर उसने फिर इंकार कर दिया। जब राजू की माँ ने जेलर से बार-बार आग्रह किया कि वह विजय से एक बार मिलना चाहती है तो जेलर ने विजय से कहा कि वह राजू की माँ की ख़ातिर उससे मिले। विजय राजी हो गया। माँ मिलने आयी। उसने विजय से हाल-चाल पूछा पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया। राजू की माँ ने कहा कि वह विजय से कुछ माँगना चाहती है। विजय ने कहा कि उसके पास कुछ नहीं है वह कुछ नहीं दे सकता है। पर राजू की माँ ने कहा कि वह उससे एक निवेदन करना चाहती है। पर विजय ने माँ की एक नहीं मानी। जेल की खिड़की से दूर जाते हुए राजू की माँ ने कहा, “विजय जब मैं दूसरी बार आऊँगी तो तुमसे एक विशेष बात करूँगी”।विजय लाज़ और दोषभावना से ग्रसित हो राजू की माँ को बिना देखे ही “हाँ” कहा था।  कुछ दिन बाद जब राजू की माँ दूसरी बार विजय से मिलने आयी तो उसने विजय से कहा, “विजय, तुमसे सिर्फ़ एक ही बात कहने यहाँ आयी हूँ”। विजय ने कुछ नहीं कहा। राजू की माँ ने कहा, “राजू मेरा एक ही बेटा था, वह अब नहीं है। क्या तुम मेरा बेटा बन सकते हो”। विजय ने एक बार माँ की ओर देखा, मानो तुम यह क्या! यह क्या कह रही हो ? माँ ने दोबारा वही कहा विजय क्या तुम मेरा बेटा बन सकते हो। और विजय रो पड़ा।

माँ की ममता और वात्सल्यता की चरमसीमा में न केवल प्यार था पर क्षमाशीलता और अगाध प्रेम  का एक ऐसा मिश्रण था जो अतुलनीय है। श्रोताओ रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अन्तर्गत् पूजन-विधि पंचांग के वर्ष के सातवें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहें हैं। प्रभु आज हमें आमंत्रित कर रहे हैं ताकि हम क्षमा जैसे एक महान् गुण के बारे में मनन करें उसे अपनायें और मानव जीवन को पूरी आध्यात्मिक खुशी के साथ बिता सकें। आइये आज हम संत मारकुस रचित सुसमाचार के दूसरे अध्याय के 1 से बारह पदों को सुनें जिसमें येसु ने हमें बताया है कि वे इस दुनिया में  आये ताकि हम क्षमा का पाठ सिखायें और नया और पूर्ण जीवन जीयेँ

सुसमाचार पाठ

जब येसु क़फ़रनाहूम लौटे, तो यह खबर फैल गयी कि वह घर पर हैं और इतने लोग इकट्ठे हो गये कि द्वार के सामने जगह नहीं रही। येसु उन्हें सुसमाचार सुना ही रहे थे कि कुछ लोग एक अर्धांगरोगी को चार आदमियों से उठा कर उनके पास ले आये। भीड़ के कारण वे उसे येसु के सामने नहीं ला सके, इसलिये जहाँ येसु थे उसके ऊपर की छत उन्होंने खोल दी और छेद में से अर्धांगरोगी की चारपाई नीचे उतार दी। येसु ने उन लोगों का विश्वास देखकर अर्धांगरोगी से कहा, “बेटा। तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं।”कुछ शास्त्री वहाँ बैठे थे। वे सोचने लगे – यह क्या कहता है? यह ईश-निन्दा करता है। ईश्वर के सिवा कौन पार क्षमा कर सकता है ? येसु को मालूम ही था कि वे मन-ही-मन ऐसा सोच रहे हैं । उन्होंने शास्त्रियों से कहा, “मन-ही-मन क्या सोच रहे हो ? अधिक सहज क्या है अर्धांगरोगी से यह कहना, ‘तुम्हारे पापा क्षमा हो गये अथवा कहना, उठो अपनी चारपाई उठा कर चलो-फिरो? परन्तु इसलिए कि तुम लोग यह जान लो कि मानव पुत्र को पृ्थ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार मिला है” और वह अर्धांगरोगी से बोले – ” मैं तुम से कहता हूँ, उठो और अपनी चारपाई उठा कर घर जाओ।” वह उठ खड़ा हुआ और चारपाई उठा कर तुरन्त सबों के देखते-देखते बाहर चला गया। सब के सब अचंभे में पड़ गये और यह कह कर ईश्वर की स्तुति करने लगे – ऐसा चमत्कार हमने कभी नहीं देखा।

‘क्षमा’ पर चिन्तन

प्रभु के जिन शब्दों ने मुझे प्रभावित किया वे हैं “तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं”। प्रभु बताना चाहते हैं कि जो भी उनके पास विश्वास के साथ आये वे बिना वरदान के वापस नहीं जायेंगे और उन्हें पापों की क्षमा मिल जायेगी। क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया होगा कि इस छोटे से शब्द ‘क्षमा’ में कितनी सारी बातें छिपी हुई हैं। आम तौर से ‘क्षमा कर देना’ में तीन बातें छिपी रहती हैं। पहली तो क्षमा करने वाला व्यक्ति सहनशील होता है इसलिये वह दूसरे व्यक्ति को एक मौका देता है और दूसरा कि क्षमा देने वाला व्यक्ति शांति और सौहार्दपूर्ण जीवन का समर्थक होता है वह चाहता है कि सामुदायिक जीवन हँसी-खुशी से बीते। तीसरा कि वह व्यक्ति आशावादी होता है। वह यह विश्वास करता है कि भविष्य में व्यक्ति को बदला चुकाने या सजा देने के बदले वह प्यार भरा अवसर देता है ताकि व्यक्ति खुद ही अपने जीवन का सुधार करे और आपसी रिश्ते को मजबूत कर सके। सुसमाचार में वर्णित आज की घटना में ये तीनों बातें मौजूद हैं।

जब प्रभु ने कहा,  ‘तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं’ तो क्या आपने सोचा कि प्रभु ने ऐसा क्यों कहा? क्यों प्रभु को पक्का विश्वास हो गया कि जो लोग प्रभु के पास आये हैं वे क्षमा के योग्य हैं? अगर आपने इस बात को भी ध्यान दिया होगा कि प्रभु ने कहा कि ‘उन लोगों’ के विश्वास को देखकर पाप क्षमा की बात कही। यह बात विचारणीय है कि वे लोग कौन थे और उन्होंने क्या किया? वे चार व्य्कति  बीमार व्यक्ति को ढोकर लाने वाले उसके पड़ोसी थे और जब वह व्यक्ति येसु के पास नहीं पहुँच पाया तब उन्होंने उस रोगी को छत्त के रास्ते येसु के सामने रख दिये।

उन चार व्यक्तियों के प्रयासों को अगर हम विचार करें तो हम यह भी पाते हैं कि चारों व्यक्तियों ने हमारे लिये प्रेम, सहानुभूति, सहयोग और एक अच्छे सामुदायिक जीवन का कितना सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। आज के सुसमाचार में वर्णित घटना ही में हम पाते हैं कि सामुहिक प्रयास से प्रसन्न होकर प्रभु ने  अर्धांगरोगी को चंगाई प्रदान किया। दूसरों की भलाई के लिये किया गया भला कार्य प्रभु के लिये विश्वास का साक्ष्य देना है। कई बार इस बात को समझने का प्रयास करते हैं कि विश्वास क्या है? कई बार इस बात को समझने का प्रयास करते है कि प्रभु में विश्वास करने का क्या अर्थ है? आज अर्धांगरोगी को क्षमा देते हुए प्रभु ने विश्वास का अर्थ भी समझाया है। विश्वास का अर्थ यह है हम ईश्वरीय अच्छाई पर भरोसा रखते हुए एक साथ मिलकर दूसरों की मदद करना, भलाई का कार्य करना, व्यक्ति की चंगाई के लिये प्रार्थना करें ज़रूरतमंदों को अच्छे मार्ग पर लाने के लिये प्रयास करना।

प्रभु विश्वास की बात करते हुए हमें यह बताना चाहते हैं कि यदि हम क्षमा चाहते हैं यदि हम शुद्ध होना चाहते हैं, यदि हम शांति चाहते हैं, यदि ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं तो हमें चाहिये कि हम प्रभु की दया, क्षमा और मु्क्ति पर पूर्ण भरोसा रखते हुए भला, अच्छा और सच्चा जीवन जीने के लिये प्रयासरत रहें।

क्षमा की ज़रूरत

सच पूछा जाये तो आज तेजी से बदलती दुनिया को एक गुण की सख्त ज़रूरत है और वह है – क्षमा की। अगर हम दुनिया की घटनाओं पर नज़र फेरेंगे तो आप पायेंगे की व्यक्ति के दिल में चैन नहीं हैं, शांति नहीं है आत्मसंतुष्टि नहीं है इसके पीछे कहीं-न-कहीं एक बात की कमी है। या तो व्यक्ति ने क्षमा नहीं दिया है या क्षमा नहीं पाया है। कई बार हम खुद ही कहते हैं कि मैंने जो ग़लती की है उसके लिये मैं खुद को क्षमा नहीं कर सकता कई बार हम दोस्तों को दगाबाज़ कह कर क्षमा नहीं देना चाहते, कई बार हम अपने पिता को पियक्कड़ कह क्षमा नहीं कर पाते हैं कई बार हम अपने अधिकारियों को पक्षपाती कह कर क्षमा नहीं कर पाते हैं कई बार तो भगवान को भी अन्यायी इसलिये कह डालते क्योंकि वह किसी को ज़्यादा देता किसी को कम। श्रोताओ क्षमा नहीं देने या क्षमा का अनुभव नहीं करना हमारे जीवन में एक ऐसे वरदान का अभाव जिसके कारण हम आसानी से अपने दिल की शांति खो दे सकते हैं। आसानी से मानसिक आध्यात्मिक और कभी-कभी शारीरिक रोग के शिकार हो जाते हैं।

क्षमा का पुरस्कार

क्या इस दुनिया में क्षमा का अभाव हैं । मैं तो ऐसा नहीं मानता। मेरा तो पक्का विश्वास है कि क्षमा  की भावना हमारे दिल में कूट-कूट भरी हुई है। मृत्यु के पहले की प्रभु येसु प्रार्थना कि हे पिता उन्हें क्षमा करना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहें हैं ने दुनिया के अनेक लोगों को प्रभावित किया है। मिसेस स्टेन ने अपनी पति और उसके दो मासूम बच्चों के जलाये जाने के बाद कहा कि वे दुःखी हैं पर क्रोधित नहीं। समाज सेविका रानी मरिया के ह्त्यारे को उसकी बहन ने राखी बाँधा संत पापा जोन पौल द्वितीय ने अपने उपर गोली चलाने वाले को क्षमा दी। हमने कई बार क्षमा और आशा के भाव से ‘ सॉरी ‘  कहे हैं और अपने मित्रों के मुख से यह कहते सुने चलो एक नयी शुरुआत कर लें, बुरी बातों को भूल जायें और अच्छी बातों की नींव पर परिवार का निर्माण करें। श्रोताओ क्षमा शब्द छोटा है पर इस भाव को बढ़ाने इसका उपयोग करने और इसी के बल पर आशामय जीवन जीने के पुरस्कार अपार हैं। क्षमा करने के कई चमत्कार हुए हैं और होते रहेंगे। क्षमा के प्रयास भी कभी व्यर्थ नहीं जाते। क्षमा खुद की आत्मा को तो सुकून देती है दूसरे को भी नया जीवन देती है जैसा कि उसने उस विजय के जीवन को नवीन कर दिया जिसने राजू की हत्या कर दी थी फिर भी राजू की माँ ने क्षमाशीलता की चरमसीमा का परिचय देते हुए ‘ बेटा ‘  कहा।

वर्ष का छठा रविवार, 12 फरवरी, 2012

In Sunday Reflection on February 9, 2012 at 11:27 am

लेवी ग्रंथ 13 : 1-2, 45-46

कुरिन्थियों के नाम 10 : 31-11 : 1

संत मारकुस 1 : 40-45

जस्टिन तिर्की, ये.स.

चुन्नु की कहानी

आज आइये हम एक बच्चे के बारे में चर्चा करें। बच्चे का नाम था – राजू पर उसकी माँ उसे प्यार से ‘चुन्नु’ कह कर पुकारती थी। चुन्नु तीन साल का था। वह सुबह से ही अपने घर के आँगन में खेलता था। कभी गुड़ियों कभी आँगन में गिरी पत्तियों से खेलता तो कभी घर की बिल्ली से तो कभी पिल्लों से। राजू की माँ पास के एक प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका थी। मैं जब भी उधर से गुज़रता तो राजू मेरे पास आता और कहता ‘चाचा’। मैं भी उसे प्यार से पुचकारता और एक टॉफी अवश्य ही दिया करता था। जब भी चुन्नु मुझे देखता तो खुश हो जाता था और मैं भी प्रसन्न हो जाता चुन्नु को देख कर। कई बार तो मैं उसे गोद में उठा लेता। उसे प्यार करता मिठाई देता और फिर हाथ हिला कर उससे विदा लेता था। एक दिन की बात है मैं शहर गया था और वहाँ से चुन्नु के लिये कुछ मिठाइयाँ और कुछ फल ले आया था। जब दूसरी सुबह को मैं अपने काम पर जाने के घर से निकला तो देखा चुन्नु आँगन में नहीं खेल रहा है। मैंने मिठाई की पोटली और फल हाथ में लिये चुन्नु को खोजने लगा पर वह मिला नहीं। तब मैंने आवाज़ लगायी ‘चुन्नु बेटे’ कहाँ हो। कोई जवाब नहीं आया। मैंने उनकी माँ से पूछा कि चुन्नु कहाँ है? मम्मी ने अंदर से ही जवाब दिया “बस आँगन में खेल रहा होगा।”  मैंने कहा, “वह आँगन में नहीं है।” जब मैं खोजता हुआ घर के पिछवाड़े में गया तो देखा कि वह गुसलखाने से निकले रहे गंदे पानी में खेल रहा था। इतना ही नहीं उसके हाथ-पैर गन्दे थे और उसके चेहरे में भी कीचड़ लगे हुए थे। मुझे देख कर वह ‘चाचा मिठाई’ कहता हुआ मेरे पास आया। जब वह मुझे पकड़ना चाहा तब मैंने कहा, “मुझे छूना नहीं, गन्दा लड़का। पहले हाथ-पैर धो लो तब मिठाई।”  वह रुँआसा हुआ पर मैंने उसे मिठाई नहीं दी।तब तक उसकी माँ बाहर आयी और उसने बिना किसी सवाल के बच्चे को अपने हाथों से उठा लिया और बड़े प्यार से कहा, “बेटे पानी में नहीं खेलते हैं ना।”  और फिर उसे धोने लगी और देखते-देखते ही चुन्नु साफ हो गया, नया पकड़ कपड़ा पहन लिया और सुन्दर लगने लगा। मम्मी ने उसका चुम्बन किया दुलारा, पुचकारा और कहा,”मेरा राजा बेटा,  मेरा सुन्दर बेटा।”  और तब मैंने चुन्नु को मिठाई दी। मम्मी ने कहा अंकल को “थैंक यू बोलो ” और चुन्नु ने मिठाई मुँह में डालते हुए कहा “थैंक्यू अंकल।” माँ के लिये पुत्र सदा पुत्र ही रहता है चाहे वह भला कार्य से घर की ख्याति बढ़ा रहा हो या फिर बुरे लत से घर की लाज़ को मिट्टी में मिला रहा हो। चाहे वह स्वस्थ हो या बीमार हो माँ की ममता सदा अपने पुत्र के लिये एक-सा बनी रहती है।

आज हम रविवारीय आराधना चिन्तन के अन्तर्गत पूजन-विधि पंचांग के वर्ष ‘ब’ के छटवें सप्ताह के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर मनन चिन्तन कर रहे हैं। आज प्रभु हमें यह बताना चाहते हैं कि वे पापों, गुनाहों या किसी भी प्रकार की बुराइयों के कारण हमें अपने से दूर नहीं रख सकते हैं । वे तो चाहते हैं कि हम सदा उसके पास लौटते रहें, उसके कृपापात्र बने रहें और सदा ईश्वरीय कृपा के सहभागी बने रहें।

आइये हम संत मारकुस के सुसमाचार के पहले अध्याय के 40 से 45 पदों को पढ़ें जिसमें येसु ने समाज से बहिष्कृत व्यक्ति को शारीरिक, आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से शुद्ध किया।

 सुसमाचार पाठ

एक कोढ़ी येसु के पास आया और घुटने टेक कर उन से गिड़गिड़ाते हुए बोला “आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।”  येसु को तरस आया उन्होंने हाथ बढ़ा कर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, “मैं यही चाहता हूँ -शु्द्ध हो जाओ।” उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हुआ औऱ वह शुद्ध हो गया। येसु ने उसे यह कड़ी चेतावनी देते हुए तुरन्त विदा किया, “सावधान ! किसी से कुछ न कहो। जाकर अपने को याजकों को दिखाओ और अपने शुद्धीकरण के लिये मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओ, जिससे तुम्हारा स्वास्थ्य लाभ प्रमाणित हो जाये।” परन्तु वह वहाँ से विदा हो कर चारों ओर खुल कर इसकी चर्चा करने लगा। इससे येसु के लिये प्रकट रूप से नगरों में जाना असंभव हो गया, और वह निर्जन स्थानों में रहने लगा। फिर भी लोग चारों ओर से उनके पास आते थे।

प्रार्थना की विशेषतायें

आज के सुसमाचार में  जिसने बात ने मुझे प्रभावित किया है वह है – उस कुष्ट रोगी की छोटी प्रार्थना। क्या आपने ग़ौर किया कि उसकी प्रार्थना क्या थी। उस रोगी ने येसु से कहा, “कि अगर आप चाहें तो आप मुझे आप शुद्ध कर सकते हैं।” कितनी सरल प्रार्थना है एक रोगी की। एक ऐसे व्यक्ति की जिसे समाज ने बहिष्कृत कर दिया है। एक ऐसे व्यक्ति की जिसे कोई अपने साथ रखना नहीं चाहता है। एक ऐसे व्यक्ति की जो शारीरिक रूप से कमजोर है, जो सामाजिक रूप से कमजोर है और जो अकेला है। हम सबों को मालूम है कि हमारे समाज में भी कई लोगों को इस प्रकार के अकेलापन का सामना करना पड़ता है। कभी अपने जन्म को लेकर हमें कोई छोटा समझता तो कभी हमारे जन्म स्थान को लेकर तो  कभी महारे ग़रीब परिवार को लेकर । कई बार तो  हमें इसलिये उचित आदर दिया जाता क्योंकि हमारा रंग औरों से भिन्न है। इतना ही नहीं कई बार हम इसलिये भी तिरष्कृत किये जाते हैं क्योंकि  हमारी पढ़ाई-लिखाई अच्छे स्कूलों में नहीं हुई है यह कई बार तो हम इसलिये भी किसी के हँसी के पात्र हुए क्योंकि हम शारीरिक रूप से कमजोर हैं या वैसे सुन्दर नहीं दिखाई देते जैसे लोगों के मन में सुन्दरता के संबंध में समझदारी है।

क्या आपने विचार किया है कि ऐसी परिस्थितियों में हम क्या प्रार्थना चढ़ाते हैं भगवान को? मुझे याद है जब मुझे शारीरिक तकलीफ थी तो मैं कहा करता था प्रभु आपने मुझे यह तकलीफ क्यों दी? क्यों आपने मेरे साथ सौतेला व्यवहार किया।क्यों आपने इतनी कम उम्र में ऐसी तकलीफ़ दी? क्यों आपने मुझको यह दिया और दूसरों को नहीं? मेरे मन-दिल में सवाल-ही-सवाल थे कि क्यों ईश्वर ने मुझे औरों से कम वरदान दिये। और इस तरह से मेरी प्रार्थना, प्रार्थना नहीं ईश्वर से एक प्रकार की ‘शिकायत’ होती थी। आज जब मैं उस कुष्ट रोगी के बारे में मनन-चिन्तन करता हूँ तो इस बात को मैं बहुत स्पष्ट रूप से पाता हूँ कि उस कोढ़ी की प्रार्थना के समान और कोई प्रार्थना हो ही नहीं सकती।

दो बातें

आप मुझे पूछेंगे कि उस रोगी की प्रार्थना क्यों इतनी अच्छी और प्रभावपूर्ण थी। उस कुष्ट रोगी की प्रार्थना में एक निवेदन है जो एक नम्र व्यक्ति ही कर सकता है। वह कहता है कि “आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।” ग़ौर करने से हम पाते हैं कि इस प्रार्थना में दो भाग हैं पहला तो है कि वह व्यक्ति शुद्ध होना चाहता है और दूसरा उसे  ईश्वर की अच्छाई पर उसे पूरा भरोसा है। दूसरे शब्दों में वह कुष्ट रोगी कहता  वैसे मैं बेसहारा हूँ, अपने से कुछ कर नहीं सकता। अगर आपकी इच्छा हैं तो मैं ऐसा ही रहने के लिये तैयार हूँ पर अगर आप चाहते हैं कि मेरा शुद्ध होना आपके नज़रों में भला है तो आप मुझे चंगा कर दीजिये।

दूसरी बात, इस निवेदन में विश्वास भी है कि येसु ही उन्हें शुद्ध कर सकते हैं। रोगी पूर्ण रूप से प्रभु पर समर्पित है। वह ईश्वर से जुड़ा हुआ है और उससे जुड़ा ही रहना चाहता है। वह ईश्वर की इच्छा को अपने जीवन में सबसे बड़ा मानता है। वह नहीं कहता है कि आपको चंगा करना ही पड़ेगा। वह नहीं कहता है कि मुझे लगता है कि आप मुझे चंगा कर सकते हैं। वह यह भी नहीं कहता है कि मैंने सुना है कि आपने बहुतों को चंगा किया है अतः मेरे साथ भई वैसा ही कर सकते हैं। बस वह कहता है “आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।”  अगर इसे हम दूसरे शब्दों में कहें तो यह कहा जा सकता है कि वह कुष्ट रोगी कह रहा है कि प्रभु मैं तो चाहता हूँ कि स्वास्थ्य लाभ करूँ पर आप अगर मुझे योग्य समझते हैं तो मेरी इस इच्छा में आपकी इच्छा पूरी हो।

नम्रता, विश्वास व समर्पण

आपने गौर किया होगा कुष्ट रोगी में नम्रता है, उसमें इश्वरीय शक्ति पर अटूट विश्वास है और वह ईश्वर को समर्पित है। वह कहता है “अगर आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।” उसकी विनती में यह भाव स्पष्ट है कि मैं अपने आपको स्वीकार करता हूँ, अपनी बीमारी को स्वीकार करता हूँ और अच्छाई की इच्छा रखता हूँ पर आपकी इच्छा पूरी होने तक मैं धर्यवान बना रहूँगा। यह इसलिये क्योंकि मैं जानता हूँ कि आपकी योजना से मेरे जीवन के लिये और कोई बड़ी योजना नहीं है। अब आप ही सोचिये किसी भी विनती या सच्ची याचना के लिये इससे अच्छा और योग्य मनोभाव और हो ही क्या सकता है?

अब आइये हम सुनें प्रभु के जवाब को। वे कहते हैं, ” मैं चाहता हूँ कि तुम शुद्ध हो जाओ। एक अच्छी प्रार्थना और एक उचित पुरस्कार। कुष्ट रोगी उसी क्षण शुद्ध हो गया। हम समझ सकते हैं एक सच्ची प्रार्थना को, दिल से माँगे निवेदन को ऐसा आस्थापूर्ण समर्पण को जिसमें है विश्वास है, आशा  है प्रभु कैसे अस्वीकार कर सकते हैं?

प्रभु आज हम सबको इस कुष्ट रोगी की चंगाई के द्वारा यही बताना चाहते है कि समर्पण और विश्वास से पूर्ण  प्रार्थना कभी असफल नहीं होती है। आज प्रभु हमें बताना चाहते हैं कि पूर्ण चंगाई के लिये हमारे दिल में समर्पण से पूर्ण दृढ़ इच्छा होनी चाहिये। प्रभु हमें यह भी बताना चाहते हैं कि प्रभु के दरबार में आनेवाला कभी खाली हाथ वापस नहीं जाता है। प्रभु तो चाहते ही हैं कि हम प्रतिदिन नया बनें, अच्छा बनें, सुन्दर बने और अपने परिवर्तित और परिष्कृत जीवन के द्वारा अपने घर आँगन की शोभा तो बढ़ायें ही इस जग को भी नवीन कर दें। हम चाहे कितने ही अयोग्य क्यों न हों, किसी भी चिन्ता में डूबे क्यों न हों, किसी भी बुरे लत में फसे क्यों न हों, हीन-भाव से ही दबे क्यों न हों या किसी भी दुःख-दर्द के गर्त्त में क्यों ने पड़ें हों प्रभु चाहते हैं कि हम इनसे मुक्त हो जायें।वे हमसे कह रहे हैं, ” मैं चाहता हूँ तुम शुद्ध हो जाओ ठीक चुन्नु की मम्मी की तरह जिसने उसे गंदगी से उठा लिया, साफ किया, चुम्बन दिया औऱ कहा, “मेरा राजा बेटा ! मेरा सुन्दर बेटा !”

पास्का रविवार पर चिन्तन

In Sunday Reflection, Uncategorized on April 27, 2011 at 4:07 pm

जस्टिन तिर्की, ये.स.

आज विश्व के तमाम गिरजाघरों में येसु के पुनरूत्थान की पूजनविधि के साथ ही पास्का का पर्व आरम्भ हो गया है। लोग इसे ईस्टर के नाम से भी जानते हैं। गिरजाघरों के घंटे की आवाज़ आज सिर्फ़ एक ही संदेशा बिखेर रही है कि ईसा मसीह जीवित हैं।

ईसा मसीह अपने बोले अनुसार तीसरे दिन महिमा के साथ जी उठे हैं। ईसा मसीह ने पाप और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है। सच्चाई, भलाई और अच्छाई की जीत हुई है।

आप जिधर भी कान लगाकर सुनें अगर आपने कलवारी के मार्ग मे करीबी से येसु का साथ दिया है तो आप घंटे की आवाज़ में, पंक्षी के कलरव में और भीनी भीनी खुशबुदार वायु में बस यही विजय गीत सुन पायेंगे।

” प्रभु जी उठे हैं। अल्लेलूईया अल्लेलूईया अल्लेलूईया दुनिया के लोगो खुशी मनाओ। तुम्हारे प्रभु जी उठे हैं।”  

प्रभु के जी उठने की खुशी को सुरों में बाँधा है ईस्टर के लिये ख़ास तौर से बनायी इस गीत ने ।

गीत – मृत्यु के बन्धन तोड़ प्रभु जी उठे हैं…

मुझे याद है वह मार्च का महीना था पास्का का पर्व निकट था। तब मैं हाई स्कूल में था तब मेरे धर्म क्लास की टीचर ने मुझसे पूछा था कि ख्रीस्तीयों का सबसे बड़ा त्योहार कौन सा है ? और मैने तपाक से उत्तर दिया था येसु का जन्म पर्व।

मेरे आत्म विश्वास को देख कर उन्होंने हमसे ही फिर सवाल किया कि जन्म पर्व ईसाईयों का सबसे बड़ा त्योहार क्यों है? मैंने जवाब दिया।

जन्म पर्व ईसाइयों का सबसे बड़ा पर्व इसलिये है क्योंकि इसी दिन ईसाई धर्म के संस्थापक येसु मसीह का जन्म हुआ था और इसी दिन पूरी दुनिया के लोग पर्व मनाते हैं न केवल ख्रीस्तीय पर जो ख्रीस्तीय न भी हों पर सभी इस त्योहार में सरीक होते हैं यह एक सामाजिक पर्व बन गया है।

मैं अति प्रसन्न और संतुष्ट था यह सोचकर कि मैंने सही जवाव दिया। मै कुछ और बोलना चाहता था पर टीचर ने एक दूसरे साथी से जिसका नाम पास्कल था यही सवाल किया कि ईसाइयों का सबसे बड़ा त्योहार कौन-सा है? और उसका जवाब मुझसे भिन्न था। उसने कहा था ईसाईयों का सबसे बड़ा पर्व है पास्का पर्व। टीचर ने उसे भी पूछा कि क्यों तुम सोचते हो कि पास्का पर्व ईसाईयों का सबसे बड़ा त्योहार है ? मेरे उस साथी ने कहा पास्का पर्व ईसाईयों का सबसे बड़ा पर्व है क्योंकि इसी पास्का पर्व के कारण ईसाई धर्म एक धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त किया।

टीचर ने कहा उसने समझा नहीं। तब मेरे दोस्त ने बताया कि जन्म पर्व में तो ईसा का जन्म हुआ और उसे उसके अच्छे कार्यों के बावजूद उसे दुःख दिया गया और उसे यहूदियों ने सूली पर लटका दिया और इसके बाद पास्का के समय जो घटना घटी वह अद्वितीय थी ।

इतना सुनते सुनते पूरे क्लास के छात्रों के कान खड़े हो गये थे। मेरे उस मित्र ने जो जिसके पिताजी गाँव में धर्म शिक्षक थे कहा कि येसु मारे जाने के बाद तीसरे दिन जी उठे और उसके शिष्यों ने उसे देखा और फिर येसु का प्रचार-प्रसार करने कि लिये निकल पड़े और इस प्रकार ईसाई धर्म पूरी दुनिया में फैल गया।

ईसा का जीवन समाप्त नहीं हुअ पर वे सदा-सदा के लिये जीवित हो गये। तब टीचर ने मेरे उस मित्र की शाबाशी देते हुए कहा था कि शाबाश पास्कल तुम्हारा जवाब बिल्कुल सही है।

पास्का पर्व में धूम-धड़ाका और खुशियों का इज़हार जन्म पर्व से जरा कम होता है पर ईसाईयों का सबसे बडा पर्व है पास्का पर्व। येसु ने जैसा कहा, वैसा ही दुःख उठाया, मारा गया, सलीब पर ठोंका गया और तीसरे दिन जी भी उठे।

आज हम लोग रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन विधि पंचांग के वर्ष ‘अ’ के पास्का पर्व के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर मनन चिन्तन कर रहें हैं।

आज के पाठ हमें बताएँगे कि सत्य के लिये जीने वाले सत्य के लिये कार्य करने वाले लोगों की भलाई और दुनिया की अच्छाई के लिये अपना जीवन अर्पित करने वाले मरते नहीं हैं पर वे सिर्फ इस दुनिया से चले जाते हैं और ईश्वर उन्हें अनन्त जीवन प्रदान करता है।

ईसा मसीह का जीवनकाल अल्प रहा पर उनके जीवन का प्रभाव युगानुयुग तक बना रहेगा। इसीलिये क्योंकि उन्होंने सत्य के लिये कार्य किया प्रेम का मार्ग दिखाया और दुनिया को सुन्दर और बेहतर बनाने के लिये दुःखों को गले लगाया।

सच्चाई, अच्छाई और भलाई की कमाई बेकार नहीं जाती है। और यही हुआ ईसा मसीह को। ईसा के ईश्वर ने जिसे ईसा मसीह ‘पिता’ कह कर पुकारते थे मृत्यु के तीसरे दिन जीवित कर दिया।

आईये येसु के पुनर्जीवित होने और चेलों को दिखाई देने की अनेक घटनाओं में से एक का वर्णन सुनें। आईये हम प्रभु के उस वचन पर मनन करें जिसे संत योहन के सुसमाचार के 20वें अध्याय से लिया गया है।

मेरा पूरा विश्वास है कि आपने येसु के जी उठने की घटना को ध्यान से सुना है और इसके द्वारा आपको और आपके परिजनों को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं।

आपको मैं बता दूँ कि कि येसु की मृत्यु कोई साधारण मृत्यु नहीं थी इससे लोग दुःखी और निराश तो हुए पर इसके तीन दिन बाद जो विस्मयकारी, चमत्कारिक और ऐतिहासिक घटना घटी और इससे लोगों को जो ताकत मिली उससे पूरी दुनिया के लोगों का जीवन, दुःख और मृत्यु और नया जीवन के संबंध में जो विचार और धारणायें थी उसे एक नयी दिशा मिली।

तब से ईसा मसीह के समान जीने उसके समान परहित में जीने और सत्य के लिये तकलीफ़ झेलने वालों की लम्बी कतार बनी जो न तो छोटी हुई है न ही इसके समाप्त होने के कोई आसार दिखाई पड़ते हैं।

आपने सुना सुसमाचार की बातों को येसु जिस कब्र में रखे गये थे वह शिष्यों के द्वारा खाली पाया गया। येसु कब्र में नहीं थे। येसु कब्र छोड़ चुके थे। येसु दुनिया के बन्धन को तोड़ चुके थे।येसु ने पाप और मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी।येसु ने अपने बैरियों पर विजय पायी थी।

येसु ने अपने जीवन को ऐसा जीया था

प्रेम दया क्षमा और सदभाव से सबको ऐसा सींचा था

कि बैरियों के भी दिल पिघल गये

कब्रों के पत्थर लुढ़क गये

चेलों के नयन खुल गये

भय और दहशत के दिन पूरे हुए

धर्मग्रंथ के शब्द अक्षरशः बस बोले अनुसार पूरे हुए

बड़े तड़के

नाज़रेत के ईसा – क्रूसित येसु से जगत मसीहा बन गये।

कई बार हमने लोगों को कहते हुए सुना है कि सत्य इतनी सुखद है कि विश्वास नहीं होता है। जब येसु का मृतकों में से जी उठे तो सभी चेलों की एक ही मनोभावना थी।और वह थी आश्चर्य की कि प्रभु जी उठे हैं।

काथलिक कलीसिया येसु के जी उठने को ईसा का पुनरूत्थान कहती है। येसु का पुनरूत्थान अर्थात् येसु और फिर कभी नहीं मरेंगे पर सदा-सदा तक वे राज्य करेंगे।

कभी-कभी मन हिचकिचाता है यह विश्वास करने से कि प्रभु जी उठे हैं। कई बार तो मेरा मन भी इस सत्य को नहीं समझ पाता है कि मृ्त्यु के बाद प्रभु के शरीर को क्या हुआ। प्रभु कहाँ चले गये। क्या ईसा सचमुच जी उठे। जब मैं ऐसा सोचने लगता हूँ तो मैं सन्त पौलुस की उन पंक्तियों को याद करता हूँ जिसमें उसने बहुत ही विश्वास के साथ कहा है कि अगर ईसा मसीह जीवित नहीं हुए हैं तो मेरा विश्वास बेकार है मेरा सुसमाचार प्रचार करना बेकार है।

आज मैं काथलिक कलीसिया के एक महान लेखक संत अगुस्टीन की बातों की भी याद करता हूँ जिनका कहना था पहले तुम विश्वास करो तो तुम्हें खुद ही समझ में आ जायेगा। मैं अनुभव करता हूँ कि कई बार मैं अपने आप से कहता हूँ कि मैं पहले समझ लूँगा तब विश्वास करुँगा। श्रोताओ, अच्छी भली और आध्यात्मिक बातों को जब हम विश्वास करने के लिये लालायित हो जाते हैं तो हमें समझने की अन्तर्दृष्टि मिलती है और इस आन्तरिक ज्ञान से हमें नया जीवन मिलता है।

बाईबल में प्रभु के पुनरुत्थान का कोई तार्किक प्रमाण नही मिलता है। सुसमाचार लेखकों ने अपने ही तौर तरीके से इस घटना का वर्णन किया है। कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य भी नहीं मिलता है। हम यही पाते हैं कि शिष्यों ने देखा कि कब्र खाली थी और उनके दिल में यह गहरा आभास होने लग कि येसु जीवित है। उन्हें लगने लगा कि येसु की शक्ति उन पर व्याप्त हो गयी है।

उन्हें लगा येसु की बातें शिक्षा और कार्य में दम हैं उन बातों और कार्यों को आग बढ़ाये जाने की ज़िम्मेदारी उनकी है। हम बाइबल में पाते हैं कि येसु की मृत्यु के बाद शिष्य पूरी तरह से हताश और निराश तो थे ही भय से मारे-मारे फिर रहे थे। उन्हें लगा कि सबकुछ का अन्त हो गया है।

बस जो कुछ बचा है वह है दुःख-तकलीफ़, भय-दहशत निराशा और मृत्यु। पर येसु की कब्र खाली मिलने के बाद उन्हें जो ताकत मिली और उससे जो कुछ हुआ इससे पूरी दुनिया की दिशा ही बदल गयी। वे निर्भीक हो गये उन्होंने येसु के जीवन दुःख मृत्यु और पुनरुत्थान की बातें दुनिया को बताने के लिये अपना सबकुछ छोड़ दिया।

येसु के मुक्ति संदेश को दुनिया को बताने के लिये उन्होंने अपने जीवन कुर्बान करना भी सौभाग्य समझा। येसु के सत्य प्रेम दया क्षमा और मुक्ति के संदेश के प्रचार करने उन्होंने ईश्वरीय वरदान माना और येसु के लिये लहू बहाने को सबसे बड़ा पुरस्कार। इसलिये ईसा का पुनरूत्थान को समझना ईश्वर की ओर से दिया गया एक अनुपम वरदान है जिसके गहरे अनुभव से हमारा जीवन बदल जाता है और हम इस धरा में ही अलौकिक सुख का अनुभव करने लगते हैं।

तो फिर क्या है पास्का पर्व मेरे लिये और आपके लिये। मेरे लिये तो पास्का का पर्व सिर्फ एक त्योहार नहीं हैं जिस समय हम खाते-पीते और खुशियाँ मनाते हैं। पर यह है ईश्वर की ओर से दिया गया एक सुनहला अवसर जब हम येसु की मृत्यु के द्वारा अपने जीवन का सही अर्थ समझते हैं। हम समझते हैं कि क्यों हम इस दुनिया में हैं।

मेरे लिये तो पास्का पर्व है खुद को यह याद दिलाना की कि येसु ने मेरे लिये अपना जीवन दिया और इस दुनिया में जीने और इसे मृत्यु के द्वार से पार होने के एक ऐसा रास्ता दिखाया जिसमें प्रवेश करने से मेरे जीवन का अन्त नहीं होता है पर मूझे एक ऐसा जीवन मिलता है जो सदा सदा के लिये जीवित रहता है।

पास्का पर्व मेरे लिये केवल तीन दिनों में येसु के दुःख दर्द पीड़ा और महिमामय विजय की घटना को सिर्फ याद कर लेने का त्योहार नहीं है। पास्का या ईस्टर तो है नये जीवन पाने का त्योहार, खुद को बदलने का त्योहार खुद के पापों कमजोरियों और झुकाओं पर विजयी होने का त्योहार और नये उत्साह और आशा से परहितमय और सेवामय जीने के लिये खुद को समर्पित करने का त्योहार जिससे हम जहाँ भी रहें या काम करें दुनिया को लगे कि जीवित येसु उनके साथ में हैं।

अगर हर व्यक्ति ऐसा सोचकर कि उसे खुदा के पास जाना है येसु में अमरत्व को प्राप्त करना है परहितमय और प्रेममय जीवन जीये तो मेरे हाईस्कूली दोस्त पास्कल का कथन सच हो जायेगा कि पास्का पर्व ईसाईयों का सबसे बड़ा त्योहार है जो जीवन को बदल डालता है।

पास्का पर्व या ईस्टर के शुभ अवसर पर मैं वाटिकन रेडियो हिन्दी विभाग की ओर से आपको, आपके परिवार को और देश-विदेश के हमारे तमाम श्रोताओं को पास्का पर्व की शुभकामनाएँ देता हूँ और विन्ती करता हूँ कि जीवित येसु ख्रीस्त आपको नया जीवन जीने का उत्साह और अच्छाई और भलाई करते हुए आशामय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करे।

 

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