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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

धन्य मदर तेरेसा की 17 वीं पुण्यतिथि

In Uncategorized on September 5, 2014 at 2:21 pm

कोलकाता, शुक्रवार 5 सितम्बर 2014 (जी न्यूज़)꞉ धन्य मदर तेरेसा की 17 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर 5 सितम्बर को, कोलकाता स्थित मिशनरीज़ ऑफ चारिटी धर्मसंघ के मूलमठ में विशेष शांति प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर उनके कब्र पर प्रार्थना एवं पुष्पांजलि अर्पित की गयी।
मिशनरीज़ ऑफ चारिटी धर्मसंघ की परमाधिकारिणी सि. प्रेमा ने ए एन सी के पत्रकारों से कहा, ″ उन्होंने हमें जो दिया है तथा हम तक हस्तांतरित किया है उसकी हम निरंतर याद करते हैं।″
उन्होंने शांति संदेश के रूप में कहा कि मदर तेरेसा ने संसार को जो संदेश देना चाहा था वह है सभी बातों में ईश्वर को प्राथमिकता देना तथा मानव को आदर और सम्मान देना क्योंकि वह ईश्वर प्रदत्त प्रतिष्ठा का भागी है।

ज्ञात हो की धन्य मदर तेरेसा का निधन 5 सितम्बर 1997 ई. में 87 वर्ष की उम्र में हुई थी।
संयुक्त राष्ट्रसंघ ने मदर तेरेसा की इस पुण्य तिथि को ‘वॉल्ड चारीटी डे’ अर्थात् विश्व उदारता दिवस घोषित किया है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव बान कि मून ने अपने संदेश में कहा, ″संयुक्त राष्ट्रसंघ एवं उनके एजेंसियों के कार्यों में उदारता की अहम भूमिका है। इस विश्व उदारता दिवस पर मैं सभी लोगों से अनुरोध करता हूँ कि उदार भावना से प्रेरित होकर दूसरों को बाँटें और बाँटना जारी रखें।″

Usha Tirkey

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पंजाब में भारी वर्षा से मरने वालों की संख्या 40

In Uncategorized on September 5, 2014 at 2:20 pm

लाहौर, शुक्रवार, 5 सितम्बर 2014 (एशियान्यूज़)꞉ पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में इस सप्ताह आयी भारी वर्षा की तबाही के कारण मरने वालों की संख्या 40 पहुँच गयी है। मौसम विभाग के विशेषज्ञों ने बाढ़ की चेतावनी दे रखी है। केवल लाहौर में 14 व्यक्तियों के मरने की पुष्टि कर दी गई है।

इस तबाही में कई लोग, घर ढह जाने के कारण उसके मलबे में अभी भी फंसे हुए हैं।
सिविल डिफेंस के प्रवक्ता जाम सज्जाद ने कहा कि 24 घंटे के अंदर, घरों के छत गिर जाने के कारण करीब 28 लोगों की मृत्यु गयी। मरने वालों में महिलाएँ एवं कई बच्चे भी शामिल हैं।

पंजाब में छत मरम्मत करने वाले रीज़ावन नासीर ने कहा, ″हम मलबों को हटा रहे हैं ताकि जीवित लोगों को बचाया जा सके।″ उन्होंने कहा कि सभी घायलों को अस्पताल में भर्ती कर चिकित्सा प्रदान की जा रही है ।

ज्ञात हो कि पाकिस्तान में विगत चार वर्षों से भारी वर्षा के कारण जान माल की अत्यधिक क्षति के साथ हज़ारों लोगों की मृत्यु हो चुकी है। लोगों ने शिकायत की है कि मौसम विभाग सूचना देने में असफल है तथा इसके शिकार लोगों को उचित सहायता नहीं मिल रही है।

Usha Tirkey

सन्त लोरेन्सो जुस्तिनयानी 

In Uncategorized on September 5, 2014 at 2:19 pm

वाटिकन सिटी, 05 सितम्बर सन् 2014:


लोरेन्सो जुस्तिनयानी का जन्म इटली के वेनिस प्रान्त में, पहली जुलाई सन् 1381 ई. को, जुस्तिनयानी कुलीन परिवार में हुआ था। लोरेन्सो वेनिस के प्रथम प्राधिधर्माध्यक्ष थे।

लोरेन्सो की माता एक धर्मपरायण महिला थीं जिन्होंने बाल्यकाल से ही अपने पुत्र में धर्म, विश्वास एवं आध्यात्म के बीज आरोपित किये थे। सन् 1400 ई. में आल्गा स्थित सन्त जॉर्ज धर्समाज में लोरेन्सो ने प्रवेश किया जहाँ उनकी सादगी, विनम्रता, अकिंचनता, त्याग- तपस्या तथा प्रार्थना के प्रति उनकी उत्सुकता को देख उनके साथी नवदीक्षार्थी अत्यधिक प्रभावित हुए।

सन् 1406 ई. में लोरेन्सो पुरोहित अभिषिक्त कर दिये गये तथा कुछ समय बाद ही धर्मसमाज के प्रमुख नियुक्त किये गये। इस पद पर आसीन होते ही उन्होंने आल्गा के सन्त जॉर्ज धर्मसमाज का संविधान तैयार किया तथा कई सुधार किये। इस संविधान के विस्तार हेतु वे इतने उत्सुक थे कि उन्हें धर्मसमाज का संस्थापक माना जाने लगा। इसी दौरान, सन्त पापा यूजीन चौथे ने लोरेन्सो को कास्तेल्लो का धर्माध्यक्ष नियुक्त कर दिया। सम्पूर्ण कास्तेल्लो धर्मप्रान्त में उन्होंने जगह-जगह गिरजाघरों एवं मठों का निर्माण करवाया तथा युवाओं के लिये प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की।

सन् 1451 ई. में सन्त पापा निकोलस पंचम ने कास्तेल्लो धर्मप्रान्त को ग्रादो की प्राधिधर्माध्यक्षीय पीठ के साथ मिला दिया तथा इसका स्थानान्तरण वेनिस में कर दिया। इस प्रकार लोरेन्सो जुस्तिनयानी वेनिस के सर्वप्रथम प्राधिधर्माध्यक्ष नियुक्त किये गये। 08 जनवरी सन् 1456 तक को प्राधिधर्माध्यक्ष लोरेन्सो जुस्तियानी का निधन हो गया। उनका पर्व 05 सितम्बर को मनाया जाता है।

चिन्तनः “पृथ्वी के शासको! न्याय से प्रेम रखो। प्रभु के विषय में ऊँचे विचार रखो और निष्कपट हृदय से उसे खोजते रहो; क्योंकि जो उसकी परीक्षा नहीं लेते, वे उसे प्राप्त करते हैं। प्रभु अपने को उन लोगों पर प्रकट करता है, जो उस पर अविश्वास नहीं करते” (प्रज्ञा ग्रन्थ 1:1-2)।

Juliet Genevive Christopher

22 वें ख्रीस्तीय एकतावर्द्धक अन्तरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन को सन्त पापा का सन्देश

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:43 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 03 सितम्बर सन् 2014 (सेदोक): सन्त पापा फ्राँसिस ने ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों से आग्रह किया है कि युद्ध एवं संघर्ष से परिपूर्ण विश्व में वे सुसमाचारी शांति के साक्षी बनें।

इटली के बियेल्ला प्रान्त स्थित बोसे में 03 से 06 सितम्बर तक ऑरथोडोक्स आध्यात्मिकता का 22 वाँ ख्रीस्तीय एकतावर्द्धक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन जारी है, जिसका विषय हैः “धन्य हैं वे जो शांति निर्माता हैं।”

यह सम्मेलन ख्रीस्तीय ऑरथोडोक्स कलीसियाओं के सहयोग से बोसे लोकधर्मी काथलिक समुदाय द्वारा आयोजित किया गया है।

प्रतिवर्ष आयोजित उक्त सम्मेलन का उद्देश्य शांति सम्बन्धी सुसमाचारी शिक्षा पर चिन्तन करना तथा विश्व के स्त्री पुरुषों के बीच पुनर्मिलन एवं शांति की स्थापना हेतु ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों से योगदान का आग्रह करना है।

सन्त पापा फ्राँसिस की ओर से वाटिकन राज्य सचिव कार्डिनल पियेत्रो पारोलीन ने बोसे में जारी उक्त सम्मेलन को प्रेषित एक सन्देश में कहाः “शांति एवं पुनर्मिलन की स्थापना के इच्छुक सभी लोगों का सन्त पापा अभिवादन करते तथा आशा करते हैं कि आपका तीन दिवसीय विचार विमर्श मानवजाति के हित में फलदायी सिद्ध हो।”

उन्होंने लिखाः “सन्त पापा ऑरथोडोक्स आध्यात्मिकता पर बोसे समुदाय द्वारा प्रायोजित 22 वें अन्तरराष्ट्रीय एकतावर्द्धक सम्मेलन में भाग ले रहे सभी प्रतिभागियों एवं आयोजकों का अभिवादन करते तथा इस पहल की सफलता हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं। वे आशा करते हैं कि विचार विमर्श एवं अध्ययन के ये दिन इस तथ्य के प्रति चेतना जाग्रत कर सकें कि यथार्थ भ्रातृत्व भाव में येसु ख्रीस्त द्वारा घोषित शांति के अनुकूल जीवन यापन करना सम्भव है क्योंकि भाईचारे से ही संघर्षों की समाप्ति होती, मतभेद दूर होते तथा आशा उत्पन्न होती है। काथलिक कलीसिया एवं उसकी प्रेरिताई के लिये प्रार्थना का आग्रह करते हुए सन्त पापा फ्राँसिस सभी लोगों पर ईश्वर के आशीर्वाद की मंगलयाचना करते हैं।”

Juliet Genevive Christopher

अकादमी डिगरियाँ ख्रीस्तीय पहचान नहीं, सन्त पापा फ्राँसिस

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:42 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 03 सितम्बर सन् 2014 (सेदोक): सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा है कि ख्रीस्तीय पहचान बौद्धिक ज्ञान अथवा बड़ी बड़ी डिगरियाँ हासिल करने से नहीं मिलती है।

वाटिकन स्थित सन्त मर्था प्रेरितिक आवास के प्रार्थनालय में मंगलवार, 02 सितम्बर को ख्रीस्तयाग के अवसर पर प्रवचन करते हुए सन्त पापा फ्राँसिस ने यह बात कही।

प्रभु येसु के अधिकार से सम्बन्धित सुसमाचार पाठ पर चिन्तन करते हुए उन्होंने कहाः “ख्रीस्तीय पहचान ज्ञान अथवा डिगरियों से नहीं आती अपितु प्रभु ख्रीस्त के सदृश पवित्रआत्मा से प्रेरित होने पर मिलती है क्योंकि पवित्रआत्मा से अभिषिक्त होकर ही प्रभु येसु ख्रीस्त का अधिकार प्रकाश में आया था।”

उन्होंने कहा कि लोग येसु ख्रीस्त के शब्दों को सुनकर आश्चर्यचकित थे क्योंकि येसु अधिकार के साथ बात करते थे।

सन्त पापा ने कहा कि प्रभु येसु कोई साधारण उपदेशकर्त्ता नहीं हैं क्योंकि पवित्रआत्मा द्वारा अभिषिक्त होने के कारण वे उपदेश देते हैं। वे जो कुछ बोलते हैं वह पवित्रआत्मा के सामर्थ्य से बोलते हैं।

सन्त पापा ने कहाः “येसु ईश्वर के पुत्र हैं जो अभिषिक्त किये गये तथा हमारे बीच भेजे गये ताकि विश्वमंडल के ओर छोर तक वे मुक्ति ला सकें, स्वतंत्रता ला सके।”

सन्त पापा ने कहा, “हम भी स्वतः से प्रश्न कर सकते हैं कि हमारी ख्रीस्तीय पहचान क्या है? इसका उत्तर सन्त पौल सटीक रूप से प्रदान करते हैं, जब वे कहते हैं कि “हम उनके विषय में मानवीय प्रज्ञा द्वारा सिखाये गये शब्दों से नहीं बोलते हैं”, क्योंकि सन्त पौल की प्रज्ञा मानवीय प्रज्ञा का नहीं अपितु ईश्वरीय प्रज्ञा का फल है। इसलिये यह जानना ज़रूरी है कि मनुष्य अपने बल पर ईश्वर के आत्मा के कार्यों के बारे में नहीं समझ सकता, इसके लिये उसे पवित्रआत्मा की प्रेरणा की ज़रूरत होती है।”

Juliet Genevive Christopher

अन्तरधार्मिक शांति खेल को सन्त पापा ने भेजा विडियो सन्देश

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:41 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 03 सितम्बर सन् 2014 (सेदोक): रोम के ऑलिम्पिक स्टेडियम में सोमवार पहली सितम्बर की रात्रि खेले गये अन्तरधार्मिक शांति फुटबॉल मैच में भाग लेनेवाले खिलाड़ियों एवं इस खेल के आयोजकों को सन्त पापा फ्राँसिस ने एक विडियो सन्देश प्रेषित कर हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित की थी।

सन्त पापा ने कहा, “विश्व शांति के लिये खेला जा रहा मैच प्रतीकात्मक है। यह ऐसा मैच है जो दोनों दलों के खिलाड़ियों के बीच संयोजन, दर्शकों के बीच संयोजन तथा शांति हेतु सबकी अभिलाषा को प्रकाशमान करता है। ऐसा मैच जिसमें कोई भी केवल अपने बारे में नहीं अपितु अन्यों के बारे में उत्कंठित है।”

उन्होंने कहाः “एकता और एकात्मता की भावना में खेला जा रहा मैच प्रतिस्पर्धा या दूसरे को हराने की होड़ की जगह शांति का बीज बन गया है। इसीलिये इस मैच का प्रतीक जैतून है।”

मैच के उपरान्त आयोजकों ने स्टेडियम में ही शांति के प्रतीक रूप में जैतून का एक पौधा आरोपित किया।

Juliet Genevive Christopher

मरियम हैं सबकी माता सन्त पापा ने किया ट्वीट

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:41 pm

वाटिकन सिटी, 03 सितम्बर सन् 2014 (सेदोक): सन्त पापा फ्राँसिस ने, मंगलवार, 02 सितम्बर को किये अपने ट्वीट पर ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों से आग्रह किया कि वे माँ मरियम में अपने विश्वास को मज़बूत करें।

इताली, अँग्रेज़ी, पुर्तगाली, स्पानी, फ्रेंच, जर्मन, पोलिश, अरबी तथा लैटिन भाषाओं में मंगलवार, 02 सितम्बर को किये ट्वीट पर सन्त पापा फ्राँसिस ने लिखाः “वह ख्रीस्तीय धर्मानुयायी जिसे यह महसूस नहीं होता कि माँ मरियम उसकी माता है वह वास्तव में अनाथ है।”

Juliet Genevive Christopher

मध्यपूर्व पर कारितास की बैठक 15 से 17 सितम्बर तक

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:40 pm

वाटिकन सिटी, 03 सितम्बर सन् 2014 (सेदोक): रोम में 15 से 17 सितम्बर तक मध्यपूर्व पर विश्वव्यापी काथलिक उदारता संगठन कारितास इन्तरनात्सियोनालिस की बैठक का आयोजन किया गया है।

रोम स्थित कारितास के कार्यालय ने बुधवार को एक विज्ञप्ति जारी कर इस बैठक की सूचना प्रदान की। विज्ञप्ति में कहा गया कि मध्यपूर्व में गहराते संकट के मद्देनज़र इस तीन दिवसीय बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें संगठन के वरिष्ठ अधिकारी तथा मध्यपूर्व में जारी कारितास योजनाओं के निदेशकों सहित अन्तरराष्ट्रीय दानदाताओं के प्रतिनिधि भाग लेंगे। इस बैठक में मध्यपूर्व में व्याप्त संकट पर विचार विमर्श किया जायेगा जिसमें सिरिया, ईराक एवं गज़ा पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया जायेगा।

विज्ञप्ति में इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया गया कि विगत तीन वर्षों से जारी सिरिया के युद्ध से ज़रूरतमन्द लोगों की संख्या लगभग एक करोड़ तीस लाख तक पहुँच गई है। गज़ा में हालांकि युद्ध विराम घोषित कर दिया गया है तथापि, हाल के युद्ध में हुई जान माल की भरपाई करना तथा हिंसा को पूरी तरह समाप्त करना कठिन काम है। इसके अतिरिक्त ईराक में पुनः भड़के संघर्षों ने कम से कम दस लाख लोगों को उनके घरों का परित्यग करने के लिये मजबूर किया है। अन्यत्र शरण ले रहे इन ईराकियों की मदद करना अनिवार्य है।

विज्ञप्ति में यह भी बताया गया कि विगत तीन वर्षों में कारितास ने सिरिया, गज़ा एवं ईराक के 965,000 ज़रूरतमन्दों को सहायता प्रदान की है। इनमें भोजन प्रदान करना, अस्थायी तम्बुओं का निर्माण करना, कम्बलों का वितरण करना, मूलभूत शिक्षा एवं चिकित्सा प्रदान करना तथा युद्ध से आतंकित लोगों को मनोवैज्ञानिक सहायता पहुँचाना शामिल है।

Juliet Genevive Christopher

कलीसिया हमारी सच्ची माँ

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:38 pm

वाटिकन सिटी, बुधवार, 3 सितम्बर 2014 (सेदोक, वी.आर.)꞉ बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर 3 सितम्बर को संत पापा फ्राँसिस ने वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में, विश्व के कोने-कोने से एकत्रित हज़ारों तीर्थयात्रियों को सम्बोधित किया।
उन्होंने कलीसिया की धर्मशिक्षा माला को जारी करते हुए इताली भाषा में कहा, ″ख्रीस्त में मेरे अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात,
″हमारी धर्म शिक्षा में हमने बहुधा ग़ौर किया है कि हम अपने आप ख्रीस्त धर्मानुयायी नहीं बन जाते हैं किन्तु विश्वास में जन्म लेने, बढ़ने तथा ईश प्रजा अर्थात् कलीसिया में रहकर ही हम ख्रीस्तीय बनते हैं। कलीसिया हमारी सच्ची माँ है जो ख्रीस्त द्वारा हमें जीवन देती तथा पवित्र आत्मा की संगति में अपने भाई-बहनों के समुदाय में हमें शामिल करती है।″

संत पापा ने कहा कि कलीसिया के मातृत्व का आदर्श धन्य कुँवारी मरियम हैं जिन्होंने समय पूरा हो जाने पर, पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण किया तथा ईश पुत्र को जन्म दिया। उनका मातृत्व कलीसिया द्वारा आगे बढ़ता है जो बपतिस्मा संस्कार द्वारा पुत्र-पुत्रियों को जन्म देने तथा ईश वचन द्वारा उनका भरण-पोषण करने में परिलक्षित होता है।

वास्तव में, येसु ने कलीसिया को सुसमाचार इसलिए प्रदान किया ताकि वह सुसमाचार की उदार उद्घोषणा द्वारा नये सदस्यों को जन्म दे तथा पिता ईश्वर के लिए बहुत सारे पुत्र-पुत्रियों को एकत्र करे। एक माता के रूप में कलीसिया जीवनभर हमारी देखभाल करती है। सुसमाचार की ज्योति एवं संस्कारों के अनुष्ठान द्वारा वह हमारा पथ आलोकित करती है विशेषकर, परमप्रसाद संस्कार द्वारा।
संत पापा ने कहा कि इस आध्यात्मिक भोजन से बल पाकर हम अच्छाई को चुन सकें तथा संसार की बुराइयों और छल-कपट से सावधान रह सकें। हम आशा एवं साहसपूर्वक जीवन की कठिनाईयों का सामना कर सकें।
यही कलीसिया है, एक माता, जिसके हृदय में अपने बच्चों के प्रति भलाई की भावना भरी है। जूँकि हम कलीसिया हैं अतः हमें इसी आध्यात्मिक एवं भौतिक मनोभावना से अपने भाई-बहनों के साथ जीना है। उनका स्वागत करें, उन्हें क्षमा करते हुए जीवन की आशा एवं भरोसा प्रदान करें।

इतना कहकर संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की। धर्मशिक्षा माला समाप्त कर संत पापा ने सभी अंग्रेजी भाषी तीर्थयात्रियों का भी अभिवादन किया तथा अंत में भारत, इंगलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया वेल्स, वियेतनाम, डेनमार्क, नीदरलैंड, नाइजीरिया, आयरलैंड, फिलीपीन्स, नोर्व, स्कॉटलैंड. जापान, मॉल्टा, डेनमार्क कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, हॉंन्गकॉंन्ग, अमेरिका और देश-विदेश के तीर्थयात्रियों, उपस्थित लोगों तथा उनके परिवार के सदस्यों को विश्वास में बढ़ने तथा प्रभु के प्रेम और दया का साक्ष्य देने की कामना करते हुए अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

Usha Tirkey

सन्त ग्रेगोरी महान (540-604)

In Uncategorized on September 3, 2014 at 1:36 pm

वाटिकन सिटी, 03 सितम्बर सन् 2014:

सन्त ग्रेगोरी का जन्म, रोम में, लगभग 540 ई. में हुआ था। वे एक समृद्ध सिनेटर के बेटे थे जिन्होंने सांसारिक सुख वैभव का परित्याग कर दिया था तथा रोम के सात याजकों में से एक बन गये थे। सन् 574 ई. में, 34 वर्ष की आयु में ग्रेगोरी ने अपनी पढ़ाई पूरी की तथा कम उम्र के बावजूद सम्राट जस्टीन ने उन्हें रोम का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया था। कुछ समय ग्रेगोरी वकालात से जुड़े रहे किन्तु अधिकांश प्रकरण निर्धनों को न्याय दिलवाने के लिये हुआ करते थे।

अपने पिता के निधन के बाद ग्रेगोरी ने समर्पित जीवन यापन का प्रण किया तथा सिसली द्वीप में छः मठों की स्थापना की। रोम में, उन्होंने, सातवें मठ की आधारशिला रखी जो बाद में जाकर सन्त एन्ड्र्यू को समर्पित विख्यात मठ सिद्ध हुआ। 35 वर्ष की आयु में ग्रेगोरी ने इसी मठ में मठवासी जीवन यापन हेतु सुसमाचारी शपथें ग्रहण की तथा मठवासी परिधान धारण किया।

अपधर्मी सम्राट पेलाजियुस की मृत्यु के बाद, पुरोहितों एवं भक्त समुदाय की सर्वसम्मति से, ग्रेगोरी को कलीसिया का परमाध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। ग्रेगोरी के सन्त पापा नियुक्त होने के बाद ही वे सब महत्वपूर्ण काम सम्पन्न हुए जिनसे वे ग्रेगोरी महान कहलाये। अपने धर्मोत्साह के लिये वे सम्पूर्ण विश्व में विख्यात हो गये, धर्मसमाजी और मठवासी भिक्षुओं के जीवन में उन्होंने कई सुधार लाये, ख्रीस्तीय धर्म की सभी कलीसियाओं के साथ वे सम्पर्क में रहे तथा अपनी शारीरिक दुर्बलताओं के बावजूद उन्होंने कई पुस्तकें लिखी। ग्रेगोरी द्वारा रचित पवित्र ख्रीस्तयाग की धर्मविधि तथा प्रातः व सान्ध्य वन्दनाएँ उनके द्वारा काथलिक कलीसिया को दिया अनुपम योगदान हैं। सन्त एम्ब्रोज़, सन्त जेरोम तथा सन्त अगस्टीन जैसे पश्चिमी काथलिक कलीसिया के महान आचार्यों में ग्रेगोरी महान का नाम गिना जाता है।

12 मार्च, सन् 604 ई., को काथलिक कलीसिया के परमाध्यक्ष और कलीसिया के आचार्य सन्त ग्रेगोरी महान का निधन हो गया था। वे शिक्षकों के संरक्षक सन्त हैं। सन्त ग्रेगोरी महान का पर्व 03 सितम्बर को मनाया जाता है।

चिन्तनः सतत् प्रार्थना, ध्यान, मनन चिन्तन एवं बाईबिल पाठ द्वारा हम प्रभु ईश्वर की खोज में लगे रहें।

Juliet Genevive Christopher

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