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रविवारीय चिन्तन

वर्ष ‘स’ तैंतीसवाँ रविवार

मलाकी 3, 19-20
2 थेसलनिकियों के नाम 3, 7-12
संत लूकस 21, 5-19

जस्टिन तिर्की, ये.स.

मारकुस की कहानी
मित्रो, आज आपलोगों के एक व्यक्ति के बारे बताता हूँ जिसका नाम था मारकुस। वह बहुत धर्मी था। उसके मन में बार-बार एक ही बात गूँजती रहती थी कि क्या भले लोगों को मरने के बाद कोई विशेष पुरस्कार दिया जायेगा अथवा नहीं। जब उसे कोई सही जवाब नहीं मिला तब उसने निर्णय किया वह महान गुरु बुद्धा के पास जायेगा और उससे वह सवाल पूछेगा। एक दिन वह बुद्धा के पास पहुँचा और अपना सवाल बुद्धा के समक्ष रखा पर बुद्धा ने उसे कोई जवाब नहीं दिया। मारकुस बुद्धा के पास फिर गया और वही सवाल दुहराया। बुद्धा ने कोई जवाब नहीं दिया। मारकुस निराश नहीं हुआ, वह बुद्धा के पास जाना जारी रखा। जब भी मारकुस बुद्धा के पास जाता तो बुद्धा से वही सवाल करता था कि क्या भले लोगों को स्वर्ग में कुछ विशेष पुरस्कार दिया जायेगा। बुद्धा मारकुस को देखता पर उसे कोई जवाब नहीं देता था। मारकुस को कम-से-कम इस बात की संतुष्टि थी कि वह बुद्धा के पास रोज जाता है और बुद्धा उसकी ओर आँख उठाकर देखा करते हैं। एक दिन की बात है मारकुस बुद्धा के पास गया था उसने बुद्धा से वही सवाल किया कि क्या भले लोगों को स्वर्ग में कुछ विशेष पुरस्कार मिलेगा पर बुद्धा ने न तो उसकी तरफ आँखें उठाकर देखी और न ही कुछ कहा। तब मारकुस ने अपना धैर्य खोते हुए कहा अगर मेरे सवाल को कोई जवाब नहीं है तो मेरा जीवन बेकार है। मैं क्यों जीउँ। ऐसा सुन कर बुद्धा ने अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा तो तुम तो उस व्यक्ति के समान हो जिसके शरीर में एक ज़हरीली तीर चुभ गयी थी उसे अस्पताल पहुँचाया गया तब उस व्यक्ति ने डॉक्टरों से कहा कि इसके पहले कि आप मेरे शरीर से तीर निकालें आप मेरे तीन सवालों का जवाब दीजिये। पहला कि यह तीर किसने चलायी थी, दूसरा कि तीर चलाने वाला गोरा था या काला और तीसरा कि उस व्यक्ति का कद छोटा था कि बड़ा?
मित्रो, कई बार हम उन चिंताओं में डूब जाते हैं जो प्रभु के लिये उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है पर हम सोचते हैं कि यह हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या है। यदि हम अपने सवालों में ही डूबे रहे तो हम खुद को भला और अच्छा बनाने के अवसर यूँ ही गंवा देंगे।
मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिंतन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन विधि पंचांग के वर्ष ‘स’ के 33वें रविवार के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठ के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं और प्रभु हमें बतलाना चाहते हैं कि यदि हम प्रभु को अपने-आप को समर्पित कर दें तो वे हमारा सही इलाज़ कर देंगे। प्रभु हमारे सब सवालों का उचित ज़वाब दे देंगे और हमारे जीवन को परिपूर्ण कर देंगे।
संत लूकस 21, 5-19
5) कुछ लोग मन्दिर के विषय में कह रहे थे कि वह सुन्दर पत्थरों और मनौती के उपहारों से सजा है। इस पर ईसा ने कहा,
6) ”वे दिन आ रहे हैं, जब जो कुछ तुम देख रहे हो, उसका एक पत्थर भी दूसरे पत्थर पर नहीं पड़ा रहेगा-सब ढा दिया जायेगा”।
7) उन्होंने ईसा से पूछा, ”गुरूवर! यह कब होगा और किस चिन्ह से पता चलेगा कि यह पूरा होने को है?”
8) उन्होंने उत्तर दिया, ”सावधान रहो तुम्हें कोई नहीं बहकाये; क्योंकि बहुत-से लोग मेरा नाम ले कर आयेंगे और कहेंगे, मैं वही हूँ’ और वह समय आ गया है’। उसके अनुयायी नहीं बनोगे।
9) जब तुम युद्धों और क्रांतियों की चर्चा सुनोगे, तो मत घबराना। पहले ऐसा हो जाना अनिवार्य है। परन्तु यही अन्त नहीं है।”
10) तब ईसा ने उन से कहा, ”राष्ट्र के विरुद्ध राष्ट्र उठ खड़ा होगा और राज्य के विरुद्ध राज्य।
11) भारी भूकम्प होंगे; जहाँ-तहाँ महामारी तथा अकाल पड़ेगा। आतंकित करने वाले दृश्य दिखाई देंगे और आकाश में महान् चिन्ह प्रकट होंगे।
12) ”यह सब घटित होने के पूर्व लोग मेरे नाम के कारण तुम पर हाथ डालेंगे, तुम पर अत्याचार करेंगे, तुम्हें सभागृहों तथा बन्दीगृहों के हवाले कर देंगे और राजाओं तथा शासकों के सामने खींच ले जायेंगे।
13) यह तुम्हारे लिए साक्ष्य देने का अवसर होगा।
14) अपने मन में निश्चय कर लो कि हम पहले से अपनी सफ़ाई की तैयारी नहीं करेंगे,
15) क्योंकि मैं तुम्हें ऐसी वाणी और बुद्धि प्रदान करूँगा, जिसका सामना अथवा खण्डन तुम्हारा कोई विरोधी नहीं कर सकेगा।
16) तुम्हारे माता-पिता, भाई, कुटुम्बी और मित्र भी तुम्हें पकड़वायेंगे। तुम में से कितनों को मार डाला जायेगा
17) और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे।
18) फिर भी तुम्हारे सिर का एक बाल भी बाँका नहीं होगा।
19) अपने धैर्य से तुम अपनी आत्माओं को बचा लोगे।

मित्रो, आज प्रभु हमें उन बातों को बतलाना चाहते हैं जिन्हें प्रभु के सच्चे शिष्य को झेलना पड़ता है या झेलना स्वाभाविक है। आज प्रभु एक ओर हमारे जीवन में आने वाले चुनौतियों दुःखों और यंत्रणाओं के बारे में बताना चाहते हैं दूसरी ओर यह भी कह रहे हैं कि जो धैर्यपूर्वक प्रभु का साथ देगा और प्रभु के लिये दुःख उठाएगा वह स्वर्ग राज्य में पुरस्कृत किया जायेगा। मित्रो, आइये हम प्रभु के वचन पर जरा गौर करें। प्रभु आज के सुसमाचार के द्वारा में तीन बातों को विशेष रूप से याद दिलाना चाहते हैं।

प्रभुमय जीवन
पहली बात तो यह है कि ख्रीस्तीय जीवन ईमानदारी से जीने वाले को सदा प्रभुमय जीवन जीना चाहिये। सदा प्रभु की बतायी बातों के अनुसार अपना जीवन यापन करना चाहिये। दुनिया के अन्त तक उस प्रभु पर भरोसा करना चाहिये। मित्रो, इस संबंध में आप मुझसे पूछेंगे कि प्रभु के अनुसार जीवन जीने का क्या अभिप्राय है। बात सरल है प्रभु के अनुसार जीवन जीने का अर्थ है चाहे दुःख हो या सुख हो ईश्वर की अच्छाई पर भरोसा रखते हुए सदा ही खुद के लिये और दूसरों के लिये भला और नेक कार्य करते रहना तथा सदा ही दूसरों के लिये भले चीजों की कामना करना।

दुःख- जीवन का अभिन्न हिस्सा
सुसमाचार की दूसरी बात जिसे प्रभु याद दिलाना चाहते हैं वह है कि प्रभु के मार्ग पर में चलने वाले को दुःखों या कठिनाइयों का सामना करना ही है। अर्थात् अगर हम प्रभु के मार्ग पर चलते हैं या हम कहें कि दुनियावी रास्ते से हटकर जीवन जीने का निर्णय लेते हैं तो हम कठिनाइयाँ तो झेलनी पड़ेगी ही। प्रभु ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि येसु का अनुसरण करने वाले के जीवन में चुनौतियाँ न केवल आन्तरिक रूप से होगी वरन् ये चुनौतियाँ उन लोगों से भी आयेंगी जिन्हें हम समझते हैं कि वे हमारे मित्र हैं। हमारे मित्र कई बार हमारे निर्णयों की हँसी उड़ाएँगे हमें अकेला छोड़ देंगे या कई बार हमारे नेक कार्यों को मूर्खतापूर्ण कार्य कहेंगे।
धैर्यवान बने रहना
मित्रो, प्रभु की तीसरी बात है कि हम कभी भी अपना धैर्य न खोयें। प्रभु ने कहा कि धैर्यवान को स्वर्ग में उचित पुरस्कार दिया जायेगा।

मित्रो, आज प्रभु हमें आमंत्रित कर रहे हैं प्रभु पर आस्था रखते हुए भला कार्य करें प्रभु के लिये दुःख उठायें और सबसे बड़ी बात हम धैर्य न खोयें।

भलें काम करते न थकें
मित्रो, ऐसा नहीं है कि व्यक्ति में अच्छाई की कमी है पर बस व्यक्ति भला कार्य करते-करते भले फल की आशा करते-करते उस मारकुस के समान थक जाता है। मित्रो, आइये हम प्रभु से धैर्य की माँग करें भले कार्यों को करते रहें प्रभु के लिये काँटों की राहों पर मुस्कुराकर चलें चूँकि धैर्य का पथ अपनाने वाले के दुःखों को, प्रभु अनन्त आनन्द में बदले देने की घोषणा कर चुके हैं। और उनकी वाणी कभी टलती नहीं वरन् पूरा होकर ही रहती है।

वर्ष ‘स’ बत्तीसवँ रविवार

मक्काबियों का दूसरा ग्रंथ,
2 थेसलनीकियों 2,16-3,5
संत लूकस, 20, 27-38

जस्टिन तिर्की, ये.स.

एक गुरुजी की कहानी
मित्रो, आज आप लोगों को एक कहानी बताता हूँ जिसे एक जेस्विट फादर अन्तोनी डेमेल्लो लोगों को बताया करते थे। एक दिन मुसलमानों के एक गुरु प्रवचन दे रहे थे कि किसी ने भीड़ से चिल्लाया, “गुरुजी आप सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे ही में बातें करते हैं “तब गुरुजी रुक गये और उन्होंने प्रश्न पूछने वाले की ओर देखकर कहा, “आप कुछ कहना चाहते हैं।” वह व्यक्ति गुरु का ध्यान खींच पाने की सफलता से से फूला नहीं समाया और उत्साहपूर्वक कहा, “गुरुजी आप हमें कुछ स्वर्ग की चीज़ों को दिखाइये ना, जिसके सहारे हम स्वर्ग को अच्छी तरह से समझ सकें। गुरुजी ने तुरन्त झुककर अपनी झोली से एक सेव निकाला और कहा इस ले लो। तब उस व्यक्ति ने गुरु के पास जाकर फल लिया। उस उलट-पलट कर देखा और कहा, “गुरुजी देखिये न यह फल इस ओर खराब है। स्वर्ग का सेव तो इससे लाख गुणा अच्छा होगा।” उस मुसलमान गुरु ने कहा, “तुमने सही कहा पर मैं तुम्हें एक बात बता हूँ कि इस सेव और स्वर्ग के सेव में कोई ख़ास अन्तर नहीं है। अंतर सिर्फ दृष्टि का है। हम अपनी आँखों से कई बार स्वर्ग की चीज़ों को नहीं पहचान सकते हैं। इसे पहचानने के लिये हममें अंतर्दृष्टि चाहिये। जो खुद अपूर्ण है वह पूर्ण को, पूर्ण चीज़ों या बातों को पूर्णतः कैसे समझ सकता है। गुरु की बातों में बहुत दम था। उसकी बातों में जीवन की एक बहुत बड़ी सच्चाई थी। अपनी छोटी बुद्धि से हम ईश्वरीय बातों एवं उसकी सच्चाई और अच्छाई को नहीं जान सकते हैं। हम ईश्वर की सच्चाई, अच्छाई और भलाई जो आकाश से ऊँचा, सागर से गहरा और पूरी दुनिया के क्षितिज-सा विस्तृत है उसे समझने का प्रयास करते हुए शायद अनन्त बहस में फँस सकते हैं। मित्रो, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि यदि हम किसी सच्चाई को न समझें तो इसका मतलब यह भी नहीं हुआ का वो सत्य, सत्य नहीं है।

मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत हम पूजन विधि पंचांग के वर्ष ’स’ के 32वें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर मनन-चिन्तन कर रहे हैं। आज प्रभु हमें पुनरुत्थान के बारे में बतलाना चाहते हैं। मित्रो, मनुष्य के मृत्यु एवं मृत्यु के बाद होने वाले वाली हमारी स्थिति के बारे में लोगों एवं विभिन्न धर्म के विचार अलग-अलग हैं। कुछ लोगों का विचार है कि मरने के बाद हमारा सब कुछ समाप्त हो जायेगा। कुछ लोगों का विचार है कि मरने के बाद हमारी आत्मा भगवान के पास चली जायेगी। और कुछ लोगों का विचार है कि मरने के बाद हमारा पुनरुत्थान होगा।

मित्रो, प्रभु हमें बतलाना चाहते हैं कि मृत्यु के बाद मानव का अंत नहीं होगा लेकिन एक परिवर्तित मानव के रूप में उसका जीवन आगे बढ़ता जायेगा।

संत लूकस, 20, 27-38
27) इसके बाद सदूकी उनके पास आये। उनकी धारणा है कि मृतकों का पुनरुत्थान नहीं होता। उन्होंने ईसा के सामने यह प्रश्न रखा
28) “गुरुवर! मूसा ने हमारे लिए यह नियम बनाया-यदि किसी का भाई अपनी पत्नी के रहते निःसन्तान मर जाये, तो वह अपने भाई की विधवा को ब्याह कर अपने भाई के लिए सन्तान उत्पन्न करे।
29) सात भाई थे। पहले ने विवाह किया और वह निःसन्तान मर गया।
30) दूसरा और 31) तीसरा और फिर सातो भाई विधवा को ब्याह कर निःसन्तान मर गये। 32) अन्त में वह स्त्री भी मर गयी।
33) अब पुनरूत्थान में वह किसकी पत्नी होगी वह तो सातो की पत्नी रह चुकी है?”
34) ईसा ने उन से कहा, “इस लोक में पुरुष विवाह करते हैं और स्त्रियाँ विवाह में दी जाती हैं,
35) परन्तु जो परलोक तथा मृतकों के पुनरुत्थान के योग्य पाये जाते हैं, उन लोगों में न तो पुरुष विवाह करते और न स्त्रियाँ विवाह में दी जाती हैं।
36) वे फिर कभी नहीं मरते। वे तो स्वर्गदूतों के सदृश होते हैं और पुनरूत्थान की सन्तति होने के कारण वे ईश्वर की सन्तति बन जाते हैं।
37) मृतकों का पुनरुत्थान होता है मूसा ने भी झाड़ी की कथा में इसका संकेत किया है, जहाँ वह प्रभु को इब्राहीम का ईश्वर, इसहाक का ईश्वर और याकूब का ईश्वर कहते हैं।
38) वह मृतकों का नहीं, जीवितों का ईश्वर है, क्योंकि उसके लिये सभी जीवित है।”

पुनरुत्थान
मित्रो, आज के सुसमाचार में प्रभु शास्त्रियों के उस सवाल का जवाब दे रहे हैं जिसमें उन्हें पूछा गया था कि पुनरुत्थान में सात भाइयों से व्यवहित महिला किसकी पत्नी होगी¬? प्रभु आज हमें बताना चाहते हैं कि हमारे लौकिक जीवन के बाद भी एक जीवन है जहाँ हमारा जीवन जारी रहेगा पर हमारा रूप बदल जायेगा। हम स्वर्ग में स्वर्गदूतों के समान होंगे और हमारे जीवन का अंत कभी नहीं होगा। हम सदा ईश्वर के साथ जीवन बितायेंगे।

मित्रो, कई बार मैं खुद ही विचार करने लगता हूँ कि मरने के बाद मेरा क्या होगा। क्या मेरा पूर्णतः अन्त हो जायेगा या फिर मैं किसी रूप में जीवित रहूँगा। मित्रो, आज के वचनों पर विचार करने से मुझे जो प्रेरणा और जीवन के बाद के जीवन के बारे में जो अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई वह यह है कि यदि मैं ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन बिताऊँ तो मैं जरूर पुनरुत्थान के योग्य समझा जाऊँगा। और मेरे हर अच्छे कार्य के लिये ईश्वर अवश्य ही मुझे पुरस्कृत करेंगे। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं अपनी मृत्यु के बाद पूर्ण रूप से ईश्वर की संतान बन जाऊँगा अर्थात् मैं अमरत्व को प्राप्त कर लूँगा। मित्रो, जब कभी मैं पुनरुत्थान के बारे में बातें करता हूँ तो मुझे इस बात का गहरा अहसास होता है कि मेरा अच्छा और भला कार्य उनके लिये किया गया मेरा एक-एक बलिदान बेकार नहीं जायेगा। कई बार हम यह सोचने लगते हैं कि हम भला कार्य करते हैं और हमें दुःख मिलता है और अन्य लोग मौज़-मस्ती करते हैं और अपना जीवन यूँ ही गुज़ार देते हैं, दूसरों का अहित करते फिर भी वे सुखी नज़र आते हैं। हम कई बार यह सवाल भी करने लगते हैं कि कहाँ है ईश्वर का न्याय?

मित्रो, ऐसे ही समय में पुनरुत्थान का अर्थ मुझे शक्ति प्रदान करती है ऐसे ही समय में मैं उन मक्काबी भाइयों की याद करता हूँ जिन्होंने अपने विश्वास के लिये अपने प्राणों की आहूति दी। उन्हें इस बात का पूरा विश्वास था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। उनका पूरा विश्वास था कि प्रभु के लिये जीने और उनके लिये दुःख उठाने से वे सब कुछ खो सकते हैं पर स्वर्ग में उनके लिये इनाम सुरक्षित रखा होगा। इसीलिये दुनिया की कोई भी शक्ति या प्रलोभन उनके विश्वास को नहीं हिला सकी और वे शहीद हो गये। मित्रो, क्या आपने मानव जीवन के इस पक्ष पर विचार किया हैं कि हम इस जीवन में जो कार्य करते हैं, उसे क्यों करते हैं? क्या हैं इन्हें करने का मकसद? मैंने कई लोगों को सहर्ष दुःख उठाते हुए देखा, सेवा करते देखा है। आखिर क्यों वे ऐसा करते हैं। बस, इसीलिये न कि उनके दिल को चैन मिलता है, उनके अंतःकरण को आंतरिक संतुष्टि मिलती है, उन के दिल को सुकून मिलता है। फिर उनकी यह आशा मजबूत होती है कि उनका निःस्वार्थ प्रेम और सेवा बेकार नहीं जायेगा।

पुनरुत्थान का आनन्द
मित्रो, आज अगर आप मुझसे पुनरुत्थान का अर्थ पूछेंगे तो मैं यही कहूँगा कि पुनरुत्थान वह ईश्वरीय आनन्द है जो मुझे तीन बातों का संदेश देता है कि हम प्रभु की इच्छा के अनुसार भला कार्य करते जायें यद्यपि कोई स्पष्ट पुरस्कार प्राप्त न हो और प्रभु पर अटूट विश्वास के साथ जीवन जीयें। आप मुझसे पूछेंगे ऐसे जीवन से क्या मिलता है। जवाब सरल है पुनरुत्थान की आशा में जीने से मिलता है– आध्यात्मिक आनन्द और यही है अनन्त जीवन की शुरुआत। यदि हम चाहते हैं कि हम प्रसन्न रहें तो ये तीन विशिष्ट गुण-आशा, धैर्य और विश्वास ये तीनों हमारे लिये अति आवश्यक है। हम उस मुसलमान गुरु की बात याद करें कि हम आध्यात्मिक बातों को पूर्ण रूप से न भी समझते हों पर अगर हम चाहते हैं कि मरते ही हम समाप्त न हो जायें तो हम ईश्वर को खोजते रहें, उसके लिये बलिदान करते रहें और उस पुनरुत्थान के उस अनन्त सुख का रसास्वादन करते रहें जिसे प्राप्त करने के लिये ही हमारी सृष्टि हुई है।

 

 

वर्ष ‘स’ का बाईसवाँ रविवार,

प्रवक्ता ग्रंथ 3,17-20, 28-29
इब्रानियों के नाम, 12, 18-19,22-24
संत लूकस 14,1 7-14

जस्टिन तिर्की,ये.स.

ईसाई धर्म का सार
मित्रो, एक बार मैंने हाई स्कूल के छात्रों से पूछा था। छात्रों मुझे बताओ की काथलिक कलीसिया या ईसाई धर्म को तुम किस एक शब्द से परिभाषित कर सकते हो। ठेतों ने कहा फादर हमने आपकी बात नहीं समझी। मैंने फिर से कहा कि छात्रों तुम मुझे एक शब्द दो जो यह बतला सके कि यही ख्रीस्तीय धर्म का सार है। मुझे कोई एक शब्द दो जो तुम्हें लगता है कि जिसमें ईसाई धर्म का सार है या हम कहें ईसाई धर्म का आधार है। उसी शब्द पर आधारित होकर ईसाई धर्म के सभी क्रिया-कलाप आग बढ़ते हैं और इसी शब्द को अर्थपूर्ण बनाते हुए ईसाई ईश्वर तक पहुँचना चाहते हैं। जब मैंने अपने सवाल को पूर्ण रूप से समझा दिया तब मैंने देखा कि क्लास के कई छात्रों के चेहरे पर प्रसन्नता की झलक दिखाई देने लगी। वे कुछ जवाब देने के लिये उत्सुक दिखाई देने लगे। मैंने एक लड़के से पूछा जो पहली पंक्ति में बैठा था क्या है जवाब तुम्हारा, क्या है ईसाई धर्म का सार। पहले लड़के ने उठ कर कहा फादर, निःसंदेह ईसाई धर्म का सार है प्रेम। तब दूसरे ने कहा क्षमा और तीसरे ने कहा बलिदान और चौथे ने कहा आज्ञापालन। मैंने प्रसन्न होते हुए कहा, छात्रों “मुझे तो एक शब्द की तलाश थी पर मुझे चार शब्द मिल गये – प्रेम, क्षमा, बलिदान और आज्ञापालन। तो छात्रों, आखिर वो कौन-सा शब्द है जो ईसाई धर्म के मर्म या गूढ़ रहस्य को अपने में समाहित किये हुए है।” मैं ऐसा बोल ही रहा था कि एक और छात्र ने अपने हाथ ऊपर करते हुए कहा कि फादर मेरे पास एक और एक शब्द है जिसे मैं समझता हूँ कि यह ईसाई धर्म का सार है। मैंने कहा, “प्रकाश, बताओ वह नया शब्द कौन-सा है।” तब प्रकाश ने कहा, “विनम्रता।” मैंने उससे पूछा, “ प्रकाश, तुम क्यों कहते हो कि विनम्रता या विनीत होना ईसाई धर्म का सार है।” उसने कहा कि फादर ईसाई धर्म के इतिहास में जो भी संत या धन्य बनें हैं अगर हम उनके जीवन को देखते हैं तो हम पाते हैं कि उनके जीवन में विनम्रता कूट-कूट कर भरी हुई थी। माता मरिया को ही लीजिये उन्होंने कहा, “देख मैं प्रभु की दासी हूँ” प्रभु येसु ने कहा था “मैं सेवा कराने नहीं बल्कि सेवा करने आया हूँ” । प्रकाश ने इन सब बातों को एक ही साँस में कह डाला। मैंने कहा कि छात्रों आपके जवाब सही हैं और मैं उससे प्रसन्न हूँ पर प्रकाश के जवाब ने मुझे अधिक प्रभावित किया है। ईसाई धर्म का सार है विनम्रता।

मित्रो, हम रविवारीय आराधना विधि कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन विधि पँचांग के वर्ष ‘स’ के 22वें रविवार के लिये प्रस्तावित सुसमाचार के आधार पर चिन्तन कर रहे हैं। आइये प्रभु के दिव्य वचनों को सुनें जिसे संत लूकस के 14वे अध्याय के 7 से 14 पदों से लिया गया है।

संत लूकस 14, 1-14
1) ईसा किसी विश्राम के दिन एक प्रमुख फ़रीसी के यहाँ भोजन करने गये। वे लोग उनकी निगरानी कर रहे थे।
7) ईसा ने अतिथियों को मुख्य-मुख्य स्थान चुनते देख कर उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया,
8) ”विवाह में निमन्त्रित होने पर सब से अगले स्थान पर मत बैठो। कहीं ऐसा न हो कि तुम से प्रतिष्ठित कोई अतिथि निमन्त्रित हो
9) और जिसने तुम दोनों को निमन्त्रण दिया है, वह आ कर तुम से कहे, ‘इन्हें अपनी जगह दीजिए’ और तुम्हें लज्जित हो कर सब से पिछले स्थान पर बैठना पड़े।
10) परन्तु जब तुम्हें निमन्त्रण मिले, तो जा कर सब से पिछले स्थान पर बैठो, जिससे निमन्त्रण देने वाला आ कर तुम से यह कहे, ‘बन्धु! आगे बढ़ कर बैठिए’। इस प्रकार सभी अतिथियों के सामने तुम्हारा सम्मान होगा;
11) क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।”
12) फिर ईसा ने अपने निमन्त्रण देने वाले से कहा, ”जब तुम दोपहर या शाम का भोज दो, तो न तो अपने मित्रों को बुलाओ और न अपने भाइयों को, न अपने कुटुम्बियों को और न धनी पड़ोसियों को। कहीं ऐसा न हो कि वे भी तुम्हें निमन्त्रण दे कर बदला चुका दें।
13) पर जब तुम भोज दो, तो कंगालों, लूलों, लँगड़ों और अन्धों को बुलाओ।
14) तुम धन्य होगे कि बदला चुकाने के लिए उनके पास कुछ नहीं है, क्योंकि धर्मियों के पुनरूत्थान के समय तुम्हारा बदला चुका दिया जायेगा।”

बड़ा-छोटा, छोटा- बड़ा
मित्रो, आज के सुसमाचार के 11 वें पद ने मुझे बहुत प्रभावित किया जिसमें कहा गया है कि जो अपने को बड़ा मानता है वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है वह बड़ा बनाया जायेगा। मित्रो, आज मैं आपको एक सवाल पूछता हूँ कि क्या आप अपने को बड़ा मानते हैं? क्या आप बड़ा होने चाहते हैं? क्या आप सोचते हैं कि आप बड़े हो गये हैं? क्या दूसरे लोग कहते हैं कि आप बड़े हो गये हैं? श्रोताओ आपने इस बात पर विचार न भी क्या हो या आपके मन में ऐसा सोच न भी आया हो पर सच्चाई तो यह है कि हम कई बार यह सोच बैठते हैं कि हम बड़े हो गये हैं। मित्रो, जरा अपनी ही कही बातों की हम याद करें। हमने कई बार लोगों को यह कहते सुना है कि मैंने भी दुनिया देखी है। मुझे तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं। यह मैं अकेले कर सकता हूँ। मेरे पास क्या नहीं हैं मुझे तुम्हारे उपदेश की कोई ज़रूरत नहीं उपदेशों की गठरी तुम्हें ही मुबारक हो आदि-आदि। मित्रो, यदि आप ने ऐसा कहा या ऐसा सोचा हो तो प्रभु की बातों पर गौर करें। वे कहते हैं कि जो अपने को बड़ा समझता है वह छोटा बनाया दिया जायेगा।

नम्र बनें
मित्रो, आज के सुसमाचार में प्रभु एक और सलाह दे रहे हैं। वे कहते हैं कि जब तुम्हें निमंत्रण मिले तो सबसे पीछे बैठो जिससे निमंत्रण देने वाला आकर तुमसे कहे–महाशय आगे बढ़ कर बैठिये तब सभी अतिथियों के सामने तुम्हारा सम्मान बढ़ेगा। मित्रो, आखिर प्रभु हमें क्या बताना चाहते हैं। वे हम से कह रहे हैं कि हम नम्र बनें। हम विनीत बनें। दूसरे शब्दों में येसु हमें कह रहे हैं कि आप अपने आप पर घमंड मत कीजिये। अपने आपको बड़ा मत समझिये। नम्र बनिये दूसरों का सेवक बनिये। दूसरों को भला नमूना दीजिये। दूसरों का सम्मान कीजिये। दूसरों के गुणों की तारीफ कीजिये और सदा अच्छाइयों को अपनाने और अच्छाई करने वालों को प्रोत्साहन दीजिये। सच पूछा जाये तो यही है वास्तव में बड़ा बनने का तरीका। अपने को छोटा बनाना ताकि हम उस उँचाई को छू सकें। हम नम्र बनें।

मित्रो, ठीक इसी भाव को प्रकट करते हुए प्रसिद्ध कवि संत कबीर ने कहा था –
“लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूरि। चींटी सक्कर ले चली, हाथी के सिर धूरि॥” इसका भावार्थ है कि अगर आप अपने को नम्र बनाते हैं तो आप बड़े होते हैं पर आप में बड़प्पन आ जाये तो बड़े नहीं रह जाते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कि चींटी छोटी है पर सदा ही नम्रतापूर्वक चीनी के दानों को लेकर अपने घर लाती है पर हाथी सोचता है कि बड़ा और रास्ते से अपने लिये सिर्फ धूल ही लेकर आता है। मित्रो, बात स्पष्ट है बड़ा दिखने और सोचने वाला बड़ा है कि अच्छी बातें सोचने, जमा करने और भला करने वाला।

नम्रता का अर्थ
मित्रो, हो सकता है कि हम अपने आप से प्रश्न करें कि आखिर जब येसु हमें नम्र होने का संदेश दे रहे हैं तो वे हमें कहना क्या चाहते हैं। येसु जब हमसे कहते हैं कि नम्र बनें, छोट बनें तो वे हमसे तीन बातों को बता रहे हैं। पहली बात कि हम हर व्यक्ति को का सम्मान करें चाहे वह ग़रीब हो या अमीर। हम उन्हें ईश्वर का वरदान मानें।
दूसरी बात कि हम अच्छाइयों को सीखने के लिये तैयार रहें। अच्छाई और सच्चाई को गले लगायें औऱ अपनी को इससे मापें कि आपने कितनी बार नम्र होकर दूसरों का हित किया है। और तीसरी बात कि आप जो भी करते हैं उसमें कोई दिखावा न हो आप जो कुछ भी करें ईश्वर के लिये करें। आपके आचरण में कोई दोहरी चाल न झलके। जो आप बोलें वही आप करें और जो कहें वैसा ही आचरण भी करें।

मित्रो, विश्वास मानिये अगर आपने इन तीन बातों को अपने मन में रख लिया और उसके अनुसार जीवन जीने लगें तो हम अवश्य ही ईश्वर के सामने बड़े हो जायेंगे। आज प्रभु का निमंत्रण है कि हम दूसरों का सम्मान करें हम अच्छाइयों को खुद करें और दूसरों को इसके लिये प्रोत्साहन दे और साथ ही कोई दिखावा न करें और तब कौन आपको रोक सकता है बड़ा होने से। अगर आप नम्रता के साथ जीवन व्यतीत करते हैं तो आप सच्चे मानव है सही में ईश्वर की संतान है, सच्चे ईसाई, सच्चे हिन्दु हैं सच्चे मुसलमान या सच्चे सिक्ख हैं। ईसा-मसीह ने खुद भी यही किया और उन्होंने यही चाहा कि दुनिया का हर इंसान नम्र बनके ही दुनिया में सुखी और स्वर्ग में ईश्वरीय पुरस्कार का हकदार बन सकता है।

वर्ष ‘स’ का इक्कीसवाँ रविवार

नबी इसायस 66,18-21
इब्रानियों के नाम, 12, 5-7,11-13
संत लूकस 13, 22-30

जस्टिन तिर्की, ये.स.

मेंढक की कहानी
मित्रो, आज आप लोगों के एक मेंढक की कहानी बताता हूँ। एक मेंढक एक गाँव के तालाब में रहा करती थी। वह सोचती थी कि उससे बड़ा दुनिया में और कोई नहीं है। उसे लगता था कि वह तालाब की रानी है। उसके सात बच्चे थे। एक दिन बच्चों को छोड़ कर वह बाहर चली गयी थी। बहुत देर हो गयी पर वह घर नहीं लौटी। मेंढक के सातो बच्चे तालाब के किनारे माँ का इन्तज़ार कर रहे थे। माँ नहीं लौटी। वे परेशान थे। इतने ही में एक सभी मेंढकों ने एक विशाल जीव को देखा। वे बहुत ही घबरा गये। यह इतना विशाल था कि उन भय होने लगा कि कहीं उन सब बच्चों को निगल न जाये। यह विशाल जीव और कुछ नहीं पास के गाँव के एक किसान की गाय थी जो तालाब में पानी पीने आयी थी। मेंढकों ने पहली बार गाय को देखा था इसलिये वे परेशान थे। पानी पीकर गाय वापस चली गयी तब मेंढकों ने चैन की साँस ली। कुछ देर के बाद जब मेंढकों की माँ वापस आयी तब सभी बच्चों ने एक स्वर से उत्साहपूर्वक बताया कि उन्होंने एक विचित्र जीव को देखा है। वह बहुत ही विशाल थी। तब माता मेंढक ने कहा कि क्या वह मुझसे भी बड़ी थी। बच्चों ने कहा आप से बहुत बड़ी थी। माता मेंढक ने अपने शरीर को फुलाना शुरु किया और कहा कि क्या वह हमसे भी बड़ी थी। बच्चों ने कहा कि आपसे बहुत बड़ी थी। माता मेंढक ने अपने को और ही अधिक बड़ा किया। और पूछा बच्चों क्या वह विशाल जीव मुझसे भी बड़ी थी। बच्चों ने कहा वह आपसे से कई-कई गुना ज़्यादा बड़ी थी। माता मेंढक अपने को फुलाती रही और बच्चे कहते रहे कि वह इससे बड़ी थी और ऐसा होता रहा। माता अपने को बड़ा करती रही और बच्चे कहते रहे इससे बड़ा इससे बड़ा। फिर ऐसा हुआ कि माता मेंढक फट की आवाज़ के साथ फट गयी और उसका सारा घमण्ड चूर हो गया। मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजनविधि पंचांग के वर्ष के 21वें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर मनन चिन्तन कर रहें हैं। आइये हम प्रभु के दिव्य वचनों को सुनें जिसे संत लूकस के 13वें अध्याय के 22 से 30 पदों से लिया गया है।

संत लूकस, 13-22-30
22) ईसा नगर-नगर, गाँव-गाँव, उपदेश देते हुए येरुसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे।
23) किसी ने उन से पूछा, ”प्रभु! क्या थोड़े ही लोग मुक्ति पाते हैं?’ इस पर ईसा ने उन से कहा,
24) ”सँकरे द्वार से प्रवेश करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ-प्रयत्न करने पर भी बहुत-से लोग प्रवेश नहीं कर पायेंगे।
25) जब घर का स्वामी उठ कर द्वार बन्द कर चुका होगा और तुम बाहर रह कर द्वार खटखटाने और कहने लगोगे, ‘प्रभु! हमारे लिए खोल दीजिए’, तो वह तुम्हें उत्तर देगा, ‘मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ के हो’।
26) तब तुम कहने लगोगे, ‘हमने आपके सामने खाया-पीया और आपने हमारे बाजारों में उपदेश दिया’।
27) परन्तु वह तुम से कहेगा, ‘मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ के हो। कुकर्मियो! तुम सब मुझ से दूर हटो।’
28) जब तुम इब्राहीम, इसहाक, याकूब और सभी नबियों को ईश्वर के राज्य में देखोगे, परन्तु अपने को बहिष्कृत पाओगे, तो तुम रोओगे और दाँत पीसते रहोगे।
29) पूर्व तथा पश्चिम से और उत्तर तथा दक्षिण से लोग आयेंगे और ईश्वर के राज्य में भोज में सम्मिलित होंगे।
30) देखो, कुछ जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और कुछ जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे।”

सँकरा द्वार
आज के सुसमाचार में अनायास ही जिस वाक्य ने मेरे मन को प्रभावित किया है वह संकरे द्वार से प्रवेश करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करो क्योंकि में तुमसे कहे देता हूँ – प्रयत्न करने पर भी बहुत से लोग प्रवेश नही कर पायेंगे। मित्रो, येसु इस कथन के द्वारा हम सबों को यही बताने का प्रयास कर रहे हैं कि हमें मुक्ति सँकरे द्वार से ही मिल सकती है। बड़े-बड़े दरवाजे आकर्षक हो सकते हैं पर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिये संकीर्ण द्वार से ही प्रवेश करने की आवश्यकता है। मित्रो, प्रभु के वचनों को सुनने से हमें यह आभास होता है कि स्वर्ग का मार्ग कितना कठिन है। मानवीय दृष्टि से यह सही भी है स्वर्ग का मार्ग अपनाना अर्थात् कई बार उन मार्गों से होकर गुजरना जिधर से कम लोग जाते हैं। कई बार हमने खुद ही महसूस किया है कि स्वर्ग का राज्य संकीर्ण मार्ग है कॉँटों का मार्ग है क्रूस का मार्ग है नम्रता का मार्ग है। कई बार तो हमने लोगों को यह भी कहते हुए सुना है कि स्वर्ग का मार्ग दुःखों का मार्ग है। इन्हीं भावों को हमने लोगों के मुख से कई दूसरे अन्य अभिव्यक्तियों में भी पाया होगा। लोग कहते हैं कुछ पाने के लिये कुछ खोना पड़ता है। मित्रो, प्रभु भी आज हमें बताना चाहते हैं कि जो अपने जीवन में अपने सही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये दुःख उठाने के लिये तैयार हो जाते हैं, जो नम्रतापूर्वक अच्छे भले और सच्चे मार्ग पर चलने की तकलीफ़ झेलने को तैयार हो जाते हैं उन्हें ही स्वर्ग की खुशी प्राप्त होगी।

बड़ा का नहीं बड़प्पन का विरोध
मित्रो, जब प्रभु कहते हैं कि हम संकरे रास्ते से होकर जाना है तो वे हमसे यही बताना चाहते हैं कि हम नम्र बनें, हम अपने को ईश्वर के सामने छोटा समझें। कई बार हम यह भी सोचने लगते हैं कि बड़ा होने में बुरा ही क्या है। हमने अपने जीवन में इस सच्चाई को भी देखा कि दुनिया के लोग तो बड़े होने की होड़ में लगे हुए है। वे बड़े घर की बात करते हैं बड़े खानदान की बात करते हैं बड़ी गाड़ी, बड़ा बंगला बड़ी-बड़ी योजनाओं की बात करते हैं और कई बार यह सोचने लगते हैं कि बिग इज़ बेस्ट’ अर्थात् बड़ा होना ही सबसे अच्छा है। हम इस बात को भूल भी जाते हैं कि बड़ा होने से हमें बड़ी खुशी नहीं मिल जाती है। कई बार मानव बड़ा तो बन जाता है पर बड़ा होता नहीं है।

मित्रो, ऐसा भी नहीं है कि प्रभु बड़े होने का ही विरोध कर रहे हैं। हमें ऐसा न लगे कि प्रभु चौड़े और उँचे द्वार का विरोध कर रहें हैं। प्रभु हमारे धन-दौलत का विरोध कर रहे हैं। पर ऐसा नहीं है प्रभु सिर्फ़ इतना कह रहे हैं कि यदि कोई सांसारिक वस्तुओं के बले-बूते स्वर्ग राज्य की प्राप्ति करना चाहे या इसे खरीदना चाहे तो यह असंभव है। मित्रो, आप मुझे अवश्य पूछेंगे कि आखिर सँकरे मार्ग पर चलने का क्या मतलब है। एक बार प्रेरित संत पौल ने इब्रानियों को एक पत्र लिखा था उसमें उन्होंने कहा था “मेरे पुत्र और पुत्री प्रभु के अनुशासन की उपेक्षा मत करो और उसकी फटकार से हिम्मत मत हारो क्योंकि प्रभु जिसे प्यार करता है उसे दण्ड देता है और जिसे पुत्र या पुत्री मानता है उसे कोड़े लगवाता है।

प्रभु के लिये दुःख
मित्रो, इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रभु जिन्हें प्यार करते हैं उनका जीवन दुःख-तकलीफों से भरते रहते हैं। पर ये दुःख-तकलीफ प्रभु के प्यारों को विचलित नहीं करता है बल्कि उनका प्रेम प्रभु के लिये और भी गहरा हो जाता है। ऐसे लोग प्रभु के लिये दुःख उठाने में आनन्द का अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों की बस एक प्रार्थना होती है प्रभु, दुःख में और सुख में बस तेरी इच्छा पूरी हो।
मित्रो, जब मैं कहता हूँ कि दुनिया के कुछ लोग ऐसे हैं जिनका जीवन प्रभु के लिये हो गया हो और प्रभु के लिये कुछ भी दुःख उठाना अपने सौभाग्य समझते हैं तो आप यह न सोचें कि ऐसे लोग सिर्फ़ संत और महात्मा ही हैं। बस अपने घर में दृष्टि दौड़ाइये। माँ को देखिये परिवार को प्रसन्न रखने के लिये वह खुद का हिस्सा खाना अपने बच्चों में बाँट देती है। पिता को देखिये अपना खून-पसीना एक करके घर के एक-एक सदस्य के लिये दो जून की रोटी जमा करते हैं। भाई-बहनों को देखिये कितना निर्मल है उनका प्यार और बलिदान, जहाँ एक दूसरे को सुन्दर और सफल बनाने के मार्ग में दुःख-दर्द का अनुभव तो है पर उनके चेहरे में स्वर्गीय खुशी की एक स्पष्ट आभा किसी से छुपा नहीं है।
मित्रो, मेरा तो पूरा विश्वास है कि इस दुनिया का हर व्यक्ति ईश्वर तक पहुँचने के लिये प्रयासरत है पर उनके मार्ग में तीन बड़ी बाधायें हैं। पहली, वह खुद पर, खुद की सफलता और उपलब्धियों पर घमंड करता है। दूसरी, वह अपने भले कार्यों को स्थगित करता है और बुरे कार्यों को इतनी जल्दी यह सोचकर कर डालता है कि क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लें। फिर तीसरी, कमजोरी मानव की यह है कि वह जीवन में आने वाली विपत्ति के समय घबरा जाता है और उन सब ही उपायों और बड़े दरवाज़ों का सहारा लेता है जो सरल दिखाई देते हैं पर उन्हें ईश्वर और ईश्वरीय जीवन से दूर कर देता है।
शांति की खोज
मित्रो, एक बात तो निश्चित है कि हम शांति चाहते हैं हम प्रभु को पाना चाहते हैं हम मुक्ति चाहते हैं। हमें यह भी मालूम है कि द्वार सँकरा है हम यह भी जानते हैं कि यह नम्रता का मार्ग है यह प्रभु के लिये दुःख उठाने का मार्ग है यह चुनौतियों के पल प्रभु पर पूर्ण भरोसा करते हुए भले पथ पर चलते रहने का मार्ग है तब क्यों न हम नम्र बने क्यों न हम भला करें क्यों ने बुरी आदतों को छोड़ दें अच्छे कार्यों को तुरन्त कर डालें क्या हम अच्छे कार्यों करना उस समय आरंभ करेंगे जब दरवाज़ा बन्द हो चुका होगा।

वर्ष ‘स’ का 20 वाँ रविवार

येरेमियस 38,4-6,8-10,

इब्रानियों के नाम 12,1-4,

संत लूकस 12, 49-53

जस्टिन तिर्की,ये.स.

सरजु की कहानी
मित्रो, आज आप लोगों को सरजु की कहानी बतलाता हूँ। एक गाँव में एक हिन्दू रहा करता था जिसका नाम था सरजु। वह जादू दिखला कर अपना जीवन व्यतीत करता था उसके कई ईसाई मित्र थे और उनसे उसने येसु के बारे में सुना था। उसे जानकारी प्राप्त हो गयी थी कि येसु जब जीवित थे तो उन्होंने कई चमत्कार दिखलाये थे। येसु ने भूखों को रोटी खिलायी थी, प्यासों को पानी और रोगियों को चंगा किया था। येसु के जीवन से वह बहुत प्रभावित था। जब वह जादू दिखाता तो लोग भी उसके कार्यों से मंत्रमुग्ध हो जाते थे और उसकी वाहवाही करने लगते थे। सरजु को लगा कि वह भी ईसा मसीह के समान ही कार्य करने लगा है। क्यों न वह भी ईसाई बन जाये। उसने यह बात अपने ईसाई मित्र से कही। ईसाई मित्र ने कहा कि ईसाई बनने के लिये सिर्फ जादू दिखाना या कोई चमत्कार कर लेना काफी नहीं है उसे ईसा मसीह के बारे में कुछ और जानना चाहिये। और तब सोच समझ कर ईसाई बनना चाहिये। ईसाई मित्र ने उसे पड़ोस के एक फादर से मुलाक़ात कराने के लिये आमंत्रित किया। दोनों चल पड़े। रास्ते में कुछ भूखे लोग मिले और सरजु ने कुछ ऐसा किया कि उसकी थैली में रोटी आ गये उसने भूखों को रोटी दी और वे तृत्प हो गये। फिर कुछ आगे जाने पर कुछ रोगी मिले। सरजु ने उनके ऊपर हाथ रखे और कुछ खाने को दिये और वे भी चंगे हो गये। सरजु ने कहा कि देखो मैं तो वह सबकुछ कर सकता हूँ जो येसु किया करते थे मैं ईसाई बन सकता हूँ। कुछ देर बाद वे फादर के आवास में पहुँचे। सरजु ने फादर से वहीं बात दुहरायी। फादर मैं वो सबकुछ कर सकता हूँ जो येसु किया करते थे इसलिये मैं भी ईसाई बनना चाहता हूँ। फादर ने उसकी बात ध्यान से सुना और कहा कि मैं आप के कामों और ईसाई बनने की इच्छा से प्रसन्न हूँ। फिर भी मुझे एक सवाल पूछना है। सरजु ने कहा, “आप पूछ सकते हैं फादर जी।” फादर ने क्रूस पर लटके येसु को दिखा कर कहा, “उसे पहचानते हो।” “थोड़ा-थोड़ा फादर।” फादर ने कहा, “यही हैं येसु मसीह जिसे लोगों ने उसके चमत्कारों के लिये सूली पर ठोंक दिया और उनकी मृत्यु हो गयी। यही है ख्रीस्तीय जीवन का सार। दूसरों की भलाई करना, दूसरों की सेवा करना।सेवा करते-करते अपनी जान भी गँवा देना। अगर तुम्हें यह सब मंज़ूर है तो तुम ख्रीस्तीय बन सकते तो।” तब उस जादुगर सरजु ने यह भी कह डाला। मैं येसु के समान मूर्ख नहीं हूँ। मैं दूसरों की सेवा करुँ और दुःख भी उठाऊँ, अपमानित भी होऊँ। यह संभव नहीं है। और वह वहाँ से चला गया।
संत लूकस, 12, 49-57
मित्रो, हम पूजन विधि पंचांग के वर्ष ‘स’के 20वें रविवार के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठ के आधार पर मनन-चिन्तन कर रहे हैं। प्रभु हमें बतला रहें कि इस धरा पर आने का उनका क्या लक्ष्य है और उनके संदेश का लोगों के जीवन पर क्या असर होगा।
49) ”मैं पृथ्वी पर आग ले कर आया हूँ और मेरी कितनी अभिलाषा है कि यह अभी धधक उठे!
50) मुझे एक बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ!
51) ”क्या तुम लोग समझते हो कि मैं पृथ्वी पर शान्ति ले कर आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है। मैं फूट डालने आया हूँ।
52) क्योंकि अब से यदि एक घर में पाँच व्यक्ति होंगे, तो उन में फूट होगी। तीन दो के विरुद्ध होंगे और दो तीन के विरुद्ध।
53) पिता अपने पुत्र के विरुद्ध और पुत्र अपने पिता के विरूद्ध। माता अपनी पुत्री के विरुद्ध होगी और पुत्री अपनी माता के विरुद्ध। सास अपनी बहू के विरुद्ध होगी और बहू अपनी सास के विरुद्ध।”
54) ईसा ने लोगों से कहा, ”यदि तुम पश्चिम से बादल उमड़ते देखते हो, तो तुरन्त कहते हो, ‘वर्षा आ रही है और ऐसा ही होता है,
55) जब दक्षिण की हवा चलती है, तो कहते हो, ‘लू चलेगी’ और ऐसा ही होता है।
56) ढोंगियों! यदि तुम आकाश और पृथ्वी की सूरत पहचान सकते हो, तो इस समय के लक्षण क्यों नहीं पहचानते?
57) ”तुम स्वयं क्यों नहीं विचार करते कि उचित क्या है?
58) जब तुम अपने मुद्ई के साथ कचहरी जा रहे हो, तो रास्ते में ही उस से समझौता करने की चेष्टा करो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायकर्ता के पास खींच ले जाये और न्यायकर्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बन्दीगृह में डाल दे।
59) मैं तुम से कहता हूँ, जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे।”
मित्रो, मेरा पूरा विश्वास है कि आपने प्रभु के दिव्य वचनों को ध्यान से सुना और इसके द्वारा आपको और आपके परिवार के सब सदस्यों को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं।
मित्रो, मैं सोचता हूँ कि आप प्रभु के वचनों को सुनकर निश्चय ही परेशान हो रहे होंगे कि प्रभु आज इतने कठोर क्यों हो गये हैं। मैंने भी चिन्तन के आरंभ में ऐसा ही सोचा कि प्रभु दयालु नहीं हैं पर अत्यंत कठोर हैं और हमें शांति के बदले फूट की बात कर रहे हैं। पर मित्रो अगर हम प्रभु के जीवन पर उनके एक-एक वचन पर विचार करें तो पायेंगे कि प्रभु तीन बातों को बतलाना चाहते हैं।
पहली बात कि वे एक नबी बन कर सत्य को हमारे सम्मुख रख रहे हैं। दूसरी बात हमें सत्य के प्रति जागरूक बनाने का साहस दिखाना। और तीसरी बात प्रभु के मिशन को आगे बढ़ाना अर्थात् खुद ही नबी बनना।
सच्ची बातें
मित्रो, प्रभु ने आज जिन बातों को हमारे समक्ष रखा है उन्हें नबी लोगों के सम्मुख रखा करते थे। उनके वचनों में सच्चाई होती थी प्रभु की ओर से एक चेतावनी होती थी और प्रभु की ओर लौटने का एक आमंत्रण होता था। पर कई बार लोग उनकी बातों को नहीं सुनते थे और कई बार तो उन्हें सत्य बोलने की कीमत अपने प्राण देकर चुकाना पड़ता था। प्रभु के वचन में जीवन की वह सच्चाई है जिसे हर व्यक्ति स्वीकार नहीं करता। येसु के वचनों में जो माँग है उसे हर व्यक्ति पूरा नहीं करना चाहता। येसु के वचनों में सेवा, प्रेम, सद्भाव, और सहयोग करने का जो आह्वान है उसे हर व्यक्ति पूरा नहीं करना चाहता। ऐसी बात आज की दुनिया के लोगों के साथ सिर्फ़ नहीं है पर जब येसु ने अपना जीवन जीया तब ही येसु की बातों को लोगों ने ठुकरा दिया। एक ही परिवार के कुछ लोगों ने उन्हें स्वीकार किया और कुछ ने उन्हें दुत्कार दिया। येसु के भले अच्छे और सच्चे जीवन के बावजूद लोगों ने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया। इसलिये येसु को अच्छी तरह से मालूम है कि उनके वचन सबके लिये शांति के संदेश नहीं लाते। और इसी लिये आज वे हमें इस बात को बतलाना चाहते हैं कि प्रभु के वचन मधु के रस के समान मीठे नहीं होते। सच पूछा जाये तो प्रभु के वचन दुधारी तलवार के समान होते हैं। वे हमसे बलिदान की माँग करते हैं। हमें बुराई से दूर चलने की सलाह देते हैं। हमें अच्छी संगति में चलने को कहते हैं। हमें बुरी लतों से दूर होने को कहते हैं जो कई बार कर्णप्रिय नहीं पर कर्णकटु लगते हैं। इसीलिये प्रभु ने कहा कि वे शांति नहीं पर फूट लेकर आये हैं।
सत्य बोलने का साहस
मित्रो, प्रभु के वचनों से दूसरी सीख या प्रेरणा हमें मिलती है वह है सच्ची बातों के प्रति खुद ही जागरूक होना और दूसरों को भी बताने का साहस करना। हमने कई बार यह अनुभव किया है कि हम सच्ची बातें जानते हैं और यह भी जानते हैं कि हमारे परिवार के सदस्य या मित्र उसे सुनना पसन्द नहीं करेंगे तो हम उन्हें बतलाने से कतराते हैं। हम सोचते हैं कि इससे हमारी मित्रता चली जायेगी। हम बुराई को बर्दाश्त कर लेते हैं दोस्ती की ख़ातिर। ऐसी दोस्ती भी क्या दोस्ती जो हमें बुराई से न बचाये। सच्ची दोस्ती तो हम उसे कहते हैं जो हमें अच्छा सच्चा और भला बनाना चाहे इसके लिये उसे कोई कटु शब्द ही कहना क्यों न पड़े।
मित्रो, हमें इस बात को जानने की ज़रूरत है कि ईश वचन को हर व्यक्ति स्वीकार नहीं करता है। सिद्धांतपूर्ण जीवन की लोग सराहना करते हैं पर उसका अनुकरण नहीं करना चाहते। अच्छी, भली और सच्ची बातों को लोग सुन तो लेते हैं पर यह ज़रूरी नहीं कि वे इसका पालन करें। कई लोग तो इन बातों की हँसी उड़ाते या उसके अनुसार जीना मूर्खता समझते हैं। मित्रो, इन सबकुछ को जानने के बाद भी येसु ने लोगों को ऐसी बातें बोलने का साहस किया ताकि मानव का कल्याण हो। सच्ची बातें कड़वी होतीं हैं और कई बार इससे हमारे दुश्मन पैदा हो जाते हैं।
मित्रो प्रभु के वचनों से हम जो तीसरी बात सीखते हैं वह है कि हम भी येसु के समान बने। सत्य बोलने का साहस करें ताकि हमारा जीवन सबके वास्तविक हित में हो सके। वास्तविक हित कहने का तात्पर्य है हमारे वचनों से व्यक्ति को लगे कि किसी ने उसे झकझोर दिया है पर उसे सुनकर वह प्रभु की लौट आये।
नबी बनने का आमंत्रण
मित्रो, हमारा जीवन एक नबी का जीवन है। हम बुलाये गये हैं ताकि हम प्रभु के प्रवक्ता बने, प्रभु का वचन बोलें और उसी के अनुसार जीवन जीयें। प्रभु के वचनों को बोलने के लिये यह ज़रूरी है कि हम प्रभु के साथ व्यक्तिगत संबंध गाढ़ा करें, हर निर्णय में उसकी आवाज़ सुनें और उन बातों को बोलने का साहस करें और उसी के अनुसार जीवन भी व्यतीत करें तब ही हम येसु के सच्चे शिष्य हैं। तब ही हम सेवा, प्रेम, न्याय और सद्भावना के सच्चे समर्थक है सरजु नामक उस जादूगर के समान नहीं जो कुछेक हाथों का खेल दिखाने के बाद सोचता था कि वह येसु के समान है पर जब फादर ने उससे क्रूस के बलिदान की बात कही तो वह इसे मूर्खतापूर्ण कहा। कई बार येसु के वचनों के अनुसार चलना और जीना मूर्खता पूर्ण लगे पर ईश्वर की दृष्टि में यह निश्चय ही महान है, प्रशंसा के योग्य है।

वर्ष ‘स’ उन्नीसवाँ रविवार

प्रज्ञा ग्रंथ 11, 6-9
इब्रानियों के नाम, 11, 1-2,8-19
संत लूकस 12, 32-48

जस्टिन तिर्की, ये.स.

दीपक का जवाब
मित्रो, आज मैं आपलोगों को एक घटना के बारे में बताता हूँ जो एक स्कूल में घटी। किसी काथलिक स्कूल में अवकाश के समय कुछ बच्चे खेल रहे थे। खेल में वे इतने मशगूल थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि उनके प्रधान अध्यापक वहाँ आ विराजे है। प्रधानाध्यापक की आदत थी कि वे बच्चों को कहीं भी कोई भी सवाल पूछ लिया करते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। हेडमास्टर तालियाँ बजा कर बच्चों के खेल को रोका और उनसे एक सवाल पूछ ही डाला। उन्होंने बच्चों से कहा प्यारे बच्चों मैं तुम से एक सवाल पूछना चाहता हूँ। सभी बच्चे हेडमास्टर की ओर देखने लगे। तब उन्होंने कहा कि बच्चों अगर तुम्हारे पास अभी सिर्फ पाँच ही मिनट हो और इसके बाद दुनिया का अन्त हो जाये तो तुम उस पाँच मिनट में क्या करोगे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद पहले बच्चे ने कहा कि सर मैं मेरी मम्मी को बहुत प्यार करता हूँ मैं मम्मी के पास जाऊँगा और उन्हें मेरा प्यार भरा चुम्बन दूँगा और इस दुनिया से विदा होने के लिये तैयार हो जाऊँगा।
दूसरे बच्चे ने कहा कि मैं तो आइस्क्रीम बहुत पसंद करता हूँ इसलिये अपने पिता के पास जाऊँगा और उनसे कहूँगा कि पापा मेरे लिये आइसक्रीम खरीद दो और उसे खाते-खाते मैं इस दुनिया से विदा हो जाउँगा। दो बच्चों से अपनी अंतिम इच्छा सुनने के बाद हेडमास्टर ने एक तीसरे लड़के से पूछा दीपक तुम क्या करोगे अगर तुम्हारे पास सिर्फ पाँच मिनट हो और इसके बाद दुनिया का अंत हो जाये। तब दीपक ने तपाक से जवाब दिया सर मैं तो खेल रहा था खेल अंत करने की घंटी नहीं लगी है मैं तो खेलता ही रहूँगा। और जब दुनिया का अंत हो जाये तो में खेलता-खेलता ही दुनिया से चला जाऊँगा।
मित्रो, तीनों बच्चों के जवाब सरल और प्रभावपूर्ण थे फिर भी तीसरे बच्चे के उत्तर से मैं प्रभावित हुआ। दीपक नामक उस बालक का जवाब सरल था पर उसमें छिपी गूढ़ बात से हमारे जीवन की दिशा ही बदल जा सकती है।
मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन-विधि पंचाँग के वर्ष के उन्नीसवें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन चिन्तन कर रहे हैं। मित्रो, प्रभु हमें बताना चाहते हैं कि मनुष्य को सदा तैयार रहना चाहिये।
संत लूकस 12, 32-48
32) छोटे झुण्ड! डरो मत, क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हें राज्य देने की कृपा की है।
33) ”अपनी सम्पत्ति बेच दो और दान कर दो। अपने लिए ऐसी थैलियाँ तैयार करो, जो कभी छीनती नहीं। स्वर्ग में एक अक्षय पूंजी जमा करो। वहाँ न तो चोर पहुँचता है और न कीड़े खाते हैं;
34) क्योंकि जहाँ तुम्हारी पूंजी है, वहीं तुम्हारा हृदय भी होगा।
35) ”तुम्हारी कमर कसी रहे और तुम्हारे दीपक जलते रहें।
36) तुम उन लोगों के सदृश बन जाओ, जो अपने स्वामी की राह देखते रहते हैं कि वह बारात से कब लौटेगा, ताकि जब स्वामी आ कर द्वार खटखटाये, तो वे तुरन्त ही उसके लिए द्वार खोल दें।
37) धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी आने पर जागता हुआ पायेगा! मैं तुम से यह कहता हूँ: वह अपनी कमर कसेगा, उन्हें भोजन के लिए बैठायेगा और एक-एक को खाना परोसेगा।
38) और धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी रात के दूसरे या तीसरे पहर आने पर उसी प्रकार जागता हुआ पायेगा!
39) यह अच्छी तरह समझ लो-यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर किस घड़ी आयेगा, तो वह अपने घर में सेंध लगने नहीं देता।
40) तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।”
41) पेत्रुस ने उन से कहा, ”प्रभु! क्या आप यह दृष्टान्त हमारे लिए कहते हैं या सबों के लिए?”
42) प्रभु ने कहा, ”कौन ऐसा ईमानदार और बुद्धिमान् कारिन्दा है, जिसे उसका स्वामी अपने नौकर-चाकरों पर नियुक्त करेगा ताकि वह समय पर उन्हें रसद बाँटा करे?
43) धन्य हैं वह सेवक, जिसका स्वामी आने पर उसे ऐसा करता हुआ पायेगा!
44) मैं तुम से यह कहता हूँ, वह उसे अपनी सारी सम्पत्ति पर नियुक्त करेगा।
45) परन्तु यदि वह सेवक अपने मन में कहे, ‘मेरा स्वामी आने में देर करता है’ और वह दास-दासियों को पीटने, खाने-पीने और नशेबाजी करने लगे,
46) तो उस सेवक का स्वामी ऐसे दिन आयेगा, जब वह उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा होगा और ऐसी घड़ी जिसे वह जान नहीं पायेगा। तब स्वामी उसे कोड़े लगवायेगा और विश्वासघातियों का दण्ड देगा।
47) ”अपने स्वामी की इच्छा जान कर भी जिस सेवक ने कुछ तैयार नहीं किया और न उसकी इच्छा के अनुसार काम किया, वह बहुत मार खायेगा।
48) जिसने अनजाने ही मार खाने का काम किया, वह थोड़ी मार खायेगा। जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत माँगा जायेगा और जिसे बहुत सौंपा गया है, उस से अधिक माँगा जायेगा।

सच्चा धन
मित्रो, मेरा पूरा विश्वास है कि आपने प्रभु के दिव्य वचनों को ध्यान से पढ़ा है और इससे आपको और आपके परिवार को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं। मित्रो, आज के प्रभु वचनों पर विचार करने से हम पाते हैं कि यहाँ तीन बातों पर विशेष बल दिया गया है। पहली बात तो यह है कि प्रभु चाहते हैं कि हम सच्चा धन इकट्ठा करें। हम सोचेंगे कि धन तो धन है क्या यह भी सच्चा या झूठा होता है। श्रोताओ सच्चा धन का मतलब है ऐसी चीजें, ऐसी बातें, ऐसे सोचा और ऐसा मनोभाव जिससे खुद को तो आनन्द मिलता ही है दूसरे भी इससे प्रसन्न होते हैं। ऐसी बातें जिसे बाँटने से यह बढ़ता है और इसके द्वारा एक ऐसे समुदाय का निर्माण होता है जहाँ जीने में आंतरिक सुख का अनुभव होता है। यह धन ईमानदारी से कमाया हुआ ऐसा वरदान है जिससे सदा ही मानव मात्र का कल्याण होता है। कभी हम इस धन को प्रेम कहते हैं कभी क्षमा तो कभी सेवा और कभी उदारता। ये सभी मानव के ऐसे गुण हैं जिनके सहारे मानव खुद पर तो विजय प्राप्त करता ही है इससे दूसरों के जीवन में भी परिवर्तन आते हैं। इससे खुद का कल्याण होता है दूसरों का भी हित होता है।
दूसरों की भलाई
मित्रो, तब आप मुझे पूछेंगे कि कई बार हमारे जीवन में ऐसा होता है कि हम दूसरों की भलाई तो करते हैं पर इससे खुद को ही ठोकर मिलता है। मित्रो, आप लोगों का सवाल उचित है। हम सबों ने यह कहावत सुनी है -भला करे से धक्का पाये। सभी व्यक्ति अच्छाई को तुरन्त नहीं पहचान पाते हैं। पर मित्रो, यही तो है अच्छाई करने वाले की अग्नि परीक्षा। जब लोग हमारी अच्छाई को न देखें न पहचाने और ठीक विपरीत हमसे लाभ उठायें और हमें ही मूर्ख समझें। ऐसे समय में आप अपनी अच्छाई के साथ टिके रहे, स्थिर बने रहे तो समझिये कि आप विजयी हो गये हैं। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अगर आपने अपनी अच्छाई पर कायम रहना सीख लिये तो आप मानिये कि आपने अच्छाई, सच्चाई और भलाई की जीत दर्ज़ कर दी है और इससे जो खुशी मिलती है यही है सच्चा धन।
गुण जमा करें
मित्रो, अब हम दूसरी बात पर ग़ौर करें जिसे ईश्वर आज हमें बताना चाहते हैं। वे कहते हैं कि हमारे दीपक सदा जलते रहें। इस बात को बता कर प्रभु हमें यही बताना चाहते हैं कि हम गुणों को जमा करे। हम सदा अच्छे और सच्चे धन को बढ़ाने का प्रयास करें। हम जो भी भला कार्य करतें हों जो भी भलाई की बात सोचतें हो और भलाई की जो भी योजनायें बनाते हों वह जीवन भर के लिये हो न कि सिर्फ़ कुछ समय के लिये जिससे हमें कुछ लाभ हो। हम सदा इस बात के लिये उत्सुक रहें कि हम ईश्वर के लिये अपना दीपक जलाते रहेंगे और उसमें प्रेम दया क्षमा उदारता और उत्साह रूपी तेल भरते रहेंगे।
सदा तैयार रहें
इतना ही नहीं मित्रो, आज प्रभु हमें एक और बात बताना चाहते हैं वो यह कि हम सदा तैयार रहें। सदा तैयार रहने का अर्थ है हम यह सोचकर जीवन जीयें कि हमें अपने वास्तविक घर वापस लौटना है। हम मन में इस बात को रखकर जीवन का हर कदम उठायें कि हमें एक दिन प्रभु लेने आयेंगे। हम यह सोचकर दूसरों का भला करें, दूसरों को क्षमा दें दूसरों का भला सोचें कि यही सच्चा धन है जो हमें इस दुनिया में शांति देगा और इसी को लेकर हम इस दुनिया से विदा लेंगे। अगर हम उस छोटे बालक दीपक की तरह सदा तैयार रहेंगे तो हमें जब भी बुलाया जाये हम मुस्कुराते हुए इस जहान से विदा लेंगे। उस दिन हमें इस बात को न कोई ग़म होगा कि हमने कुछ कार्यों को पूरे नहीं किया है और न ही किसी के प्रति कोई ग़िला या शिकवा ही होगी कि उन्होंने हमारे लिये कुछ नहीं किया। उस दिन या हम कहें उस क्षण दुनिया में छोड़ने के लिये और प्रभु को दिखाने को हमारे पास होगी तीन प्रकार के धन-प्रेम, सेवा, क्षमा और उदारता की थैली, न बुझने वाला दीपक और प्रभु के पास लौटने की उत्सुकता और तत्परता होती।

वर्ष ‘स’ का अट्ठारहवाँ रविवार

उपदेश ग्रंथ 1, 2: 2, 21-23
कलोसियों के नाम, 3, 1-5,9-11
संत लूकस 12, 13-21

जस्टिन तिर्की, ये.स.

दो मित्र की कहानी
मित्रो, आज आप लोगों को दो दोस्तों के बारे बताता हूँ। एक समय की बात है किसी गाँव में दो मित्र रहा करते थे। दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान किया करते थे। दुःख में और सुख में सभी समय वे दोनों एक दूसरे का बहुत ख़्याल करते थे। उनकी दोस्ती की एक और विशेषता थी कि उनके बीच कभी भी किसी भी बात को लेकर झगड़ा नहीं हुआ था। एक दिन की बात है पहले मित्र ने दूसरे से कहा दोस्त क्या आपने एक बात पर ग़ौर किया है। दूसरे ने कहा किस बात पर। पहले ने कहा देखो न, हमारी दोस्ती के इतने साल बीत गये पर हमने आज तक कभी भी कोई झगड़ा नहीं किया है। दूसरे ने कहा यह बात बिल्कुल सच है दोस्त हमने एक-दूसरे से कभी झगड़ा नहीं किया है। तब पहले ने मज़ाक के लहज़े में कहा कि कम-से-कम हमें एक बार झगड़ कर तो देख लेना चाहिये। बस यह अनुभव करने के लिये कि झगड़ने से कैसा लगता है। दूसरे मित्र ने कहा दोस्त मुझे तो यह पता ही नहीं है कि झग़ड़ा कैसे लड़ा जाता है। तब पहले ने कहा कि दोस्त चिन्ता की बात नहीं है। झगड़ा लड़ना आसान है। मैं अभी एक ईंट ले आता हूँ। उसे हम दोनों के बीच रखेंगे। तब मैं कहूँगा मेरा है और तुम कहना मेरा है और लड़ाई शुरु हो जायेगी। बस क्या था पहले दोस्त ने एक ईंट लाया सामने रख दिया। फिर शुरु हुई लड़ाई। पहले ने ईंट पकड़ते हुए कहा मेरा है तब दूसरे ने कहा नहीं ये मेरा है। तब पहले ने फिर कहा मेरा है और दूसरे ने कहा मेरा है और दूसरे ने फिर कहा नहीं, ये मेरा है। तब पहले ने कहा आप सही बोल रहे हैं यह ईँट आपका ही है। और मित्र लड़ाई के मैदान से बाहर हो गये। लड़ाई समाप्त हो गयी। और वे फिर कभी नहीं लड़े नहीं। लड़ाई इसलिए होती है कि हम समझते हैं कि मेरा है, मैं उसका मालिक हूँ और वो नहीं।

मित्रो, रविवारीय आराधना विधि कार्यक्रम के अन्तर्गत पूजन विधि पंचांग के वर्ष ‘स’ के 18वें रविवार के लिये प्रस्तावित सुसमाचार पाठ के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं। आज के सुसमाचार में प्रभु हमें इस बात को बतलाना चाहते हैं कि मनुष्य के जीवन की एक सबसे बड़ी समस्या है कि वह अधिक-से-अधिक पाना चाहता है। वह अपने लिये धन जमा करना चाहता है। वह आरामदायक ज़िन्दगी जीना चाहता है।

संत लूकस 12,13-21

13) भीड़ में से किसी ने ईसा से कहा, ”गुरूवर! मेरे भाई से कहिए कि वह मेरे लिए पैतृक सम्पत्ति का बँटवारा कर दें”।
14) उन्होंने उसे उत्तर दिया, ”भाई! किसने मुझे तुम्हारा पंच या बँटवारा करने वाला नियुक्त किया?”
15) तब ईसा ने लोगों से कहा, ”सावधान रहो और हर प्रकार के लोभ से बचे रहो; क्योंकि किसी के पास कितनी ही सम्पत्ति क्यों न हो, उस सम्पत्ति से उसके जीवन की रक्षा नहीं होती”।
16) फिर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया, ”किसी धनवान की जमीन में बहुत फ़सल हुई थी।
17) वह अपने मन में इस प्रकार विचार करता रहा, ‘मैं क्या करुँ? मेरे यहाँ जगह नहीं रही, जहाँ अपनी फ़सल रख दूँ।
18) तब उसने कहा, ‘मैं यह करुंगा। अपने भण्डार तोड़ कर उन से और बड़े भण्डार बनवाऊँगा, उन में अपनी सारी उपज और अपना माल इकट्ठा करूँगा
19) और अपनी आत्मा से कहूँगा-भाई! तुम्हारे पास बरसों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है, इसलिए विश्राम करो, खाओ-पिओ और मौज उड़ाओ।’
20) परन्तु ईश्वर ने उस से कहा, ‘मूर्ख! इसी रात तेरे प्राण तुझ से ले लिये जायेंगे और तूने जो इकट्ठा किया है, वह अब किसका होगा?’
21) यही दशा उसकी होती है जो अपने लिए तो धन एकत्र करता है, किन्तु ईश्वर की दृष्टि में धनी नहीं है।”

धन और आराम
मित्रो, मेरा पूरा विश्वास है कि आप लोगों ने आज के सुसमाचार को ध्यान से पढ़ा है और प्रभु के दिव्य वचनों को सुनने से आपको और आपके परिवार के प्रत्येक सदस्य को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं। मित्रो, आज के सुसमाचार को सुनने के बाद आप हमें पूछेंगे कि प्रभु धन जमा करने के विश्राम करने और जीवन का आनन्द उठाने के विरुद्ध क्यों हैं। आखिर इसमें बुराई क्या है ? आप यह भी कहेंगे कि यदि हम अपने धन संपति को अपने मेहनत से कमाई है तो इसे दूसरों को आपत्ति क्यों है। अगर मैंने अपनी मेहनत के बल पर ज़्यादा धन इकट्ठा कर लिये तो दुनिया के लोग मेरे जैसा होते क्यों नहीं हैं।

मित्रो, आप लोगों का इस प्रकार सवाल करना उचित है। हमारी मेहनत की कमाई पर हमारा पूरा अधिकार होना ही चाहिये। मित्रो, प्रभु को हमारे मेहनत की कमाई पर कोई इतराज़ नहीं हैं। वास्तव में प्रभु तो चाहते हैं कि हम खूब कमायें और ऐसा ही हमारी क्षमता से सौ गुना फल उत्पन्न करें। वे तो चाहते हैं कि हम दृष्टि से सम्पन्न बनें और अपने मन-दिल और परिवार के सदस्यों को खुशियों से भर दें। तो मित्रो, कहाँ समस्या कहाँ है?

संपति और जीवन रक्षा
आज के सुसमाचार में प्रभु कहते हैं कि किसी के पास कितनी ही सम्पति क्यों न हो उस सम्पति से उसके जीवन की रक्षा नहीं हो सकती है। प्रभु की नज़रों में सम्पति कमा कर यह सोचने लगना की जीवन सुरक्षित हो गया है तो यह मानव की मूर्खता है। हाँ, यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि प्रभु बताना चाहते हैं कि प्रसन्न रहने के लिये धन तो चाहिये पर इसी से जीवन की सच्ची खुशी नहीं मिलेगी। मित्रो, सिर्फ़ रुपयों को बैंकों में जमा कर लेना काफी नहीं। खुद को योग्य या गुण-सम्पन्न बना लेना काफी नहीं। तो फिर मित्रो, प्रभु धन-सम्पति के मामले में क्या कहना चाहते हैं? प्रभु का कहना है जो व्यक्ति धन इकट्ठा तो करता है पर जो इसका उपयोग सिर्फ़ अपनी मौज़-मस्ती में करता है वह ईश्वर की दृष्टि में धनी नहीं हैं। मित्रो, अब आपका अगला सवाल होगा कि तो फिर ईश्वर की नज़र में धनी कौन है? अगर हमारे पास धन है पर उस धन के लिये हम धन्यवादी नहीं हैं, उस धन को हम सिर्फ़ अपना समझते हैं और उस धन के सामने हम ईश्वर और मानव को नगण्य समझते हैं तो हम ईश्वर के सामने ग़रीब हैं।

ईश्वर की नज़र गरीब-धनी
अगर हम इसे दूसरे तरीके समझें तो हम पायेंगे कि हम ईश्वर की नज़रों में ग़रीब हो जाते हैं अगर हम स्वार्थी हो जाते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी खुशी के लिये दूसरों के हितों की बलि चढ़ा देता है या दूसरों का हक मार लेता है तो ऐसा व्यक्ति प्रसन्न नहीं हो सकता है। मित्रो, आपको याद होगा कि बाईबल के पुराने व्यवस्थान में एक व्यक्ति के नाम की चर्चा है जिसे जोसेफ के नाम से जाना जाता है। उसने भी मिश्र में राजा की इच्छा के अनुसार बखारों में धन जमा किया था, पर उस धन को जमा करने के पीछे उसका एक ही मक़सद था कि इससे लोगों की भलाई हो। और ऐसा ही हुआ जब पूरे देश में अकाल पड़ा तो इसका उपयोग दूसरों की मदद हेतु किया गया।
मित्रो, यहाँ यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हम में जो कुछ है, जो कुछ हमारा है और जो कुछ हमने आज तक हासिल किये हैं उसका उपयोग परहित में ही हो। अगर हम ऐसा करते हैं तब हम प्रभु की नज़रों में धनी हैं। अगर हम अपनी अच्छाइयों को, अपने ज्ञान को, अपने सद् विचारों को अपने धन को दूसरों के साथ बाँटने के लिये तैयार हैं तब हम ईश्वर की नज़र में धनी हैं।

लालच और स्वार्थ
मित्रो, ईश्वर की दृष्टि में लालच एवं स्वार्थ स्वर्ग राज्य की प्राप्ति के मार्ग के सबसे बड़ी बाधा है। जो व्यक्ति लालची है अर्थात् सिर्फ़ पाने की इच्छा रखता हो वह कभी भी सुखी नहीं रह सकता है। वह सुखी दिखाई देने का प्रयास भले ही कर सकता हो। ठीक इसी प्रकार जो व्यक्ति सिर्फ़ अपनी चिन्ता करता अपनी मौज़-मस्ती पर ही वक्त गुज़ारता वह व्यक्ति ईश्वरीय खुशी के वरदान का भागीदारी नहीं हो सकता है। ठीक इसके विपरीत जो व्यक्ति धन जमा तो करता पर हमदम ईश्वर को धन्यवाद देता कि वह जो कुछ है वह ईश्वर की कृपा से है और अपनी खुशी बढ़ाने के लिये दूसरों की खुशी का ख़्याल करता वही व्यक्ति ईश्वर की नज़र में धनी है।

असल धन
मित्रो, जब कभी धन बाँटने की बात आती है तो हम इस बात की शिकायत करने लगते हैं कि हमारे पास तो कुछ है ही नहीं हम क्या बाँटेंगे। मित्रो, मैं आपको इस बात की याद दिला दूँ कि पहले मैं भी ऐसा ही सोचा करता था पर अब नहीं। मेरा जीवन मेरा धन हैं, मेरा समय मेरा धन है, मेरी मुस्कुराहट मेरा धन है, मेरी हर इच्छा, सोच, बात और हर कदम मेरा धन है जिसका उपयोग मैं इस दुनिया को अच्छा बनाने में लगाता हूँ तो यह धन मुझे आंतरिक रूप से प्रसन्न करने वाला धन बन जाता है।

मित्रो, यदि हम चाहते हैं कि ईश्वर की नज़र में धनी बनें तो हमें चाहिये कि हम ऐसा व्यक्ति बनें जो सुख के दिनों में खुशी और उत्साह के साथ अपनी अच्छाइयों, सद्कार्यों और सद्व्यवहारों से इस दुनिया को आभास दें कि ईश्वर मानव के करीब है। इसके साथ ही दुःख, दर्दों और चुनौतियों को ईश्वरीय वरदान के रूप देखें, धैर्यवान बनें और अंत तक ईश्वर का भक्त बने रहें तो हम निश्चय ही ईश्वर की नज़र में धनी हैं। और ऐसे व्यक्तियों को दुनियावी या बाहरी पुरस्कार की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उन्हें ईश्वरीय खुशी प्राप्त है और यही है जीवन का असल धन।

वर्ष ‘स’ का सतरहवाँ रविवार

उत्पत्ति ग्रन्थ 18 : 20-32
कलोसियों के नाम पत्र 2 : 12-14
सन्त लूकस 11 : 1-13

जस्टिन तिर्की,ये.स.

मारकुस की कहानी
मित्रो, आज मैं आप लोगों एक वृद्ध की कहानी बताता हूँ उसका नाम था मारकुस। मारकुस जब बूढ़ा हो चला तब वह गाँव चला गया और वही अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहा करता था। परिवार के सदस्यों ने उन्हें जंगल से लकड़ी लाने की ज़िम्मेदारी दी। वह रोज़ जंगल जाता, जलावन की लकड़ी जमा करता, उसे एक रस्सी से बाँधता और अपने कंधे पर ढ़ोकर उसे घर लाता था। चूँकि वह बूढ़ा हो चला था इसलिए जब भी लकड़ी का भारी बोझ अपने कंधे में उठाता तो एक प्रार्थना किया करता था। वह कहता था, ‘हे प्रभु, कृपा करके अपना दूत भेज दीजिये ताकि वह यहाँ आये और मुझे इस दुनिया से उठा ले। मारकुस ऐसी प्रार्थना करता रहा पर ईश्वर ने उसकी प्रार्थना कभी भी नहीं सुनी। वह प्रार्थना करता रहा– न कभी दूत उतरा न व्यक्ति की प्रार्थना रुकी। एक दिन की बात है मारकुस लकड़ी लाने गया था। और दिनों की तरह ही उसने लकड़ी जमा की और उठाने का प्रयास करने लगा। जब वह लकड़ी नहीं उठा पाया तो उसने भगवान से वही प्रार्थना दुहरायी, – ‘हे प्रभु कृपा करके अपना दूत भेज दीजिये ताकि वह मुझे इस दुनिया से उठा ले’। और उस दिन स्वर्ग से दूत उतर आया और उस बूढ़े के समक्ष खड़ा हो गया और कहा, “महाशय आपकी प्रार्थना सुनी गयी है। मुझे भगवान ने आपके पास भेजा है कहिये क्या सेवा करुँ आपकी।” मारकुस भौंचक रह गया। वह दूत को देखता ही रह गया। दूत ने कहा कि मैं आपकी आज्ञा का इन्तज़ार कर रहा हूँ। आज्ञा दीजिये मैं क्या करुँ। मारकुस ने तुरन्त कर कहा, “अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो इस लक़ड़ी की गठरी को मेरे घर पहुँचा दीजिये।” यह सुनना था कि स्वर्गदूत उस बूढ़े मारकुस की आँखों से ओझल हो गया।

मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन विधि पंचाँग के वर्ष ‘स’ के 17वें रविवार के लिये प्रस्तावित आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहें हैं। मित्रो, सुना आपने उस बूढ़े मारकुस ने क्या कहा दूत को? कहाँ गयी उसकी वो प्रार्थना जिसमें वह ईश्वर को एक दूत भेजने के बारे में कहा करता था? खुद को ऊपर लिये जाने की प्रार्थनाएं और कामना किया करता था। क्या हुई उसकी प्रार्थना को? क्या वह वास्तव में प्रार्थना करता का या सिर्फ बुदबुदाता था जिसका कोई अर्थ नहीं था। प्रार्थना क्या है? क्या हम प्रार्थना करते हैं? क्या हम भी सिर्फ़ माँगा करते हैं? क्या हम भी माँग करके निराश होते हैं? क्या हम भी सोचते है कि हमें प्रार्थना करनी नहीं आती? ख़ैर घबराइये नहीं। प्रभु हमारी मदद के लिये हमारे पास आ रहे हैं।

संत लूकस 11, 1-13
1) एक दिन ईसा किसी स्थान पर प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना समाप्त होने पर उनके एक शिष्य ने उन से कहा, ”प्रभु! हमें प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखाया”।
2) ईसा ने उन से कहा, ”इस प्रकार प्रार्थना किया करोः पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये। तेरा राज्य आये।
3) हमें प्रतिदिन हमारा दैनिक आहार दिया कर।
4) हमारे पाप क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने सब अपराधियों को क्षमा करते हैं और हमें परीक्षा में न डाल।”
5) फिर ईसा ने उन से कहा, ”मान लो कि तुम में कोई आधी रात को अपने किसी मित्र के पास जा कर कहे, ‘दोस्त, मुझे तीन रोटियाँ उधार दो,
6) क्योंकि मेरा एक मित्र सफ़र मेरे यहाँ पहुँचा है और उसे खिलाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है’
7) और वह भीतर से उत्तर दे, ‘मुझे तंग न करो। अब तो द्वार बन्द हो चुका है। मेरे बाल-बच्चे और मैं, हम सब बिस्तर पर हैं। मैं उठ कर तुम को नहीं दे सकता।’
8) मैं तुम से कहता हूँ-वह मित्रता के नाते भले ही उठ कर उसे कुछ न दे, किन्तु उसके आग्रह के कारण वह उठेगा और उसकी आवश्यकता पूरी कर देगा।
9) ”मैं तुम से कहता हूँ-माँगो और तुम्हें दिया जायेगा; ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगा; खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जायेगा।
10) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता है; जो ढूँढ़ता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है।
11) ”यदि तुम्हारा पुत्र तुम से रोटी माँगे, तो तुम में ऐसा कौन है, जो उसे पत्थर देगा? अथवा मछली माँगे, तो मछली के बदले उसे साँप देगा?
12) अथवा अण्डा माँगे, तो उसे बिच्छू देगा?
13) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें’ देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?”

प्रार्थना का अंतर
मित्रो, मेरा विश्वास है कि आपने प्रभु के वचनों को ध्यान से पढ़ा और इसके द्वारा आपको और आपके परिवार के सब सदस्यों को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं। तो मित्रो, अपने देखा ने प्रभु की सिखायी प्रार्थना और हमारी प्रार्थना में क्या अन्तर हैं। हमारी प्रार्थनाओं में कुछ माँगे होतीं हैं कुछ दर्द होते हैं कुछ शिकायत होती है और कभी कुछ आश्चर्य तो कभी कुछ खीज़। खीज़ इसलिये कि ईश्वर क्यों हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं दे रहे हैं। श्रोताओ ख़ैर जो भी हो। सबसे बड़ी बता तो यह है कि हमने प्रार्थना करना नहीं छोड़ा है। कम-से-कम ऐसे समय में जब हम तकलीफ़ों से गुज़र रहे हैं या विपत्तियों से घिर गये हैं। ऐसे समय में हम लम्बी प्रार्थनाएं न भी करते हों तो कम से कम हम यदि भगवान का नाम लेते तो हमारी अवश्य ही सुनता है। मैंने कई लोगों से यह कहते सुना है ‘ओ गॉड, ‘हे राम’ ‘हे भगवान ‘देवा हो देवा’ आदि, आदि। मैंने तो कई लोगों को भगवान को धन्यवाद देते हुए भी सुना है। जब कभी उनकी इच्छा पूरी होती है तो वे गिरजा, गुरुद्वारा, मंदिर या मस्ज़िद जाते हैं और धन्यवाद की प्रार्थना खुद चढ़ाते हैं पंड़ित पुजारी को चढ़ाने का आग्रह कर डालते हैं। मित्रो, अगर हम अपनी प्रार्थनाओं और भगवान से अपने रिश्ते पर ग़ौर करें तो हम पाते हैं हमारा भगवान के साथ जो संबंध है वह तो एक सौदेबाज़ी के समान है। जब-जब हमें उनकी ज़रूरत पड़ी हम उनके दरबार में आ गये और उनका नाम लिया और यही है हमारा प्रार्थनामय जीवन।

पिता संबोधन
मित्रो, अगर हम प्रभु की सिखायी हुई प्रार्थना पर ज़रा ग़ौर करें तो हमें अवश्य ही कुछ प्रेरणायें मिलेंगी। येसु की सिखायी प्रार्थना के दो भाग हैं। पहले भाग में येसु अपने पिता ईश्वर से व्यक्तिगत रिश्ता कायम करते हैं। ज़रा ध्यान से सुनिये येसु ईश्वर को पिता कह कर पुकार रहे हैं। गौरतलब है कि येसु ईश्वर को हमारे पिता कहते हैं। ईश्वर का किसी व्यक्ति के साथ कितना ही घनिष्ट संबंध क्यों न हो पर वे सबके पिता है, सबके सृष्टिकर्ता है, सबों के पालनहार हैं।
मित्रो, इस एक वाक्यांश से ही प्रभु ने दो मधुर रिश्ते कायम कर लिये हैं। पहला कि उन्होंने ईश्वर को सबों का ‘पिता’कहा और दूसरा इसके द्वारा पूरी मानव जाति से भी उनका संबंध भाई-बहनों का हो गया। वास्तव में भगवान को पिता कह कर संबोधित करना येसु के ज़माने के लिये एक क्रांतिकारी पहल थी। किसी ने ईश्वर को इतने व्यक्तिगत और इतनी आत्मीयता से नहीं पुकारा था। उस युग के लोगों ने ईश्वर को जिन नामों से संबोधित किया था यह दिखाता है कि ईश्वर उनसे बहुत दूर हैं, ईश्वर अति पवित्र हैं ईश्वर अति महान् हैं और मानव उससे दूर और कमजोर है।

प्रभु की प्राथमिकताएं
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात येसु की प्रार्थना में स्पष्ट दिखाई देती है वह यह कि येसु की प्राथमिकताओं और आम लोगों की प्राथमिकताओं में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। येसु की हार्दिक इच्छा है कि ईश्वर का नाम पवित्र माना जाये। येसु चाहते हैं कि सभी कोई ईश्वर को अपने जीवन में उचित और सर्वोच्च स्थान दें। इसका अर्थ है कि सब लोग ईश्वर के बारे में जानने का प्रयास करें उसकी अच्छाइयों को अपने जीवन में देखें और सदा ही उन्हें अपने जीवन में पहला स्थान देना।

प्रार्थना में ईश्वर की इच्छा
येसु की प्रार्थना के पहले भाग में प्रभु येसु ने एक बात पर बल दिया है वह है ईश्वर की इच्छा पूरी हो। येसु चाहते हैं कि ईश्वर की इच्छा सदा पूरी हो। यहाँ पर मुझे एक बात ने प्रभावित किया है कि येसु की प्रार्थना यह नहीं है कि उनके जीवन में दुःख न आये। उनकी प्रार्थना यह भी नहीं है कि उन्हें सब कुछ मिले उसका स्वप्न पूरा हो। पर येसु की इच्छा है कि पिता ईश्वर की ईच्छा पूरी हो अर्थात् उनके जीवन की सब घटनाओं में वे ईश्वरीय इच्छा को देख सकें। वे ईश्वरीय इच्छा को समझ सकें। वे यह जान सकें कि हर घटना से प्रभु कुछ विशेष संदेश देना चाहते हैं। इतना ही नहीं हर घटना को देखते और स्वीकार करते हुए भले और अच्छे कार्य करते रहें।

प्रभु का निवेदन
मित्रो, हमने येसु की सिखायी प्रार्थना के पहले भाग पर मनन-चिन्तन किया है। दूसरे भाग में येसु ने चार निवेदनों को ईश्वर को चढ़ाया है। उनका पहला निवेदन है भोजन के बारे में। प्रभु चाहते हैं कि हमें शारीरिक और आध्यात्मिक आहार मिले। दूसरे निवेदन में येसु ईश्वर से यही माँग कर रहे हैं कि वे उनके मानवीय कमज़ोरियों को माफ कर दें ताकि व्यक्ति बार-बार गलतियों के शिकार होकर जीने का उत्साह न खो दें। येसु की तीसरी प्रार्थना है कि ईश्वर परीक्षा की घड़ी में उन्हें विवेक प्रदान करें ताकि वह सदा ईश्वर को पहचान सके। और चौथी और अंतिम प्रार्थना में येसु पिता परमेश्वर से यही माँग रहे हैं कि वे ईश्वर सदा पहचाने और उसकी इच्छा के अनुसार ही निर्णय ले सकें।

प्रार्थना और हमारा रिश्ता
मित्रो, आज प्रभु हम सबों को आमंत्रित कर रहे हैं ताकि हम प्रार्थना के द्वारा अपने संबंध अपने ईश्वर से मजबूत कर सकें। और इस प्रकार हमारी प्रार्थनायें सिर्फ माँगों और निवेदनों का थोथा पुलिन्दा न बन जाये बल्कि एक पावन अटूट रिश्ता बन जाये। यह एक ऐसा रिश्ता बने जो इस आधार पर टिका न रहे कि मुझे क्या मिलता है लेकिन इस नींव पर हो कि मैं प्रभु के लिये क्या दे पाता हूँ। मैं उनके लिये क्या दुःख उठा पाता हूँ मैं ख़ुद को ईश्वर के लिये कितना योग्य बना पाता हूँ और अपनी अच्छाइयों से अड़ोस-पड़ोस के लोगों को अच्छा, भला और आशावान बनने में कितना योगदान दे पाता हूँ। अगर हमने ऐसी प्रार्थना सीख ली तो हम भगवान और अपने पड़ोसियों के बहुत करीब होंगे और ईश्वर का राज्य इस धरा पर आने को भला कौन रोक पायेगा !

वर्ष ‘स’ का सोलहवाँ रविवार

उत्पति ग्रंथ 18, 1-10,

कलोसियों के नाम पत्र 1, 24-28

संत लूकस 10, 38-42

जस्टिन तिर्की,ये.स.

दूतों का महासम्मेलन

मित्रो, आपलोगों को आज मैं एक महासम्मेलन के बारे में बताता हूँ। इस सम्मेलन में सिर्फ दूतों और संतों को आमंत्रित किया गया था। और इस सभा के आयोजक थे दूतों के महादूत गाब्रिएल। जब सभी दूत उपस्थित हो गये थे। महादूत गाब्रिएल ने सभी दूतों का स्वागत करते हुए कहा दूतों एवं सतों मुझे खुशी है कि आप लोग इतनी संख्या में यहाँ उपस्थित हैं। बिना देरी के मैं आप लोगों को सभा बुलाने के मकसद के बार में बताना चाहता हूं। मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि हमारे सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर को आराम की आवश्यकता है। वे थक गये हैं। आप आश्चर्य चकित है। विज्ञान की प्रगति के साथ हमारे पिता परमेश्वर के कार्य अत्यधिक बढ़ गये हैं। आजकल के लोग सिर्फ़ प्रार्थना नहीं करते पर वे चाहते हैं कि जल्द से जल्द उनकी समस्याओं का समाधान हो जायें। अतः वे भगवान के पास अपने निवेदन भेजने के लिये अत्याधुनिक उपायों का सहारा लेते हैं। वैसे मुझे एक ओर खुशी है कि लोग ईश्वर से अपना संबंध मजबूत कर रहे हैं पर ईश्वर को कुछ आराम चाहिये। आप सोच रहे होंगे कि आख़िर मैं क्या बोलना चाहता हूँ।

बात सरल है लोग आजकल बहुत धर्मी हो गये हैं। वे हर संभव भगवान से जुड़े रहने का प्रयास कर रहें है। वे ईश्वर से समर्पक करने के लिये घर के फोन का उपयोग कर रहे हैं मोबाइल फोन का उपयोग कर रहें और भगवान से कह रहे हैं कि प्रभु हमारी समस्या का समाधान करा दीज़िये। कोई ईमेल भेज रहा है, तो कोई फैक्स। कभी कोई चंगाई के लिये प्रार्थना कर रहा है तो कोई भगवान से क्षमा की याचना कर रहा है। कोई परीक्षा में पास होने के लिये प्रार्थना कर रहा है तो कोई अच्छी नौकरी पाने के लिये मालायें जप रहा है। कोई बाढ़ से बचने के लिये प्रार्थना कर रहा है तो कोई गरमी से राहत पाने के लिये पानी की कामना कर रहा है। कुछ लोग शांति के लिये प्रार्थनाएं कर रहे हैं तो कुछ आनन्द पाने के लिये। ख़ैर जो भी हो प्रार्थनाएं तो हो रही हैं। यह हम सबों के लिये खुशी की बात है पर इससे एक बड़ी समस्या खड़ी हो गयी है। सभी दूतों ने गाब्रिएल की ओर आँखें उठा कर देखा। गाब्रिएल ने कहा कि उपाय बताइये ताकि ईश्वर के लिये आराम का कोई रास्ता निकाला जा सके। एक दूत ने उठकर कहा कि अगर आप मेरी माने तो एक छोटा-सा घर हम आकाश में बनवा दें ताकि वहाँ कोई नहीं पहुँच सके। इतना कहना था कि एक दूसरे दूत ने उठ कर कहा कि शायद आपको मालूम नहीं मानव ने इतनी प्रगति कर ली है कि वह हवाई जहाज से उड़कर वहाँ भी पहुँच जायेगा और भगवान आराम नहीं कर पायेंगे। तब एक दूसरे दूत ने उठकर कहा कि अगर आप पिता ईश्वर को आराम देना चाहते हैं तो मेरी मानिये चलिये हम एक घर पानी के अंदर बनवा देते हैं जहाँ वे लोगों की पहुँच से दूर होंगे और उन्हें पूर्ण आराम मिल पायेगा। इस उपाय को सुन कर कई दूतों के चेहरे में प्रसन्नता की झलक दिखाई पड़ी पर तुरन्त यह काफुर हो गयी। एक दूत ने उठ कर कहा कि शायद आप इन दिनों टी.वी. में डिस्कवरी चैनल नहीं देखते हैं। आज मनुष्य ने पानी के अंदर जाने का उपाय भी कर लिया है। इसके बाद गाब्रिएल दूत ने कहा कि कुछ उपाय बताइये कि ईश्वर को कैसे आराम करने का समय दिया जाये। तब एक युवा दूत ने उठकर कहा कि मेरे पास एक ‘आइडिया’ है अगर आपको अच्छा लगे तो मैं बताऊँ। सबों ने उत्सुकतापूर्वक उसकी ओर देखा और कहा ज़रूर बताइये। तब उस जवान दूत ने कहा चलिये हम भगवान के एक घर बनवाते हैं जो मानव के दिल में होगा। मनुष्य को अपने दिल के अन्दर झाँकने को भी फुर्सत नहीं है चूँकि वह बहुत व्यस्त है। मेरा विश्वास है उन्हें आराम मिल जायेगा। और तब से भगवान हम सबों के दिल में बसे हुए हैं। और सच माने तो वे हमारा इन्तज़ार करते रहते हैं कि हम उनके पास आयें पर हमारे पास समय नहीं है। हम ‘बिजी’ हैं। हम व्यस्त हैं, न मार्था की तरह।

सुसमचार पाठ, लूकस 10, 38-42

38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ”प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।”

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ”मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।”

दिल में झाँकिये

मित्रो, ज़रा अपने दिल को झाँक कर देखिये ना। आपका मन कहाँ हैं? धन-दौलत कमाने में, इज़्जत की रक्षा में, बाहरी साज-सज्ज़ा में, दिवा-स्वप्न में, ख़ुद को बड़ा समझने में, खाने-पीने में, दूसरों की अहितकर चर्चा में। यदि ऐसा है तो प्रभु की वाणी पर ग़ौर कीज़िये। आज के सुसमाचार में प्रभु ने मार्था से कहा। मार्था, मार्था तुम बहुत-सी बातों के बारे में चिन्तित रहती हो पर केवल एक बात आवश्यक है। मरियम ने सबसे उत्तम भाग चुन लिया है। और वह उससे नहीं लिया जायेगा।

कर्म या प्रार्थना

मित्रो, आपको याद होगा जब प्रभु मरिया और मार्था के घर गये थे तब मार्था प्रभु के लिये भोजन बनाने में व्यस्त थी और मरियम प्रभु का वचन सुनने में मस्त थी। प्रभु के वचनों से कभी ऐसा आभास होता है कि प्रभु मरियम की तरफ़दारी कर रहे हैं अर्थात् वे कह रहे हैं कि कर्म से ज़्यादा अच्छा है पूजा या प्रार्थना। शारीरिक भोजन से अच्छा है आध्यात्मिक भोजन। वास्तव में मित्रो, मनुष्य को दोनों की बराबर की ज़रूरत है। किसी एक के बिना मानव जीवन अधूरा या अपूर्ण रह जायेगा।

ईश्वर की याद

मित्रो, कई बार यह प्रश्न मेरे मन में गूँजता है तो फिर प्रभु क्यों आज कह रहे हैं कि मरिया ने उत्तम भाग चुना है। मित्रो, येसु जानते हैं कि मनुष्य कमजोर होता है और वह बहुत ही आसानी से सांसारिक चिंताओं से घिर जाता है और भगवान को भूल जाता है। इसीलिये येसु आज हमें याद दिलाते हुए कह रहे हैं कि तुम अगर अन्य बातों की चिंता में लगे रहोगे तो वे सभी व्यर्थ सिद्ध होंगे अगर तुम ईश्वर को भूल जाओगे। मुझे कबीर की वे दो पंक्तियाँ याद आती हैं जिसमें उन्होंने कहा था

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।

गर सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।।

कबीर का कहना है कि लोग मतलबी होते हैं। दुःख के समय में भगवान की याद करते है और सुख के समय में ईश्वर को भूल जाते हैं। अगर मनुष्य दुःख के साथ-साथ सुख के समय भी ईश्वर की याद करता रहे तो उसके जीवन से दुःख ही समाप्त हो जायेगा।

कर्म और पूजा का संतुलन

मित्रो, प्रभु येसु हमें आज आमंत्रित कर रहे हैं कि हम अपने जीवन को संतुलित करें। काम और प्रार्थना को अपने जीवन में बराबर का स्थान दें। दुःख में प्रभु को याद करें और सुख में भी उन्हें न भूलें। हम अपने शरीर की चिंता तो करें ही अपनी आत्मा को सिंगारना न भूले। हम मार्था की तरह प्रभु के लिये खाना ज़रूर तैयार करें प्रभु मरिया के समान हम प्रभु के चरणों में बैठने के लिये अपना समय अवश्य निकालें ताकि हमें अनन्त जीवन का भोजन मिल सके।

प्रार्थना बिना कर्म दिशाहीन

मित्रो, मैं बता दूँ कि बिना काम के प्रार्थना अर्थहीन है और बिना प्रार्थना के काम दिशाहीन। अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन संतुलित हो अगर हम चाहते हैं कि हम जीवन की सच्ची शांति और आनन्द मिले तो हम कामों में व्यस्त तो अवश्य रहें पर उस दूत की बातों को न भूलें जिसने कहा था कि ईश्वर हमारे दिल में रहते है। दिल में बैठे येसु हमसे आशा करते हैं कि कम-से-कम हम उनके लिये भी समय निकालें उनसे बातें करें उनसे उँजियाला पायें और तब मेरा विश्वास है कि हम जीवन के सुखों को तो दूसरों को बाँट पायेंगे ही दुःख के क्षणों में भी ईश्वरीय इच्छा को पहचान पायेंगे और यही तो है जीवन का संतुलन। यही तो है प्रार्थना और कर्म का सामंजस्य। यही तो है सच्ची खुशी का रहस्य।

 

 वर्ष ‘स’ का पंद्रहवाँ रविवार

विधि विवरण ग्रंथ 30, 114
कोलोसियों के नाम 1, 15-20
संत लूकस 10, 25-37

जस्टिन तिर्की, ये.स.

‘प्रेम’ विषय पर सेमिनार
मित्रो, आज आपको एक सेमिनार में घटी घटना के बारे में बताता हूँ। झारखंड राज्य के गुमला धर्मप्रांत में युवाओं के सेमिनार में मुझे आमंत्रित किया गया था। सेमिनार में मुझे जिस विषय पर व्क्तय देना था वो था – प्रेम। सेमिनार में प्रतिभागियों की संख्या करीब 50 थी। सब युवा 18 से 25 साल के थे। जब मुझे बोलने के लिये आमंत्रित किया गया तो मेरे वक्तव्य की शुरूआत मैंने एक सवाल से की। मैंने उनसे पूछा – मेरे युवा दोस्तो इससे पहले कि मैं कुछ बोलूँ आप मुझे बताइये कि ‘प्रेम करना’ और ‘ पसंद करना’ में क्या अंतर है। यदि आप इन दोनों के अंतर को मुझे बता देंगे तो मैं समझ जाउँगा कि आपने प्रेम के सही अर्थ को समझ लिया है। सब चुप थे। मैंने उनकी चुप्पी देख फिर से प्रश्न दोहराते हुए कहा ‘प्रेम करना’ और ‘पसंद करना’ में क्या अंतर है ?
एक लड़की प्रतिमा था ने कहा प्रेम गहरा होता है और पसन्द छिछला। एक दूसरे लड़के रोशन ने जवाब दिया प्रेम हम एक से कर सकते हैं हज़ारों से नहीं पर पसन्द है बहुतों को कर सकते हैं। इसके बाद मंजु की बारी आयी। उसने कहा – फादर प्रेम में बलिदान की आवश्यकता होती है पर पसंद तो सिर्फ़ पसंद है, लगाव है और उसमें समर्पण नहीं होता।

प्रेम गहरा, पसन्द छिछला
मैंने युवाओं की तारीफ़ की और कहा आप सबों का जवाब सही है और मुझे खुशी है कि आप सबों में इतनी क्षमता है कि आप जीवन के गंभीर विषयों का जवाब इतनी सूक्षमता से दे सकते हैं। आप सबों ने मेरा काम आसान कर दिया है। मैं अपनी बात समाप्त कर ही रहा था कि एक युवती ने मुझसे सवाल किया कि फादर आप भी बतायें कि ‘प्रेम करने’ और ‘पसन्द करने’ का क्या अन्तर है। मैंने उनसे कहा कि जब हम किसी चीज़ को पसन्द करते हैं तो हम कहते हैं कि मैं इस घर को पसंद करता हूँ क्योंकि यह सुन्दर है। मैं इस घड़ी को पसंद करता है क्योंकि यह मेरे जन्मदिन का उपहार है। मैं इस उस व्यक्ति को प्यार करता हूँ क्योंकि उसकी मुस्कान अच्छी है, आदि आदि आदि…। जब हम किसी को या किसी चीज़ को पसंद करते हैं तो उसके लिये कोई अर्थपूर्ण कारण देते हैं। अब आप सुनिये प्रेम का अर्थ जब हम किसी व्यक्ति या चीज़ को प्यार करते हैं तो हम कहते हैं मैं इस घर को प्यार करता हूँ भले ही यह बहुत सुन्दर नहीं है। मैं इस घड़ी को प्यार करता हूँ भले ही यह पुरानी है। मैं अपनी माँ को प्यार करता हूँ भले ही वह बूढ़ी हो चली है, मैं अपनी पढ़ाई, नौकरी या कर्त्तव्य को प्यार करता हूँ भले ही यह कठिन लगे, इत्यादि..।
हम प्यार करते हैं भले ही उस वह व्यक्ति या चीज़ सर्वगुण सम्पन्न नहीं है। यदि ऐसा होता बहुत अच्छी बात होती पर ऐसा नहीं है फिर मैं उसे प्यार करता हूँ।

मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अन्तर्गत पूजन विधि पंचाँग के वर्ष ‘स’ के 15वें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहें हैं। आज प्रभु हमें प्रेम का अर्थ समझा रहे हैं।

संत लूकस 10, 25-37
25) किसी दिन एक शास्त्री आया और ईसा की परीक्षा करने के लिए उसने यह पूछा, ”गुरूवर! अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”
26) ईसा ने उस से कहा, ”संहिता में क्या लिखा है?” तुम उस में क्या पढ़ते हो?”
27) उसने उत्तर दिया, ”अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो”। 28) ईसा ने उस से कहा, ”तुमने ठीक उत्तर दिया। यही करो और तुम जीवन प्राप्त करोगे।” 29) इस पर उसने अपने प्रश्न की सार्थकता दिखलाने के लिए ईसा से कहा, ”लेकिन मेरा पड़ोसी कौन है?” 30) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ”एक मनुष्य येरुसालेम से येरीख़ो जा रहा था और वह डाकुओं के हाथों पड़ गया। उन्होंने उसे लूट लिया, घायल किया और अधमरा छोड़ कर चले गये। 31) संयोग से एक याजक उसी राह से जा रहा था और उसे देख कर कतरा कर चला गया।
32) इसी प्रकार वहाँ एक लेवी आया और उसे देख कर वह भी कतरा कर चला गया।
33) इसके बाद वहाँ एक समारी यात्री आया और उसे देख कर उस को तरस हो आया। 34) वह उसके पास गया और उसने उसके घावों पर तेल और अंगूरी डाल कर पट्टी बाँधी। तब वह उसे अपनी ही सवारी पर बैठा कर एक सराय ले गया और उसने उसकी सेवा शुश्रूषा की।
35) दूसरे दिन उसने दो दीनार निकाल कर मालिक को दिये और उस से कहा, ‘आप इसकी सेवा-शुश्रूषा करें। यदि कुछ और ख़र्च हो जाये, तो मैं लौटते समय आप को चुका दूँगा।’ 36) तुम्हारी राय में उन तीनों में कौन डाकुओं के हाथों पड़े उस मनुष्य का पड़ोसी निकला?” 37) उसने उत्तर दिया, ”वही जिसने उस पर दया की”। ईसा बोले, ”जाओ, तुम भी ऐसा करो”।

मित्रो, मेरा पूरा विश्वास है कि आपने प्रभु के दिव्य वचनों को ध्यान से पढ़ा है और प्रभु के वचनों को जानने से आपको और आपके परिवार के सदस्यों को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं। मित्रो, आज प्रभु के जिन दिव्य बातों ने मुझे प्रभावित किया वे हैं अपने प्रभु परमेश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

प्यार ज़रूरी है
प्रभु का वचन कितना सटीक है हमारे लिये। प्रभु जानते हैं कि मनुष्य प्यार के बग़ैर जीवित नहीं रह सकता है। वह भी प्रेम करना चाहता है पर कई बार वह सिर्फ़ मुख से या सिर्फ़ सोच से प्यार करता है। और इस प्रकार उसका प्रेम सच्चा नहीं हो पाता है। जो लोगो प्रभु को हृदय से प्यार करते हैं वे अपने प्रेम को अपने मन दिल और कार्यों से दिखाते हैं। अर्थात् वे प्रभु की बतायी बातों को सोचते हैं उसके बताये अनुसार वे दूसरों के साथ व्यवहार करते हैं और वे सबों का भला चाहते हैं।

प्यार का दावा
मित्रो, हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि दुनिया का हर व्यक्ति प्रेम को जानने और उसका अनुभव करने का दावा करता है। यहाँ तक कि बच्चे भी कहा करते हैं कि कौन उन्हें प्यार करता है और कौन उन्हें प्यार नहीं करता है। कई बार हमने बच्चों को यह कहते सुना होगा कि मुझे अंकल प्यार करते हैं या मुझे मम्मी प्यार करती है। कई बार बच्चे यह भी कहा करते हैं कि अंकल सिर्फ बोलते हैं करते नहीं है।

प्यार की अभिव्यक्ति
मित्रो, आज प्रभु हमें प्रेम के बारे में तीन बातें बतला रहे हैं। वे कह रहे हैं कि यदि हम कहते हैं कि हम ईश्वर को प्यार करते हैं तो हमें चाहिये कि हम उसे मुख से प्यार करें अर्थात् हम सदा ईश्वरीय कृपाओं का बखान अपने मुख से करें। हम अपने मीठे वचनों से ईश्वर को प्यार करें। दूसरी बात जिस पर प्रभु बल देते हैं वह है कि हम येसु को अपनी सारी शक्ति से प्यार करें। इसका अर्थ है ईश्वर ने हमें जो कुछ भी क्षमताएं या योग्यताएं दीं हैं हम उसका उपयोग अच्छे और भले कार्यों में लगायें। और तीसरी बात जिसपर प्रभु ने बल दिया है वह है कि हम अपनी बुद्धि का उपयोग भी ईश्वर को प्रेम करने में लगायें। ईश्वर ने हमें यह बात इसलिये बतायी है क्योंकि कई बार हम अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं और अपनी तर्क शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उन प्रलोभनों में फँस जाते हैं जो हमें ईश्वरीय प्रेम से दूर कर देता है।

प्यार की पूर्णता
इतना ही नहीं मित्रो, प्रेम के बारे में येसु ने जब भी चर्चा की उन्होंने दो बातों की ओर हमारा ध्यान खींचा है। ईश्वरीय प्रेम और पड़ोसी प्रेम। जब हम ईश्वर को प्यार करते हैं तो यह प्रेम हमारे पड़ोसी प्रेम में दिखाई पड़े। मित्रो, बोलचाल की भाषा में पड़ोसी वही है जो पड़ोस में या आस-पास निवास करता हो। पर ख्रीस्तीयों के लिये पड़ोसी वही व्यक्ति है जो न सिर्फ़ पास रहता हो जो न केवल दूसरे से बात-चीत करता हो पर पड़ोसी वही है जो दूसरे को अच्छा, भला और सच्चा इंसान बनने में मदद देता हो। उस भले समारी ने यही तो किया उसने उस घायल व्यक्ति के लिए वह सब कुछ किया जिसकी उसे ज़रूरत थी उस पर दया दिखाया, उसे शारीरिक मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से मदद दी ताकि वह पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त कर सके। उस समारी ने घायल की इसलिये सेवा नहीं कि क्योंकि उसके पास बहुत पैसा था बहुत समय था या उसे ऐसा करने से बदले में कुछ मजदूरी प्राप्त होती। उसने ऐसा इसीलिये किया क्यों उसने घायल व्यक्ति में येसु को पहचाना और उसने उस व्यक्ति से प्रेम किया और प्रेम दिखाया।

प्यार करें, केवल पसन्द नहीं
आज प्रभु का आमंत्रण है कि हम अच्छा कार्य कठिन किन्तु भलें कार्य, अपने कर्त्तव्य के काम, सेवा कार्य या क्षमा इसलिये करें क्योंकि यही ईश्वरीय प्रेम हैं सच्चा प्यार है और अनन्त जीवन और अनन्त सुख पाने का रहस्य। आज हम खुद से पूछें क्या हम प्रभु को प्यार करते हैं या सिर्फ़ उसे पसंद करते हैं?

वर्ष ‘स’ का चौदहवाँ रविवार

नबी इसायस 66, 10-14
गलातियों ने नाम 6,14-18
संत लूकस 10,1-12,17-20

मेरी की कहानी
मित्रो, आज आप लोगों को एक धर्मी महिला के बारे में कहानी बताता हूँ। उसका नाम था मेरी। वह रोज गिरजा जाती थी और पल्ली पुरोहित के प्रवचन को ध्यान से सुनती थी। पल्ली पुरोहित बार-बार कहा करते थे कि सभी ख्रीस्तीयों को ईश्वर ने बुलाया है ताकि वे येसु के मिशन को आगे बढ़ा सकें। महिला को पुरोहित की बातें बहुत अच्छी लगती थी। मेरी चाहती थी कि वह भी मिशनरी बनें। पर उसकी एक बड़ी समस्या थी। उसके नौ बच्चे थे। वह चाह कर भी अपने घर का काम पूरा करने के बाद मिशनरी कार्यों के लिये समय नहीं निकाल पाती थी। एक दिन वह गिरजा गयी थी। पल्ली पुरोहित ने अपने उपदेश में सुसमाचार प्रचार पर जोरदार प्रवचन दिये। जब महिला ने उपदेश सुना तो उसका दिल मिशनरी बनने की प्रेरणा से ओतप्रोत हो गया। गिरजा समाप्त होने के बाद वह पुरोहित के पास गयी और उन्हें उनके अच्छे उपदेश के लिये धन्यवाद दिया। इसके बाद उसने पुरोहित से कहा फादर, “मैं आपके उपदेश से बहुत प्रभावित हूँ और एक मिशनरी बनना चाहती हूँ।” फादर बहुत प्रसन्न हुए और बोले यह बड़े ही खुशी की बात है। तब मेरी ने कहा कि फादर वो तो ठीक है पर मेरे सामने एक बहुत बड़ी बाधा है। मेरे नौ बच्चे हैं। उनका क्या होगा। तब पुरोहित ने कहा कि यह तो ईश्वर की ओर से आपको और ही विशेष वरदान है। न केवल ईश्वर ने आपको मिशनरी बनने की प्रेरणा दी है पर उन्होंने आपको पूरी फौज़ ही दे डाला है। आप अपने परिवार के साथ ही सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं। मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन विधि पंचांग के वर्ष के 14वें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन चिन्तन कर रहें हैं। प्रभु चाहते हैं कि पूरी दुनिया को ईशवचन सुनाया जाये। वे चाहते हैं कि विश्व का हर व्यक्ति अच्छी बातों को सुने प्रभु के वचन को सुने और ईश्वरीय सुख और शांति को प्राप्त करे।

संत लूकस 10,1-20
इसके बाद प्रभु ने अन्य बहत्तर शिष्य नियुक्त किये और जिस-जिस नगर और गाँव में वे स्वयं जाने वाले थे, वहाँ दो-दो करके उन्हें अपने आगे भेजा।
2) उन्होंने उन से कहा, ”फ़सल तो बहुत है, परन्तु मज’दूर थोड़े हैं; इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मजदूरों को भेजे।
3) जाओ, मैं तुम्हें भेड़ियों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूँ।
4) तुम न थैली, न झोली और न जूते ले जाओ और रास्तें में किसी को नमस्कार मत करो।
5) जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ‘इस घर को शान्ति!’
6) यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।
7) उसी घर में ठहरे रहो और उनके पास जो हो, वही खाओ-पियो; क्योंकि मज’दूर को मज’दूरी का अधिकार है। घर पर घर बदलते न रहो।
8) जिस नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो जो कुछ तुम्हें परोसा जाये, वही खा लो।
9) वहाँ के रोगियों को चंगा करो और उन से कहो, ‘ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है’।
10) परन्तु यदि किसी नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत नहीं करते, तो वहाँ के बाज़ारों में जा कर कहो,
11) ‘अपने पैरों में लगी तुम्हारे नगर की धूल तक हम तुम्हारे सामने झाड़ देते हैं। तब भी यह जान लो कि ईश्वर का राज्य आ गया है।’
12) मैं तुम से यह कहता हूँ-न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।
17) बहत्तर शिष्य सानन्द लौटे और बोले, ”प्रभु! आपके नाम के कारण अपदूत भी हमारे अधीन होते हैं”।

18) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ”मैंने शैतान को बिजली की तरह स्वर्ग से गिरते देखा।
19) मैंने तुम्हें साँपों, बिच्छुओं और बैरी की सारी शक्ति को कुचलने का सामर्थ्य दिया है। कुछ भी तुम्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा।
20) लेकिन, इसलिए आनन्दित न हो कि अपदूत तुम्हारे अधीन हैं, बल्कि इसलिए आनन्दित हो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं।”

सुसमाचार प्रचार
आज के सुसमाचार में तीन बातों ने मुझे प्रभावित किया है। पहली बात तो यह है कि येसु अपने बहत्तर चेलों को दुनिया में भेजते हैं ताकि वे दुनिया को सुसमाचार सुनायें। दूसरी बात येसु अपने चेलों को बताते हैं कि उनका संदेश शांति का संदेश हो। और तीसरी बात कि येसु के चेले अपने मिशन के बाद लौटे और वे प्रसन्न थे।

सबका दायित्व
मित्रो, कई बार हम सोचते हैं कि सुसमाचार प्रचार का कार्य सिर्फ़ पुरोहितों का है या धर्मसंघियों या धर्मप्रचारकों का है। आज येसु का वचन साफ है कि वे चाहते हैं प्रत्येक ईसाई ईशवचन का प्रचारक बने। वे चाहते हैं कि विश्व में कोई भी व्यक्ति ऐसा न हो जो ईश्वरीय वचन से अछूते रहें। 72 शिष्यों को दुनिया में भेजने का यही अर्थ है। येसु के समय में इस बात पर विश्वास किया जाता था कि पूरी दुनिया में 72 देश हैं और इसीलिये येसु दो-दो शिष्यों को दुनिया में भेजते हैं ताकि ईश्वर के वचन का प्रचार हो सके। लोगों को सुसमाचार सुनाया जा सके। अपने शिष्यों को भेजते हुए येसु ने यह भी कहा फ़सल तो बहुत है पर बनिहार थोड़े हैं। यह साफ़ दिखाता है कि येसु के कार्य को करने के लिये बहुतों की आवश्यकता है। श्रोताओ किसी गुरुजी ने कहा था कि यदि हम शिक्षा ग्रहण करते हैं और उसे दूसरों को नहीं बता पाते हैं तब इसका अर्थ हुआ कि हम पूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाये हैं। येसु के सुसमाचार के संबंध में भी यही बात लागू होती है कि यदि येसु के वचनों ने हमारे दिल को छुआ है और हम उसे दूसरों को नहीं बता सकते, येसु के वचनों से दूसरों के जीवन को प्रभावित नहीं कर सकते तो हमने येसु की शिक्षा को पूरी तरह से नहीं समझा है। यह भी सत्य है कि जो व्यक्ति येसु की शिक्षा को सुनता है उससे ग्रहण करता है वह येसु का चेला या शिष्य है अतः प्रत्येक ख्रीस्तीय का यह परम कर्त्तव्य है कि वह ईश्वरीय शिक्षा दूसरों को दे। प्रत्येक ख्रीस्तीय का यह परम कर्त्तव्य है कि वह लोगों को उन बातों को बताये जिसने उसके जीवन को बदल डाला है।

येसु का स्पष्ट निर्देश
मित्रो, दूसरी बात जिसने मुझे प्रभावित किया है वह येसु का निर्देशन है। अगर आपने गौर किया होगा तो पाया होगा कि येसु अपने चेलों को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि उन्हें क्या करना है। येसु चाहते हैं कि उसके शिष्य तीन बातों पर विशेष ध्यान दें तो उनका मिशन सफल हो जायेगा। पहली बात कि वे ईश्वर पर भरोसा करें। इसका अर्थ है जब वे सुसमाचार के प्रचार पर निकलें तब ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हुए लोगों के पास जायें। दुनिया सुख-संपति और आराम उनके मिशन को न रोके। उनका मिशन हो शांति के प्रचारक बनना। वे लोगों को उन बातों को बतायें जिनसे लोगों के दिल में शांति मिलती हो। उनके पास पहुँचते ही उन्हें शांति प्रदान करें। लोगों को मानसिक शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से चंगाई प्रदान करें। अगर हम येसु के निर्देश पर ध्यान दें तो हम पायेंगे कि येसु हमारा ध्यान इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि उनके अच्छे सच्चे और दिव्य वचनों को दुनिया के सब लोग नहीं भी सुनेंगे। येसु यह भी बतलाते हैं कि उनका विरोध भी हो सकता है। मित्रो, हम सबों का व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि लोग सत्य को देखने हेतु तैयार नहीं होते हैं। वे इसे सुनने को भी तैयार नहीं होते हैं सत्य के साथ-साथ सत्य के प्रचारकों का भी अंत करने के लिये तैयार हो जाते हैं। ऐसे समय में येसु का कहना कि वे सुसमाचार का प्रचार करते जायें निश्चय ही चुनौती भरा काम है। संक्षेप में कहा जाये तो येसु कह रहे हैं कि सुसमाचार का प्रचार जारी रहे चाहे मार्ग में कोई भी बाधा क्यों न आयें।

आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता
मित्रो, तीसरी और अंतिम बात जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह है येसु के चेलों का अपने मिशन के बाद वापस आना। जब वे वापस लौटे तो उनका अनुभव आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता थी। वे प्रसन्न थे। उन्होंने अनुभव किया कि उन्होंने येसु के भले कार्य को आगे बढ़ाया है।
दिव्य वचन का प्रचार आज प्रभु का आमंत्रण है कि हम उनके दिव्य वचनों का प्रचार करें और हरदम उस पल्ली पुरोहित की बातों को याद रखें कि जिन बातों को हम अपने मार्ग में बाधा समझते हैं हो सकता है वही हमारे लिये ईश्वर के राज्य प्रचार हेतु उपयोगी हथियार बन जायेंगे। उस पल्ली पुरोहित ने नौ पुत्रों की माँ को कहा कि ये पुत्र बाधा नहीं हैं ईश्वर ने आपको तो धर्मप्रचारकों की एक सेना ही प्रदान कर दिया है। मेरा विश्वास है कि ईश्वरीय कार्य करना, ईश्वरीय बातें बताना और शांति के लिये कार्य करने का आनन्द अद्वितीय आध्यात्मिक और अलौकिक है।

वर्ष ‘स’ का तेरहवाँ रविवार

राजाओं का पहला ग्रंथ 19,16, 19-21
गलातियों के नाम पत्र 5,1, 13-18
लूकस 9,51-62

जस्टिन तिर्की, ये.स.

गुरु और शिष्य
मित्रो, आज आपलोगों को एक बाईबल गुरु और उसके शिष्यों के बारे में बताता हूँ। एक छोटे से शहर में एक प्रशिक्षण केन्द्र था जहाँ बाईबल के बारे में जानकारी दी जाती थी। पढ़ाई समाप्त होने के बाद गुरुजी सब विद्यार्थियों को एक ही सवाल किया करते थे। उनका सवाल होता था कि वे बाईबल कि पढ़ाई के बाद वे क्या करेंगे। बाईबल क्लास करने वाले अधिकतर विद्यार्थी कहा कहते थे वे बाईबल प्रशिक्षण के बाद मिशनरी बनने बनना चाहते हैं। और तब गुरुजी उन्हें शुभकामनाओं के साथ विदा किया करते थे। एक बार बाईबल प्रशिक्षण के लिये तीन विद्यार्थी गुरुजी के पास आये। कुछ महीनों तक उन्हें बाईबल के बारे में शिक्षा देने के बाद गुरुजी ने उन्हें भी यही सवाल किया कि वे अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं। तब तीनों ने कहा कि वे सुसमाचार के प्रचार हेतु मिशनरी बनना चाहते हैं। तीनों ने कहा कि वे उन देशों में जायेंगे जहाँ मुसलमानों की संख्या ज़्यादा है। तब गुरुजी ने पूछा कि वे क्यों मिशनरी बनना चाहते हैं। पहले ने कहा कि यह येसु की आज्ञा है कि उसके सुसमाचार का प्रचार विश्व के कोने-कोने में किया जाये। दूसरे ने कहा कि वह येसु के वचनों को सुनाना चाहता है क्योंकि येसु का वचन दुनिया में शांति और मेल-मिलाप करा सकता है। और फिर तीसरे ने कहा कि मैं अपनी भूमि से दूर होकर सुसमाचार का प्रचार करना चाहता हूँ क्योंकि येसु ने कहा है कि अपने लोगों के बीच नबी का आदर नहीं होता है। तीनों प्रशिक्षुओं के उत्तर सुनने के बाद गुरु ने कहा कि आप सबों के उत्तर सही हैं। आपकी इच्छा की भी मैं तारीफ़ करता हूँ पर एक बात याद रखना सुसमाचार प्रचार करने हुते यह जरूरी है कि तुम येसु को व्यक्तिगत रूप से प्यार करो। तब ही तुम उसके सुसमाचार का प्रचार कर पाओगे। येसु के मूल्यों का प्रचार करना आसान नहीं है न ही येसु की शिक्षा के अनुसार जीना आसान है और अगर येसु के प्रचारक के दिल में येसु के लिए व्यक्तिगत या सच्चा प्रेम नहीं है तो वह अपना मिशन कदापि पूरा नहीं कर पायेगा।

मित्रो, रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन-विधि पंचांग के 13वें रविवार हेतु प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं। आज प्रभु हमें शिष्य होने की तकलीफ़ के बारे में सावधान करना चाहते हैं। वे यह भी बताना चाहते हैं कि अगर हमारा मन-दिल मजबूत न हो तो हम येसु के चेले बनने के लायक नहीं हो पायेंगे।

संत लूकस 9,51-62
51) अपने स्वर्गारोहण का समय निकट आने पर ईसा ने येरुसालेम जाने का निश्चय किया
52) और सन्देश देने वालों को अपने आगे भेजा। वे चले गये और उन्होंने ईसा के रहने का प्रबन्ध करने समारियों के एक गाँव में प्रवेश किया।
53) लोगों ने ईसा का स्वागत करने से इनकार किया, क्योंकि वे येरुसालेम जा रहे थे।
54) उनके शिष्य याकूब और योहन यह सुन कर बोल उठे, ”प्रभु! आप चाहें, तो हम यह कह दें कि आकाश से आग बरसे और उन्हें भस्म कर दे”।
55) पर ईसा ने मुड़ कर उन्हें डाँटा
56) और वे दूसरी बस्ती चले गये।
57) ईसा अपने शिष्यों के साथ यात्रा कर रहे थे कि रास्ते में ही किसी ने उन से कहा, ”आप जहाँ कहीं भी जायेंगे, मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगा”।
58) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ”लोमड़ियों की अपनी माँदें हैं और आकाश के पक्षियों के अपने घोंसले, परन्तु मानव पुत्र के लिए सिर रखने को भी अपनी जगह नहीं है”।
59) उन्होंने किसी दूसरे से कहा, ”मेरे पीछे चले आओ”। परन्तु उसने उत्तर दिया, ”प्रभु! मुझे पहले अपने पिता को दफ़नाने के लिए जाने दीजिए”।
60) ईसा ने उस से कहा, ”मुरदों को अपने मुरदे दफनाने दो। तुम जा कर ईश्वर के राज्य का प्रचार करो।”
61) फिर कोई दूसरा बोला, ”प्रभु! मैं आपका अनुसरण करूँगा, परन्तु मुझे अपने घर वालों से विदा लेने दीजिए”।
62) ईसा ने उस से कहा, ”हल की मूठ पकड़ने के बाद जो मुड़ कर पीछे देखता है, वह ईश्वर के राज्य के योग्य नहीं”।

बुद्धि काफ़ी नहीं
मित्रो, क्या आपने ध्यान दिया कि प्रभु आज हमें बताते हैं कि येसु के शिष्य बनने का प्रशिक्षण प्राप्त करना आसान है पर येसु के मिशन को आगे बढ़ाने के लिये व्यक्ति को मानवीय बुद्धि से बढ़कर दिल में येसु के प्रति असीम प्रेम होने की आवश्यकता है। आज प्रभु तीन तरह की बाधाओं की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं। वे कहते हैं यदि हम चाहते हैं कि ईश्वर के लिये कार्य करें तो हमें यह मानकर चलना होगा कि येसु में ही ही हमारी सुरक्षा है। येस ही हमारे सब कुछ हैं। हमें येसु के वचन पर ही अपने जीवन को ढालना होगा और येसु के पीछे-पीछे ही सदा चलना होगा। हमारे पास कोई दुनियावी सुरक्षा नहीं होगी। आपने सुना होगा येसु पहले युवक को जो येसु के पीछे चलने का वादा करता है कहते हैं – लोमड़ियों की अपनी मांदें हैं और पक्षियों के लिये घोंसले पर मानव पुत्र के लिये सिर रखने को भी जगह नहीं है। यह यही दिखाता है कि येसु के चेलों के पास न घर है, न धन और न ही सम्पति। बस जो कुछ है वह है ईश्वर का वचन और उसकी इच्छा पूरी करना।

येसु सबसे पहले
मित्रो, येसु एक दूसरी चुनौती जिसकी ओर हमारा ध्यान खींचते हैं वह यह है कि यदि हम चाहते हैं कि येसु की सेवा करना चाहते हैं तो हमारी प्राथमिकता येसु ही होना चाहिए। यदि हम अपने जीवन में अपने मानवीय संबंधों, घर के सदस्यों, मित्रों, भावनाओं और दुनियावी आनन्द को अधिक महत्त्व देते हैं तो भी येसु के सच्चे सेवक और प्रचारक नहीं बन सकते हैं। कई बार हमने लोगों को यह कहते सुना होगा कि वे व्यस्त हैं और उनके पास बिल्कुल ही समय नहीं है। प्रश्न उठता है आखिर वे किन कार्यों में व्यस्त हैं। अगर उनकी व्यस्तता सिर्फ़ अपने लौकिक जीवन की सुख-सुविधाओं को ब़टोरने और जीवन को आरामदायक बनाने में लगे हैं, उनके पास ईश्वर के लिये समय नहीं है तो ऐसे लोग भी ईश्वर के वचनों का प्रचार नहीं कर सकते हैं। येसु कहते हैं कि अगर हमारा मानवीय संबंध येसु के कार्य करने से रोकता है तो हम येसु के सच्चे चेले नहीं बन सकते हैं। येसु दूसरे नवयुवक को कहते हैं कि मुर्दों को अपने मुर्दे दफनाने दो। श्रोताओ येसु हमारे सामने एक और चुनौती रखते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति दुनिया के रीति-रिवाज़ों और जीवन में आने वाली छोटी-बड़ी बाधाओं के सामने झुक जाता है या उन्हें ईश्वर के काम से अधिक महत्त्व देता है तो उसका सच्चा सेवक नहीं बन सकता है। मित्रो, यह सच है कि हम मानव होने के नाते मानवीय स्वभाव में रोटी, कपड़ा, मकान, मानवीय रिश्ते, भावनायें और औपचारिकताएँ हमारे जीवन में महत्व रखती हैं जो स्वाभाविक भी है पर इन्हें अपने जीवन में हावी होने देना आध्यात्मिक प्रगति के लिये हितकर नहीं हैं।

येसु में पूर्ण आनन्द
आज प्रभु हमें बड़े सरल किंतु वजनदार शब्दों में कह रहे हैं यदि आप आध्यात्मिक आनन्द या जीवन का पूर्ण आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं तो तीन बातों में अपने आपको परिपक्व बनाइये। आपकी प्राथमिकताएँ सदा येसु के लिये हों, आप येसु को चुनें। येसु के साथ आपका संबंध घनिष्ठ हो। और तीसरा येसु के कार्य को पूरा करने के रास्ते में आपकी भावनायें, पारिवारिक लगाव या रिश्ता कमजोर न करे। अगर हम इन तीन बातों में खरे उतरे तो हम निश्चय ही येसु के सच्चे मित्र चेले और पुत्र-पुत्रियाँ कहलायेंगे। यह मार्ग काँटों का मार्ग है चुनौतियों से भरा पर आनन्द से परिपूर्ण भी।

वर्ष ‘स’ बारहवाँ रविवार

जकारिया 12, 10-11
गलातियों के नाम पत्र 3, 26-29
लूकस 9, 18-14

जस्टिन तिर्की, ये.स.

राजू की कहानी
मित्रो, आज एक व्यक्ति के बारे बताता हूँ जिसका नाम था राजू । वह पढ़ा-लिखा बिल्कुल नहीं था। उसके सब ही मित्र ईसाई थे। ईसाइयों की संगति में रहते-रहते उसने निर्णय लिया कि वह भी ईसाई बन जायेगा। उसके मित्रों ने उसे अपने पल्ली पुरोहित के पास ले आया। पल्ली पुरोहित ने राजू से पूछा क्या तुम ईसाई बनना चाहते हो। राजू ने कहा कि वह ईसाई बनना चाहता है। तब पल्ली पुरोहित ने उससे धर्म के बारे में पूछ-ताछ की। उन्होंने कहा कि येसु के बारे में जानते हो। राजू ने कहा कि उसने ईसा मसीह का नाम सुना है। पल्ली पुरोहित ने कहा क्या तुम्हें मालूम है कि येसु का जन्म कहाँ हुआ था। राजू ने कहा उसे नहीं मालूम। तब फादर ने कहा कि क्या तुम्हें मालूम है येसु के कितने चेले थे। राजू ने कहा मालूम नहीं। फादर आश्चर्य से राजू को देख रहा था पर राजू को किसी प्रकार की चिन्ता नहीं थी। वह बिल्कुल ही शांत भाव से कहता जा रहा था कि उसे मालूम नहीं। तब फादर ने परेशान होते हुए एक अंतिम सवाल किया और कहा क्या तुम्हें मालूम है येसु की मृत्यु कब कैसे और कहाँ हुई। राजू ने कहा कि उसे मालूम नहीं है। तब फादर ने उँचे स्वर से डाँटते हुए कहा कि तो फिर तुम क्या जानते हो येसु के बारे में। पैंसीस वर्षीय राजू ने कहा फादर बस मैं इतना जानता हूँ कि येसु का नाम सुनने के पहले मैं एक पियक्कड़ था अपनी पत्नी को पीटता था अपने बच्चों की चिन्ता नहीं किया करता था पर अब मैंने पीना छोड़ दिया है अपने पत्नी और बच्चों की चिन्ता करता हूँ उन्हें प्यार करता हूँ और सबों के साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव करता हूँ। यह सब येसु मसीह के कारण ही हुआ वही मेरा मसीहा है उसी ने मुझे और मेरे परिवार की रक्षा की है।
मित्रो, रविवरीय आराधना विधि-चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन-विधि पंचांग के वर्ष ‘स’ के 12वें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिंतन कर रहें हैं। आज प्रभु हममें से प्रत्येक जन को सवाल पूछ रहें हैं कि वे कौन हैं हमारे लिये।

लूकस 9, 18-14
18) ईसा किसी दिन एकान्त में प्रार्थना कर रहे थे और उनके शिष्य उनके साथ थे। ईसा ने उन से पूछा, ”मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?”
19) उन्होंने उत्तर दिया, ”योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहतें- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं-प्राचीन नबियों में से कोई पुनर्जीवित हो गया है”।
20) ईसा ने उन से कहा, ”और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?” पेत्रुस ने उत्तर दिया, ”ईश्वर के मसीह”।
21) उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि वे यह बात किसी को भी नहीं बतायें।
22) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, ”मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा”।
23) इसके बाद ईसा ने सबों से कहा, ”जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले;
24) क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देता है, और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

येसु का सवाल
मित्रो, मेरा पूरा विश्वास है कि आपने प्रभु के दिव्य वचनों को ध्यान से सुना है और प्रभु के वचनों को सुनने से आपको और आपके परिवार को आध्यात्मिक लाभ हुए हैं। आज के सुसमाचार में जिन बातों ने मेरे प्रभावित किया है वह है येसु की उत्सुकता अपने बारे में जानने की। येसु आज अपने शिष्यों से यह सवाल करते हैं कि लोग उन्हें क्या कहते हैं। मित्रो, यह एक छोटा-सा सवाल है पर यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। यह इसलिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यही सवाल प्रभु येसु आज प्रत्येक व्यक्ति को कर रहे हैं। वे कह हैं कि हम उन्हें अपना जवाब दें। इस जवाब से यह बात साफ हो जायेगी की हम येसु के बारे में क्या जानते हैं और हम अपने जीवन में येसु को कैसा और कितना बड़ा स्थान देते हैं। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब देने से हमें मालूम हो जायेगा कि हमारे जीवन में येसु का क्या स्थान है। हमारे जीवन में हम भगवान को कितना महत्त्व देते हैं। लोगों ने येसु के बारे में विभिन्न बातें कहीं गयीं हैं कई बातें लिखीं गयीं हैं कई तरह से उसका बखान किया गया है। कई लोगों ने येसु को गुरु कहा क्योंकि वे लोगों को शिक्षा दिया करते थे। कई लोगों ने येसु को चंगाई करने वाला व्यक्ति चमत्कार करने वाला दिव्य पुरुष तो लोगों की सदैव चिन्ता करने वाला भला चरवाहा माना है। कई लोगों ने तो येसु को एक सच्चा मित्र माना है जो अपने मित्रों के लिये अपने प्राण दे देता है। कई विद्वानों ने तो येसु को एक सच्ची राह कहा है जीवन का सर्वोच्च सत्य कहा तो कई लोगों ने उन्हें जीवन की मंजिल कहा है।

येसु मसीह हैं
मित्रो, अगर आपने आज के सुसमाचार के पदों पर गौर किया होगा तो पाया होगा कि संत पीटर ने भी येसु के सवाल के जवाब देते हुए कहा कि प्रभु आप ईश्वर के मसीह है। मित्रो, पीटर भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं था पर उन्होंने येसु को एक मसीहा के रूप में देखा और उसका व्यक्तिगत अनुभव किया था। मित्रो, मेरा तो विश्वास है येसु के बारे में बुद्धि प्राप्त करने से बढ़कर है येसु का अपने जीवन में व्यक्तिगत अनुभव करना और उसी आधार पर येसु से अपना संबंध मजबूत करना और अपना संपूर्ण जीवन उसी के लिये सौंप देना।

क्या किया येसु ने मेरे लिये?
मित्रो, आज हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन तब होगा जब हम इस बात का व्यक्तिगत जवाब दे पायेंगे कि येसु ने हमारे लिये क्या किया है। कई बार मैं खुद अपने जीवन की घटनाओं पर चिंतन करता हूँ तो पाता हूँ येसु ने कई बार मुझे बचाया है कई बार उन्होंने मेरी रक्षा की है कई बार उन्होंने मेरा मार्ग दर्शन किया है। मेरे जीवन का साथ उन्होंने कभी नहीं छोड़ा है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि येसु मुझे बचाता है, मेरी रक्षा करता है, प्रभु मेरा मसीहा है। मित्रो, मुझे इस बात का गहरा आभास तब होता है जब मैं प्रभु के उस सवाल के जवाब खोजने के लिये समय निकालता हूँ कि येसु मेरे लिये कौन है। जब-जब भी मैं येसु और मेरे संबंध के बारे में मनन-चिन्तन करता हूँ मेरी आत्मा से यही एक आवाज़ आती है कि प्रभु मेरा रक्षक है प्रभु मेरा मुक्तिदाता है प्रभु मेरा बचानेहारा है मसीहा है।

दूसरे नहीं, मैं क्या कहता हूँ?
मित्रो, प्रभु आज हमें आमंत्रित कर रहे हैं इस सवाल पर विचार करने के लिये। वे हमसे कह रहे हैं कि हम सिर्फ़ बात से प्रसन्न न हों कि दूसरे येसु के बारे में क्या कहते हैं पर इस सवाल का सही जवाब अपने दिल से खोज़े कि येसु मेरे लिये कौन हैं। मेरा तो विश्वास है कि अगर हम अपने दिल में यह प्रश्न का जवाब पा लिये तो हमारा जीवन ही बदल जायेगा। हमारी प्राथमिकतायें बदल जायेंगी, हमारे बात करने का तौर तरीका और हमारी आदतें ही बदल जायेंगी। इतना ही नहीं श्रोताओ प्रभु ने अपने बारे में सवाल करने के साथ ही एक और बात पर बल दिया है वह कि जब हम अपना रिश्ता प्रभु से निश्चित कर लेते हैं तो हम उसके साथ चलने के लिये स्वतः ही निकल पड़ेंगे। हम उसके दिखाये गये मार्ग पर चलने लगेंगे। येसु ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि उसका मार्ग क्रूस का मार्ग है। अर्थात् यदि हम चाहते हैं कि हम येसु के समान जीयें यदि हम उनके जैसा ही जीवन पर विजय प्राप्त करें तो हमें अपना क्रूस उठा कर उनके पीछे चलना होगा। अपना क्रूस उठाकर चलना अर्थात् अपनी इच्छाओं का बलिदान करना और येसु की इच्छा के अनुसार चलना होगा। हमें उन पदों पर कदम रखना होगा जिधर से होकर येसु ने जीवन पाप और मृत्यु पर विजय पायी है। येसु के मार्ग में चलने के लिये हमें चाहिये कि हम येसु को व्यक्तिगत रूप से जानें हम प्रेम दया क्षमा और सेवा का रास्ता अपनायें और सदा उसके पीछे-पीछे चलें।

बलिदान का मार्ग, शांति का मार्ग
मित्रो, हम यह भी याद रखें कि येसु के मार्ग दुःखों का मार्ग है बलिदान का मार्ग है अपने जीवन को खोने का मार्ग है पर इसमें चलने की खुशी है वह आंतरिक है अनंत हैं और पूर्ण खुशी देनेवाली है ठीक उस राजू की खुशी की तरह जिसे येसु के बारे में मालूम नहीं था। उसे बस इतना मालूम था कि येसु ने उसके जीवन को बदल दिया है।
आज प्रभु का खुला निमंत्रण है कि हम प्रार्थना के लिये समय निकालें येसु कौन हैं इस पर मनन करें हम पायेंगे कि येसु में वो ताकत है जिससे हम एक ऐसा आनन्द पा सकते हैं जिसका अंत नहीं होता वो संतुष्टि पा सकते हैं जो दुनियावी संतोष से बढ़कर है और हम वह आशा प्राप्त कर सकते हैं जो सब कुछ खोने पर भी भले अच्छे और सच्चे कार्य करने को प्रेरित करती रहती है।

वर्ष ‘स’ का ग्यारहवाँ रविवार

2 सामूएल 12, 7-10,13
गलातियों के नाम पत्र 2, 16, 19-21
संत लूकस 7, 38; 8,3

जस्टिन तिर्की, ये.स.

पियेतरो बन्दीनेली की कहानी
आज आपलोगों को एक कहानी बताता हूँ एक प्रसिद्ध चित्रकार के बार में उसका नाम था लिओ नार्दो दी विंची। जब वह चित्र बनाता तो उसकी चित्रकला की तारीफ़ चारों ओर होती थी। यह वहीं लिओनार्दो दी विंची था जिसने येसु का अपने चेलों के साथ किये गये अंतिम भोजन की तस्वीर बनायी थी। उस चित्र को येसु की अंतिम ब्यारी की तस्वीर के नाम से जाती है। आज भी प्रायः सब ही ईसाई घरों में लोग इस तस्वीर को रखना उचित समझते हैं। इस चित्र में येसु के बारहों चेलों का चित्र है जो येसु के साथ अंतिम भोजन कर रहे हैं। बताया जाता है कि जब विश्व विख्यात चित्रकार लिओनार्दो दी विंची इस अंतिम ब्यारी की तस्वीर बना रहे तो उसे इसे बनाने में बहुत दिन लगे। सबसे पहले तो उन्हें येसु के चित्र बनाने के लिये एक व्यक्ति की तलाश थी जिसकी शक्ल येसु से मिलती-जुलती हो। येसु के चेहरे की हमशक्ल खोजते-खोजते आखिर उन्होंने एक व्यक्ति को पाया जिसका चेहरा येसु के समान दिखाई पड़ता था। उसके चेहरे में वही चमक थी जैसा कि येसु में हुआ करता था। उस युवक का नाम था पियेतरो बन्दीनेली। लिओनार्दो दी विंची ने येसु की तस्वीर बना ली तो उसे बहुत संतुष्टि हुई क्योंकि वह चित्र बिल्कुल येसु के समान दिखाई पड़ता था। इसके बाद भी लियोनार्दो दि विंची की परेशानी दूर नहीं हुई। येसु के चित्र को बनाने के बाद वह यूदस की तस्वीर बनाने के लिये भी एक मॉडल की तलाश करने लगा। एक ऐसा व्यक्ति जिसका चरित्र यूदस से मिलता-जुलता हो। लिओनार्दो दि विंची ने सभी चेलों की तस्वीर बना ली थी पर यूदस की तस्वीर अब तक पूरी नहीं हुई थी। वह बहुत प्रयास किया पर उसे यूदस के समान दिखने वाला न मिला। काफी अर्से बीत गये। एक दिन रोम की गलियों में उसने एक भिखमंगे को देखा और उसे लगा कि यूदस के चरित्र को यही भिखमंगा की तस्वीर बनाने से दिखाया जा सकता है।उसने उस भिखारी का चित्र बनाया। और जब उसने चित्र को देखा तो उसे बहुत संतुष्टि हुई। जब वह भिखारी विदा ले रहा था तब लियोनार्दो दि विंची ने औपचारिकतावश पूछा कि मैंने तुम्हारा नाम भी नहीं पूछा। क्या नाम है तुम्हारा ? तब उस भिखारी ने कहा कि महाशय आप भूल गये मैं पियेतरो बन्दीनेली ही हूँ। जब आपने येसु की तस्वीर बनाया था तब मैं ही आपका मॉडल था। और यूदस की तस्वीर बनाते समय भी मैं ही आपका मॉडल बना। हमारा जीवन ईशमय होता है तो हम येसु के सदृश्य दिखाई देते हैं पर जब हम पाप और हमारी मानवीय कमजोरियों के कारण ईश्वर के पथ से भटक जाते हैं तो हमारा सबकुछ पापमय हो जाता है। हमारा चेहरा बदल जाता है और हमारा रूप यूदस के समान हो जाता है जिसने येसु के साथ विश्वासघात किया था।

पश्चात्ताप
मित्रो,रविवारीय आराधना विधि चिंतन कार्यक्रम के अन्तर्गत पूजन-विधि पंचांग के वर्ष ‘स’ के ग्यारहवें रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर हम मनन-चिन्तन कर रहे हैं। आज प्रभु इस बात को बताना चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति संत बनने के लिये बुलाया गया है पर यदि वह ईश्वरीय मार्ग से भटक जाता है तो सचमुच उसके मुखमंडल की आभा चली जाती है। उस व्यक्ति के अंदर तो बेचैनी होती ही है उसका बाह्य रूप भी कुरूप हो जाता है। प्रभु यह भी बताना चाहते हैं कि पाप के कारण चेहरे और दिल में जो कुरूपता आ जाती है उसका इलाज़ है पश्चात्ताप।

संत लूकस 7, 38-8,3
37) नगर की एक पापिनी स्त्री को यह पता चला कि ईसा फ़रीसी के यहाँ भोजन कर रहे हैं। वह संगमरमर के पात्र में इत्र ले कर आयी
38) और रोती हुई ईसा के चरणों के पास खड़ी हो गयी। उसके आँसू उनके चरण भिगोने लगे, इसलिए उसने उन्हें अपने केशों से पोंछ लिया और उनके चरणो को चूम-चूम कर उन पर इत्र लगाया।
39) जिस फ़रीसी ने ईसा को निमन्त्रण दिया था, उसने यह देख कर मन-ही-मन कहा, ”यदि वह आदमी नबी होता, तो जरूर जाना जाता कि जो स्त्री इसे छू रही है, वह कौन और कैसी है-वह तो पापिनी है”।
40) इस पर ईसा ने उस से कहा, ”सिमोन, मुझे तुम से कुछ कहना है”। उसने उत्तर दिया, ”गुरूवर! कहिए”।
41) ”किसी महाजन के दो कर्जदार थे। एक पाँच सौ दीनार का ऋणी था और दूसरा, पचास का।
42) उनके पास कर्ज अदा करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए महाजन ने दोनों को माफ़ कर दिया। उन दोनों में से कौन उसे अधिक प्यार करेगा?”
43) सिमोन ने उत्तर दिया, ”मेरी समझ में तो वही, जिसका अधिक ऋण माफ हुआ”। ईसा ने उस से कहा, ”तुम्हारा निर्णय सही है।”।
44) तब उन्होंने उस स्त्री की ओर मुड़ कर सिमोन से कहा, ”इस स्त्री को देखते हो? मैं तुम्हारे घर आया, तुमने मुझे पैर धोने के लिए पानी नहीं दिया; पर इसने मेरे पैर अपने आँसुओं से धोये और अपने केशों से पोंछे।
45) तुमने मेरा चुम्बन नहीं किया, परन्तु यह जब से भीतर आयी है, मेरे पैर चूमती रही है।
46) तुमने मेरे सिर में तेल नहीं लगाया, पर इसने मेरे पैरों पर इत्र लगाया है।
47) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, इसके बहुत-से पाप क्षमा हो गये हैं, क्योंकि इसने बहुत प्यार दिखाया है। पर जिसे कम क्षमा किया गया, वह कम प्यार दिखाता है।”
48) तब ईसा ने उस स्त्री से कहा, ”तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं”।
49) साथ भोजन करने वाले मन-ही-मन कहने लगे, ”यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?”
50) पर ईसा ने उस स्त्री से कहा, ”तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ।”

आज के सुसमाचार में जिस बात ने मुझे प्रभावित किया वह है उस पापिनी स्त्री का पश्चात्ताप। उस स्त्री ने येसु के साथ जो कुछ किया उससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट दिखाई पड़ती है कि उसने पूरे दिल से पश्चात्ताप किया था। कहा भी जाता है कि पाप में भटक जाना मानवीय कमजोरी है पर ईश्वर हमारे पापों की गिनती कभी नहीं करते हैं। वे सदा ही हमारी अच्छाई को लेखा-जोखा रखते हैं। जब कभी हम येसु की ओर मुढ़ते हैं येसु हम गले से लगा लेते हैं।

पश्चात्ताप की भावना
मित्रो, आपने आज के सुसमाचार में गौर किया होगा कि येसु उस धनी सिमोन की तारीफ़ नहीं करते बल्कि उस पापिनी महिला के पश्चत्ताप की भावना की तारीफ़ करते हैं। आज सिमोन ने येसु को अपने यहाँ निमंत्रण दिया था यह दिखाता है कि वे समाज के सम्मानित व्यक्ति थे और उनके पास इतनी शक्ति और धन दौलत थी कि वह येसु को अपने पास मेहमान बुला लिया था। फिर भी आज की घटना में यह बात भी साफ़ हो जाती है कि येसु धन-दौलत और बाहरी तड़क-भड़क से ज़्यादा पसंद हमारे खुले दिल की करते हैं। येसु तो इसी लिये आये थे कि लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर की ओर मुढ़ें। मित्रो, आपको याद होगा कि जब येसु ने अपना उपदेश देने का मिशन आरंभ किया था तब उसने लोगों को यह कहते हुए आमंत्रित किया था वे पछतावा करें अर्थात् ईश्वर की ओर मुढ़ें और ईश्वरीय प्रेम, क्षमा और शक्ति प्राप्त करें । और ऐसा करने से ही व्यक्ति ईश्वरीय सुख की प्राप्ति कर सकता है।

ज़्यादा क्षमा ज़्यादा प्रेम
मित्रो, कई बार हम सोचते हैं कि हम ईश्वर के करीब है पर उससे दूर ही रहते हैं। कई बार हम ईश्वर के मंदिर जाते हैं पर हमारा मन-दिल ईश्वर से बहुत दूर रहता है। कई बार हम दूसरों के बारे में सोचते हैं कि वह व्यक्ति पापी है या दिखावा कर रहा है। पर सच बात तो होती है कि हम दिल से येसु के करीब नहीं होते हैं। आज ही सुसमाचार पाठ पर अगर हम ध्यान से पढ़ें तो हम पायेंगे कि सिमोन जो कि एक फरीसी था यही सोचने लगा था कि उसने येसु को अपने यहाँ आमंत्रित किया अतः वह येसु के करीब है और वह महिला जो उस घर की नहीं थी येसु के पास आयी यह सोचते हुए कि उसका कोई नहीं है और वह येसु से बहुत दूर है पर येसु ने उस महिला के हर हाव-भाव की सराहना की। येसु ने यह भी कहा कि जिसके ज़्यादा पाप क्षमा हुए वह येसु को ज्य़ादा प्यार करेगा।

स्वीकार करना
मित्रो, बात तो सच है कि जिसने ईश्वरीय प्रेम का ज्यादा अनुभव किया है वह ईश्वर की ओर वापस आयेगा और वह दिल से ईश्वर से क्षमा याचना करेगा और ईश्वर की आशिष पायेगा। मित्रो, कई बार हमारे मन में यह भी सवाल उठता है कि क्या ईश्वर हमें क्षमा प्रदान करेंगे। सच तो यह है कि ईश्वरीय क्षमा की प्राप्ति के लिये हमें चाहिये कि सबसे पहले नम्र बनें और अपने आप को स्वीकार करें अपनी गलती को स्वीकार करें। हम यह मान लें कि हमने गलती की है। पापक्षमा की सबसे पहली सीढ़ी है अपने आपको और अपने पापों को स्वीकार लेना।

दिल की आवाज़ सुनना
मित्रो, इसके बाद दूसरा कदम होना चाहिये अपने मन दिल की आवाज़ को सुनना। पाप के बाद हमारे दिल में ईश्वरीय आवाज़ लगातार हमारा मार्गदर्शन करती है। अगर हम अपने दिल की आवाज़ को सुनते हैं तो निश्वय ही प्रभु की ओर लौटेंगे। मित्रो, सही अर्थ में जैसे ही हम अपने दिल में यह निर्णय कर लेते हैं कि अब हम प्रभु के पास वापस जायेंगे। हमारा पछतावा की प्रक्रिया शुरु हो जाती है। और जब हम अपने येसु के अनुसार जीने के लिये कदम बढ़ाते हैं तो ईश्वर हमें स्वीकार कर लेते हैं और हमें अपनी शक्ति प्रदान करते हैं। ईश्वर की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे मानव को सदा क्षमा दे देते है। ईश्वर हमसे कभी भी बदला नहीं लेते हैं और ईश्वर हमें नया जीवन देते हैं जो हमारे दिल को शांति प्रदान करता है।
आज ईश्वर हमें बुला रहे हैं ताकि हम अपने को स्वीकार करें। नम्र बने ईश्वर की ओर मुढ़े और ईश्वरीय कृपा के हकदार बनें। मानव जीवन की यही बुलाहट है कि वह ईश्वर की ओर लौटे। अपने पड़ोसियों के साथ प्रेम से रहे और यही प्रेम, शांति और क्षमा का रास्ता लोगों को दिखाये।

वर्ष ‘स’ का दसवां रविवार

राजा 17, 17-24
गलातियों के नाम, 1,11-19
संत लूकस 7,11-17

जस्टिन तिर्की,ये.स.

सुषमा की कहानी
मित्रो, आज मैं आप लोगों को एक सात साल की एक लड़की की कहानी बतलाता हूँ जिसका नाम था सुष्मा। सुष्मा बहुत ही होनहार लड़की थी। वह अपने परिवार में पाँच भाइयों की एकलौती बहन थी। उसके सभी भाई क्लास के बाद खेलने निकल जाते थे पर वह अपनी माँ की सहायता करती थी। कई बार उसकी माँ ने उससे कहा कि वह भी खेलने जाये पर वह अपनी माँ की मदद करने में ही आनन्द पाती थी। उसने बचपन से ही इस बात को सीख लिया था कि व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की ज़रूरत होती है। कई बार उसकी माँ ने उसकी तारीफ़ भी की थी कि वह माँ के दुःख सुख को समझती है। सुष्मा न केवल अपनी माँ की मदद करती पर वह पड़ोसियों की मदद के अवसर भी खोजा करती थी। सुष्मा के घर के बगल में एक परिवार था। उस घर माता पिता को वह चाचा-चाची कहकर पुकारती थी। वह परिवार सुखी था पर उनके घर में कोई बच्चे नहीं थे। बहुत विन्ती प्रार्थना और चिकित्सा के बाद उस परिवार में एक शिशु का जन्म हुआ। सब प्रसन्न थे। चाचा-चाची के खुशी का तो ठिकाना ही नहीं। उन्हें बस इस बात का दुःख था कि शिशु जन्म से ही बीमार रहा करता था। सुष्मा को जब भी स्कूल और अपने घर काम से फुर्सत मिलती चाचा-चाची के घर ज़रूर जाता और बच्चे को गोद में घुमाती थी। एक दिन जब वह स्कूल से वापस आयी तो माँ ने सुष्मा को बतलाया की बच्चे की तबीयत बहुत ख़राब हो गयी थी और उसे अस्पताल पहुँचाया गया पर डॉक्टरों के प्रयास के बावजूद बच्चे को नहीं बचाया जा सका। इतना सुनना था कि सुष्मा दौड़ती हुए चाची के घर गयी और घंटो वापस नहीं आयी। जब वह घर लौटी तो माँ ने पूछा कि वह क्या कर रही थी। उसने अपने माँ से कहा कि वह चाची पास बैठी थी। इतनी देर तक क्या करती रही वहाँ पर बच्चे की तो मृत्यु हो गयी है। सुष्मा ने कहा कि वह चाची के पास बैठी रही। चाची को देखती रही। जब चाची बच्चे के बारे में कुछ बताती तो वह चुपचाप सुनती वह जब दुःखी होती तो मैं भी दुःखी होती, वह जब प्रार्थना करती मैं भी करती और जब चाची फिर रोती तो मैं भी रोती थी। मित्रो, दुःख के समय में सबसे बड़ी सहानुभूति होती है व्यक्ति का साथ देना। व्यक्ति को यह आभास देना कि हम उनके साथ हैं, उनके दुःख में शामिल हैं और वे अकेले नहीं हैं। सांत्वना के दो शब्दों और कुछ अन्य मदद से मूल्यवान है व्यक्ति को अपना सामीप्य देना शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक। यही है सहानुभूति का अर्थ। वैसा ही अनुभव करना जैसा कि दूसरा व्यक्ति कर रहा है। मित्रो, हम रविवारीय आराधना विधि चिन्तन कार्यक्रम के अंतर्गत पूजन विधि पंचाँग के वर्ष ‘स’ के दसवें रविवार के प्रस्तावित सुसमाचार के आधार पर मनन-चिन्तन कर रहे हैं।

संत लूकस 7, 11-17
इसके बाद ईसा नाईन नगर गये। उनके साथ उनके शिष्य और एक विशाल जनसमूह भी चल रहा था।
12) जब वे नगर के फाटक के निकट पहुँचे, तो लोग एक मुर्दे को बाहर ले जा रहे थे। वह अपनी माँ का इकलौता बेटा था और वह विधवा थी। नगर के बहुत-से लोग उसके साथ थे।
13) माँ को देख कर प्रभु को उस पर तरस हो आया और उन्होंने उस से कहा, ”मत रोओ”,
14) और पास आ कर उन्होंने अरथी का स्पर्श किया। इस पर ढोने वाले रूक गये। ईसा ने कहा, ”युवक! मैं तुम से कहता हूँ, उठो”।
15) मुर्दा उठ बैठा और बोलने लगा। ईसा ने उसको उसकी माँ को सौंप दिया।
16) सब लोग विस्मित हो गये और यह कहते हुए ईश्वर की महिमा करते रहे, ”हमारे बीच महान् नबी उत्पन्न हुए हैं और ईश्वर ने अपनी प्रजा की सुध ली है”।
17) ईसा के विषय में यह बात सारी यहूदिया और आसपास के समस्त प्रदेश में फैल गयी।

आज के सुसमाचार पाठ में जिस घटना का वर्णन किया गया है इससे एक बात स्पष्ट है कि प्रभु अति संवेदनशील हैं। प्रभु दूसरों के दुःख से दुःखी है। सुसमाचार कहता है कि येसु नाईन की विधवा के एकमात्र पुत्र की मृत्यु से दुःखी है और चाहते हैं कि उसकी मदद करे। येसु को बतलाया गया कि जिसकी मृत्यु हो गयी है वह जवान युवक था और माता विधवा थी। मित्रो आज के सुसमाचार में तीन बातें हैं जिसने मेरे दिल को छूआ है।

दया दिखाना
पहली बात कि येसु को किसी ने नाइन की विधवा को दया दिखाने का आग्रह नहीं किया। येसु पूरी परिस्थिति को देखते ही समझ गये कि महिला विधवा है और उसका बेटा उसकी एकमात्र संतान था और विधवा माँ का एकमात्र सहारा था। येसु हमारी सब ज़रूरतों को जानते हैं। येसु तो चाहते हैं कि वे हमारी मदद करें। वे चाहते हैं कि हमारा जीवन हर तरह से पूर्ण हो। हम दुःख में और सुख दोनों ही पलों में यह अनुभव करें कि येसु हमारे करीब हैं हमारी मदद के लिये तत्पर हैं।

तरस हो आना
दूसरी बात जिसने मेरा ध्यान खींचा वह है कि येसु को तरस हो आया। येसु ने विधवा की पीड़ा को समझ लिया। विधवा के लिये यह एक ऐसा दुःख था एक ऐसा झटका था जिसे वह शब्दों से बखान नहीं कर सकती थी।वह बेसहारा थी बस विलाप कर रही थी। ऐसे समय में उसके जीवन में येसु का आना उसके लिये अलौकिक था। येसु को तरस हो आना इस बात को दिखलाता है कि येसु न केवल लोगों को स्वर्ग राज्य जाने की शिक्षा देने के लिये आये थे पर उन्होने वही किया जो व्यक्ति को पूर्ण बनाता है। व्यक्ति को पूर्ण रूप से मुक्त करता है। इसी लिये येसु खुद ही कदम उठाते हैं और विधवा के पास जाते हैं और कहते हैं रोओ मत। दुःख की घड़ी में कोई व्यक्ति जब हमारा साथ देता है तो इससे बढ़कर और कोई सहारा ही नहीं हो सकता। किसी ने ठीक ही कहा है सच्चा पड़ोसी या मित्र वही है जो वक्त में काम आये। कई बार ऐसा समय आता है कि हम व्यक्ति को न तो कुछ कह सकते हैं न कुछ दे सकते हैं न ही हम उस विकट परिस्थिति से निकाल सकते हैं। ऐसे समय में हमारी उपस्थिति ही व्यक्ति के लिये सर्वोच्च सुख या दिल को संतोष देने वाला होता है। प्रभु येसु ने सारी परिस्थिति को समझते हुए नाइम की विधवा के पास जाने की पहल की और कहा, “मत रोओ” । मित्रो कई बार हमारे जीवन में लोग सीधे रूप से मदद नहीं कर पाते हैं पर वे बस यह आश्वासन देते हैं कि हमारे साथ हैं तो हमारे दुःख कम हो जाते हैं या हम कहें हमें ताकत मिल जाती है जीवन में आगे बढ़ने की। मित्रो आपने इस बात पर भी ग़ौर किया होगा कि प्रभु येसु ने विधवा से कोई सवाल जवाब नहीं किया। उससे नहीं पूछा कि क्या वह विश्वास करतीं हैं कि येसु जीवन दे सकते हैं। जिस व्यक्ति में सहानुभूति की भावना होती हो वह व्यक्ति का परिचय नहीं जानना चाहता। वह नहीं जानना चाहता है कि दुःख में पड़ा व्यक्ति कहाँ से है, उसका उसके साथ किसी प्रकार का कोई रिश्ता है या नहीं। जिस व्यक्ति के दिल में दूसरे व्यक्ति के प्रति स्नेह है तो वह तुरन्त वही करेगा जो उस जरूरतमंद को चाहिये। और येसु ने वही किया।

नया जीवन देना
मित्रो, तीसरी बात जिसने मेरा ध्यान खींचा है वह विधवा के पुत्र को जीवन दान। मित्रो, येसु जब भी हमारे जीवन में आते हैं तो वे कुछ ठोस वरदान लेकर आते हैं। येसु हमें मात्र सलाह नहीं देते, येसु हमारे साथ ऐसा पेश नहीं आते कि वे बस एक मेहमान हैं। येसु तो चाहते हैं कि हम जीवन प्राप्त करें। वे चाहते हैं कि उनके द्वारा होने वाली प्रत्येक घटना से ईश्वर की महिमा प्राप्त हो । और इसीलिए उन्होंने नाइम की विधवा के एकमात्र पुत्र को जीवन दान दिया।

सहानुभूति
मित्रों, आज की पूरी घटना में हम येसु ख्रीस्त में जिस गुण को देख रहे हैं वह है सहानुभूति का गुण अर्थात् दूसरों के साथ एक जैसा अनुभव करना। जब व्यक्ति दुःखी है तो दुःख में शामिल होना और जब व्यक्ति खुशहाल है तो उसमें में शामिल होना। शामिल होने का अर्थ है दूसरे व्यक्ति के साथ बिल्कुल वैसा ही अनुभव करना जैसा वह व्यक्ति कर रहा हो। और उस विशेष परिस्थिति में वह सब कुछ कर देना जिससे व्यक्ति को लगे कि वह अकेला नहीं है। व्यक्ति के जीवन में यह एक अनुपम अनुभव होता है जब उसे यह आभास हो कि वह अकेला नहीं। परिवार के सदस्य उसके साथ हैं लोग उसके साथ हैं और ईश्वर उसके साथ है। मित्रो ऐसे समय में कोई आर्थिक मदद हो तो व्यक्ति को लगता है कि वह जीवन की समस्यायें सुलझ सकतीं है। अगर व्यक्ति को सांत्वना के शब्द कहे जाते हैं तो उसे लगता है कि उसकी दुनिया बड़ी है और अच्छी भी है जहाँ चुनौतियों के बीच जीना आसान हो सकता है। और व्यक्ति जब व्यक्ति को प्रार्थनाओं का आध्यात्मिक सामीप्य मिलता है तो दुःखी व्यक्ति को लगता है ईश्वर उसके साथ है और उसमें जीने की चाहत मजबूत होती है और वह भी भला और अच्छा कार्य करने को प्रेरित होता है।

निःस्वार्थ मदद
मित्रो, आज प्रभु का आमंत्रण है कि हम दुःखियों, गरीबों, ज़रूरतमंदों के साथी बने। अपनी ताकत, क्षमता और बुद्धि से उन बातों को कहें, करें और दिखायें जो व्यक्ति को जीने की प्रेरणा दे, नया जीवन दे जैसा की उस छोटी बालिका सुषमा ने अपनी चाची से किया तब हमारा जीवन संतुष्टि से भर जायेगा, दूसरों का जीवन अर्थपूर्ण हो जायेगा और येसु का इस दुनिया में आने का मतलब पूर्ण हो जायेगी।

वर्ष ‘ब’ पवित्र तृत्व रविवार

विधि विवरण ग्रंथ 4, 32-34, 39-40
रोमियों के नाम 8,14-17
संत मत्ती 28, 14-17

जस्टिन तिर्की,ये.स.

धर्मशिक्षा क्लास की शिक्षा
मित्रो, आज आप लोगों को एक घटना के बारे में बताता हूँ जो एक धर्म क्लास में घटी। मैं सेंट मेरीज स्कूल के आठवें क्लास के छात्रों को धर्मशिक्षा देता था। जब भी मैं धर्मशिक्षा क्लास के लिये जाता तो पाठ आरंभ करने के पूर्व कोई-न-कोई सवाल ज़रूर ही पूछता लेता था। मुझे याद है जून का महीना था सन् उन्नीस सौ तिरानबे की बात है मैंने छात्रों को एक सवाल पूछा । छात्रों ने जो जवाब दिये उसने मुझे धर्म के एक रहस्य के बारे में समझने मददगार सिद्ध हुई। उस दिन मैंने विद्यार्थियों से कहा कि वे कमरे की खिड़कियाँ बन्द करे लें। खिड़कियाँ बन्द करने से जब क्लास में अंधकार छा गया तब मैंने एक मोमबत्ती जलायी और विद्यार्थियों से पूछा वे बतायें कि वे टेबल में क्या देख रहे हैं। एक छात्र ने कहा कि वह टेबल में एक सफेद रंग की छोटी मोमबत्ती देख रहा है। दूसरे ने कहा कि वह छोटी मोमबत्ती की ज्वाला को देख रहा है। तीसरे ने कहा कि वह मोमबत्ती के लौ के लाल औऱ पीले रंग से प्रभावित है। एक अन्य छात्र ने कहा कि वह छोटी मोमबत्ती के जलते हुए लौ को देख रहा है और उसके प्रकाश का अनुभव कर रहा है। एक अन्य छात्र ने कहा कि वह भी छोटी मोमबत्ती देख रहा है जो जल रही है कमरे को प्रकाशित कर रही है पर वह सबसे ज़्यादा इससे से प्रभावित है कि मोमबत्ती, उसकी लौ और उसकी गरमी – ये तीन अलग-अलग सच्चाइयाँ हैं पर ये सब एक ही सत्य के भाग हैं।
सच है मित्रो, अगर हम गौ़र करें तो हम पायेंगे कि कई चीज़ों को हम अलग-अलग देखते हैं पर सच बात कई बार ये एक ही सत्य के अभिन्न हिस्से हैं। पवित्र तृत्व की सच्चाई भी ऐसी ही है। पवित्र तृत्व में तीन जन हैं पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा जिसके बारे में येसु ने हमें बतलाया है ये तीनों अलग-अलग होकर भी एक ही हैं, ये तीनों एकता के एकसूत्र में बँधे रहते हैं और दुनिया को सुन्दर और स्वर्ग-सा बनाने के लिये एक साथ मिल कर कार्य करते हैं।
मित्रो, आज हम रविवारीय आराधना चिन्तन कार्यक्रम के पूजन-विधि पंचांग के वर्ष ‘ब’ पवित्र तृत्व रविवार के लिये प्रस्तावित पाठों के आधार पर मनन-चिन्तन कर रहे हैं। प्रभु आज हमें आमंत्रित कर रहे हैं ताकि हम पवित्र तृत्व की एकता और उनके मिशन को समझ सकें और पूरी दुनिया को येसु की इच्छा और आदेश के अनुसार जीने के लिये मदद दे सकें। आइये हम अभी संत मत्ती के सुसमाचार के 28वें अध्याय के 16 से 20 पदों को पर चिन्तन करें।
संत मत्ती, 28, 16-20
16) तब ग्यारह शिष्य गलीलिया की उस पहाड़ी के पास गये , जहाँ ईसा ने उन्हें बुलाया था।
17) उन्होंने ईसा को देख कर दण्डवत् किया, किन्तु किसी-किसी को सन्देह भी हुआ।
18) तब ईसा ने उनके पास आ कर कहा, ”मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।
19) इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।
20) मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम-लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो- मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ।”

मित्रो, मेरा पूरा विश्वास है कि आपने आज के प्रभु के वचनों को गौर से पढ़ा है। आज जिन शब्दों ने मेरे मन दिल को प्रभावित किया है वह है तुम जाकर सब राष्ट्रो को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।
धर्मप्रचार
आपने अवश्य ही गौर किया होगा कि प्रभु आज दो बातों पर बल दे रहे हैं। पहली बात जिस पर जिसे वे हमें बताना चाहते हैं वह है कि हम प्रभु के बारे में पूरे विश्व को बतायें। हम प्रभु का नाम प्रचार करें। हम लोगों को शुभ संदेश दें। प्रभु के बारे में बताने की ज़िम्मेदारी हम सबों को है। प्रभु चाहते हैं कि हम उनका शुभ संदेश सारी दुनिया में फैलायें। कभी- कभी मैं खुद ही सोचने लगता हूँ कि क्या है प्रभु का शुभ संदेश मेरे लिये। मित्रो, अगर आप मेरी मानें तो प्रभु का शुभ संदेश मेरे लिये तो यही है कि प्रभु कभी हारता नहीं हैं प्रभु के लिये जीवन जीने वाला इंसान कभी भी मरता नहीं हैं और प्रभु में आशा रख कर भला जीवन जीने वाला इंसान ही सच्चा मानव है, सच्चा ख्रीस्तीय है। यही सब प्रभु ने दुनिया वालों के लिये किया। कई बार भले कार्यों को करने वाले को उचित पुरस्कार तुरंत नहीं मिल जाता है पर फिर भी वह व्यक्ति कभी भी असफल नहीं होता है। प्रभु अच्छे और भले व्यक्ति को उचित समय पर उचित पुरस्कार अवश्य ही देता है। अगर हर मानव इस बात को समझ ले तो उसे अवश्य ही प्रभु अपने आनन्द और खुशी से भर देंगे।
पिता पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर
मित्रो, जिस दूसरी बात को प्रभु ने हमें बताया है वह है कि हमें सुसमाचार का प्रचार पिता पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर करना है। अगर आप सच पूछें तो मुझे इसी दूसरी बात ने बहुत प्रभावित किया है। प्रभु का आमंत्रण है हम किसी को भी ईश्वर के बारे में बतायें तो हम यह न भूलें कि हम उन्हें तीन जनों के बारे में बतायें।
मित्रो, जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं तो साधारणतः ईश्वर को यही कह कर पुकारते हैं कि हे ईश्वर हमारी विन्ती सुन ले या हम कहते हैं कि हे पिता हमारी प्रार्थना सुन ले। हमने कई बार लोगों को प्रार्थना करते सुना है और यही पाया है कि वे तीन जनों का नाम नहीं लेते हैं। हम किसी एक का नाम लेकर ही ईश्वर से दुआएँ माँग लेते हैं। आप लोगों का सवाल होगा कि आखिर हम भगवान के तीनों जनों का नाम क्यों लें या क्या तीनों जनों के बारे में जानना आवश्यक है। सच पूछा जाये तो प्रभु ने तीनों के नाम पर लोगों को बपतिस्मा देने की बात कहकर हमें एक विशेष आज्ञा दी है। आइये हम इसे ख्रीस्तीय तरीके से समझने का प्रयास करें। हमारे जीवन में तीन बातों की विशेष ज़रूरत है। ख्रीस्तीय विश्वास के अनुसार हम यह पाते हैं कि पिता ईश्वर सृजनहार हैं। उन्होंने इस दुनिया की सृष्टि की औऱ हमारी सहायता से पूरी दुनिया का निर्माण कार्य जारी है और जारी रहेगा। आज हमें इस बात को समझने की ज़रूरत है कि ईश्वर ने हमें बनाया है औऱ हमसे यह भी चाहते हैं कि हम भी उनके सृष्टि के कार्य को आगे बढ़ायें ताकि यह धरती सुन्दर और ऐसा रमणीय स्थान बन जाये कि यहाँ जीने वालों को स्वर्गीय आनन्द प्राप्त हो सके।
अब हम आइये पुत्र ईश्वर की बातें करें। पुत्र ईश्वर ने अपने प्राण देकर दुनिया को बचाया। जब हम पुत्र ईश्वर की बातें करते हैं तो हम इस बात पर बल देते हैं कि हर एक व्यक्ति को इस दुनिया में दूसरों की ख़ातिर जीना है भले इसके लिये उसे कष्ट ही उठाना क्यों न पड़े। यही प्रभु ने किया और अपने जाने के बाद वे हमसे चाहते हैं कि उसके चेले भी वैसा ही करें। अगर हम ऐसा करते हैं तब ही हम येसु के चेले कहलाने के हक़दार हैं।
अब आइये हम ईश्वर के तीसरे जन के बारे में चर्चा करें। ईश्वर के तीसरे जन अर्थात् पवित्र आत्मा जिसकी चर्चा प्रभु ने कई बार की थी। प्रभु चाहते हैं कि वे पिता के समान नयी और अच्छी वस्तुओं के निर्माण में उनका सहयोग करें। साथ ही हम प्रभु के समान अपना जीवन देकर दूसरों के मसीहा बनें । इतना ही नहीं प्रभु येसु ख्रीस्त यह भी चाहते हैं हम पवित्र आत्मा को ग्रहण करें और उसी की शक्ति से अपने जीवन में निर्णय करें। सच पूछा जाये तो ये तीन जन एक ही में समाहित हैं। कई बार धर्म शिक्षा में यह बताया जाता है कि एक ईश्वर है और एक ईश्वर में तीन जन हैं तो यह बात हमें समझ में नहीं आती है। हम कई बार इस उलझन में फंस जाते हैं कि किस तरह से एक ही जन में तीन जन हैं। इस बात को समझने के प्रयास में संत अगुस्टीन को अंतर्दृष्टि मिली वह थी कि ईश्वर के तीन जनों का रहस्य इतना विस्तृत और गहरा है कि हम इसे अपनी छोटी बुद्धि से नहीं समझ सकते हैं। संत सिरिल ने इसे समझाते हुए यह कहा कि एक ईश्वर में तीन जन की सच्चाई ठीक उसी तरह से है जैसे सूर्य की सच्चाई। सूर्य एक है पर इसमें उसकी रोशनी है और इसके साथ ही इसमें उसकी गर्मी हैं।
सूर्य, रोशनी, और ताप
आप सबों को याद होगा जिस घटना को मैंने आप लोगों के सामने चर्चा की है उसमें छात्रों ने मुझे इसी बात को समझने में मेरी मदद की थी। जब मोमबत्ती जलती है तो वह एक ही सच्चाई है पर उसके तीन विभिन्न रूप है। मोमबत्ती रोशनी और उसका ताप। आज जब हम पवित्र तृत्व का पर्व मना रहे हैं तो इस पर्व के द्वारा प्रभु हमसे चाहते हैं कि हम तीन गुणों में आगे बढ़े। वे चाहते हैं कि ईश्वर के द्वारा आरंभ सृष्टि के कार्य को आगे बढ़ायें। वे चाहते हैं कि हम दूसरों के लिये अपना जीवन देना सीखें और साथ ही प्रभु चाहते हैं कि हम पवित्र आत्मा की आवाज़ सुनें और अपने जीवन में सही निर्णय करें और इस तरह से इस धरा को पवित्र करें।
ईश्वर के कार्य को आगे बढ़ाना आसान नहीं हैं पर हम कदापि न सोचें कि येसु के कार्य को करने में आऩन्द नहीं है। आज प्रभु की पुकार है कि हम ऐसा सोचें ऐसा करें ऐसा जीवन बितायें की पिता पुत्र और पवित्र आत्मा की इच्छा पूरी हो। हमारे कार्यों से हमारा जीवन तो सुन्दर बने ही सारा जग ही पवित्र तृत्वमय हो जाये। और तब ही हमारा जीवन सफल सुन्दर और संतोष से पूर्ण हो जायेगा।

वर्ष ‘स’ पास्का का सातवाँ रविवार, स्वर्गारोहण

जस्टिन तिर्की, ये.स

प्रेरित चरित 1. 1-11
एफेसियों के नाम 1, 17-23
लूकस 24,46-53

एक राजा की कहानी
मित्रो, आज आपलोगों को एक राजा की कहानी बताता हूँ। बर्षो पहले किसी देश में एक राजा हुआ करता था। उसका सब बहुत सम्मान करते थे। उसकी आज्ञाओं का पालन सब ही खुशी दिल से किया करते थे। उन्होंने लोगों की भलाई के लिये अनेक कार्य भी किये। वे खुद ही पूरे राज्य का भ्रमण करते और अपनी प्रजा का हालचाल पूछ लिया करते थे। पूरे राज्य में शांति थी। पर एक बार ऐसा हुआ कि राजा बीमार हो गये। और बीमारी के कारण वे कई महीनों तक नहीं चल-फिर सकते थे। जब महीनों बाद वह स्वास्थ्य लाभ करने लगे तब उन्होंने धीरे-धीरे घर के आस-पास चहलक़दमी करने लगे। जब वे महल में घूमते थे तो उन्हें किसी बात की तकलीफ़ नहीं होती थी पर जब वे बाहर निकले थे तो उनके पैर में दर्द होता था। जब ऐसा होता तो वे कहते कि बाहर चलना बहुत मुश्किल है। कई बार तो उसके राजदरबारी उन्हें कंधे पर उठा कर देश भ्रमण के लिये ले जाया करते थे। बार-बार ऐसा होने से राजा तो परेशान थे ही उसके राजदरबार के लोगों भी बहुत परेशानी होती थी। एक दिन राजा ने कुछ अज़ीब हुक्म दे डाली। उन्होंने कहा क्यों ने जानवर के चमड़े को पूरे राजदरबार और पूरे किले में बिछा दी जाये। राजदरबार के लोगों को यह विचार पसंद नहीं आया पर किसी को इतनी हिम्मत नहीं हुई की राजा के हुक्म का विरोध करे। उन राजदरबारियों में एक युवा मंत्री था उसने राजा से कहा कि राजा पूरे राजदरबार में चमड़े बिछा देने की बात तो बहुत अच्छी है पर इसके लिये इतने चमड़े कहाँ से आयेंगे। पर राजा ने कहा कि यह उसकी आज्ञा है उसे बदला नहीं जा सकता। तब उस युवा राजदरबारी ने कहा कि राजा महाशय आपके पैर को बचाने के लिये एक दूसरा उपाय है। राजा ने पूछा कि वह कौन-सा है तब उस युवा दरबारी ने कहा कि इतने चमड़े बिछाने से अच्छा क्या आप एक छोटा चमड़ा का टुकड़ा अपने पैर में नहीं बाँध सकते। राजा को यह विचार अच्छा लगा। पूरे राजमहल में चमड़े बिछाने से अच्छा और सस्ता उपाय है आप ही एक छोटा-सा चमड़ा अपने पैर में बाँध लीजिये और आप जहाँ जाना चाहे जा सकते हैं। राजा को यह विचार अति उत्तम लगा। और न केवल राजा ने अपने पैर में चमड़े बाँधे पर पूरे राजदरबारियों ने भी ऐसा ही किया। और आज उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए अपने पैरों में जूते पहनते हैं। नये और अच्छे विचारों और विश्वास का साक्ष्य देते हुए इसे दूसरों को बताने से वह विचार पूरे विश्व में आसानी से फैल जाता है और इससे जग ही बदल जाता है।

संत लूकस 24,46- 54
46) और उन से कहा, ”ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे
47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।
48) तुम इन बातों के साक्षी हो।
49) देखों, मेरे पिता ने जिस वरदान की प्रतिज्ञा की है, उसे मैं तुम्हारे पास भेजूँगा। इसलिए तुम लोग शहर में तब तक बने रहो, जब तक ऊपर की शक्ति से सम्पन्न न हो ेजाओ।”
50) इसके बाद ईसा उन्हें बेथानिया तक ले गये और उन्होंने अपने हाथ उठा कर उन्हें आशिष दी।
51) आशिष देते-देते वह उनकी आँखों से ओझल हो गये और स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये।
52) वे उन्हें दण्डवत् कर बड़े आनन्द के साथ येरुसालेम लौटे
53) और ईश्वर की स्तुति करते हुए सारा समय मन्दिर में बिताते थे।

गुरु-शिष्य का मिशन
मित्रो, आज हम प्रभु के स्वर्गारोहण त्योहार मना रहे हैं। आज के ही दिन प्रभु पिता के पास स्वर्ग चले गये। मित्रो, आज की जो घटना है वह इसलिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि येसु ने अपना जो मिशन था उसे अपने शिष्यों को सौंप कर खुद पिता के पास चले गये। किसी भी मिशन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि एक गुरु अपने संदेश को अपने शिष्यों को कितनी अच्छी तरह से बता पाता है।
शिष्यों पर भरोसा
अगर हम आज प्रभु येसु के जीवन पर गौर करें तो हम पायेंगे कि येसु ने अपने कार्यों की सफलता के लिये अपने दल पर अर्थात् अपने शिष्यों पर पूरा भरोसा किया। आज के सुसमाचार पर हम मनन-चिन्तन करें तो हम पायेंगे कि प्रभु को तीन बातों पर पूरा भरोसा था। पहली बात की उनका मिशन पिता का मिशन है और पिता ही इस कार्य को सफल बनायेंगे।
मिशन ईश्वर की इच्छा
दूसरी बात कि वे जानते थे कि उनके शिष्यों ने जो कुछ देखा है वे उसका साक्ष्य देंगे। आज के प्रभु के वचन हमें इस बात को याद दिलाते हैं कि येसु को अपने जीवन और मरण के बारे में पूर्व ज्ञान था। उन्होंने अपने मिशन को ईश्वर की इच्छा के रूप में स्वीकार किया था। और वे जानते थे कि ईश्वर की इच्छा करने के मार्ग में उन्हें क्रूस ढोना पड़ेगा और उनके मानवीय जीवन का अंत हो जायेगा। इससे भी बढ़कर येसु को यह भी मालूम था कि उनके जीवन का बलिदान फल लायेगा और वह फल बना रहेगा। अगर व्यक्ति इस बात को समझ लेता है कि वह जो कुछ भला कर रहा है वह व्यर्थ नहीं जायेगा तो उसके मार्ग में कई कठिनाइयाँ आ भी जाये तो वह अडिग रहेगा। वह इस बात को अच्छी तरह से जानेगा कि अच्छी सच्ची और भली बातों का अन्त नहीं होता वह कार्य जारी रहता है। येसु को खुद पर अपने पिता की इच्छा पर अनन्त जीवन पर पूरा भरोसा था। और इसीलिये उन्होंने अपने शिष्यों को इसके लिये तैयार किया ताकि वे उनके जाने के बाद ईश्वरीय मिशन को जिसे ईश्वर ने येसु को सौंपा था पूरा कर सकें।
प्रभु का आत्मा
तीसरी बात पर जब विचार करते हैं वह यह है कि येसु बार-बार कहते हैं कि वे शिष्यों के लिये अपनी आत्मा भेज देंगे। वास्तव में पवित्र आत्मा येसु का आत्मा ही है जिसका गहरा अनुभव उसके शिष्य तब करते हैं जब येसु इस दुनिया से विदा होकर चले जाते हैं। मित्रो, कई बार हम सोचते हैं कि आखिर पवित्र आत्मा के अनुभव से क्या होता है। पवित्र आत्मा के व्यक्तिगत अनुभव से व्यक्ति उस आध्यात्मिक ताकत या शक्ति का अनुभव अपने दिल में करते हैं जिसके द्वारा हर दुःख उठाकर अच्छाई और सच्चाई के लिये जीने और मरने के लिये तत्पर हो जाते हैं और दूसरों की भलाई में अपना जीवन जीने लगते हैं।
मित्रो, स्वर्गारोहण के दिन प्रभु येसु प्रभु चाहते हैं कि हम इन्हीं तीन बातों का अपने जीवन में गहरा अनुभव करें। हम जाने कि हमारा इस जीवन को जीने का एक ख़ास मकसद है जिसे प्रभु येसु ने हमें दिया है। और यह मिशन या कार्य हमारा अपना कार्य या मिशन नहीं है। यह ईश्वरीय कार्य है। दूसरी बात जिसे प्रभु आज हमें समझाना चाहते हैं वह है कि हम प्रभु के सब कार्यों का साक्ष्य दें। कई बार हम मुँह से बोल देते हैं कि प्रभु भले हैं कई बार हम इस बात को मन से तो जानते हैं पर इसका साक्ष्य नहीं दे पाते हैं क्योंकि हमने इसका व्यक्तिगत या गहरा अनुभव नहीं किया है।
मिशन, साक्ष्य, आनन्द
आज प्रभु हमें बुला रहे हैं, हममें से प्रत्येक जन को निमंत्रित कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हमें उनके कार्यों का साक्ष्य देना उनके जीवन का उनके दुःख का उनकी मृत्यु और पुनरुत्थान का साक्ष्य देना ताकि हम रोज दिन प्रभु के प्रिय शिष्य बनते जायें और यह दुनिया भी बदलती जाये। काम कठिन है पर आन्तरिक आनन्द से भरा। कभी-कभी यह मूर्खतापूर्ण भी लगे या दिखाई पड़े जैसा कि लोगों ने येसु के बारे में सोचा था। जैसा कि उस दुनियावी राजा को भी कई लोगों ने कहा कि उनका सोच मूर्खतापूर्ण है जब उन्होंने पैर की सुरक्षा के लिये चमड़े के उपयोग का प्रस्ताव डाला था।आज प्रभु की वाणी हमें कह रही है कि अर्थपूर्ण और भले कार्य को करने का मन बना लें उसके लिये हर दुःख झेलने को तैयार हो जायें तो इससे खुद का तो भला होगा ही सारा जग इससे सुख और शांति प्राप्त करेंगे।

 

वर्ष ‘स’  पास्का का तीसरा रविवार

प्रेरित चरित 5, 27-32, 40-41

प्रकाशना ग्रंथ 5, 11-14

संत योहन 21, 1-19

जस्टिन तिर्की, ये.स.

एक जेस्विट फादर की कहानी

मित्रो, आज आप लोगों को एक घटना के बारे में बताता हूँ जो जापान में घटी थी। सन् 1708 की बात है जापान के राजा ने एक जेस्विट पुरोहित को मृत्यु की सजा सुनायी। सजा देने के पूर्व जेस्विट पुरोहित को पकड़ कर जेल में रखा गया। पाँच महीने के बाद जापान के राजा ने आज्ञा दी कि उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया जाये। जापान के राजा चाहते थे कि पूरे जापान से काथलिक धर्म सदा-सदा के लिये समाप्त हो जाये। उस पुरोहित के मारे जाने के बाद राजा ने सोचा कि अब  काथलिक धर्म का अंत हो गया है। करीब 150 साल बाद जापान ने अपनी विदेश नीति बदली और फिर से दूसरे देश के लोग जापान के साथ अपना व्यापार आरंभ कर दिया। व्यापारियों के साथ फिर से कुछ काथलिक मिशनरी जापान पहुँचे। एक दिन की बात है कुछ स्थानीय ग्रामीणों की मुलाकत इस मिशनरियों से हुई। इन ग्रामीणों ने उस मिशनरी पुरोहित से पूछा कि क्या वे गिरजाघर के अंदर जा सकते हैं। तब उस पुरोहित ने कहा कि वे गिरजाघर के अंदर जाकर देख सकते हैं। ग्रामीणों में से एक ने पुरोहित से कहा कि वह उनसे दो प्रश्न पूछना है। तब उस मिशनरी ने कहा कि वह सवाल पूछे। उस ग्रामीण ने पहला सवाल पूछते हुए कहा कि आप माता मरिया पर विश्वास करते हैं। पुरोहित ने कहा कि वह विश्वास करता है। तब उस व्यक्ति ने दूसरा सवाल पूछा कि क्या आप संत पापा आपके धर्म का अध्यक्ष है। उस मिशनरी फादर ने कहा कि हाँ संत पापा ही उनके धर्म के मुख्य अधिकारी हैं। इतना जानना था कि उस ग्रामीण के खुशी की सीमा न रही। उसने कहा कि इसका मतलब है आप रोमन काथलिक हैं। मिशनरी ने कहा कि वह रोमन काथलिक पुरोहित है। ग्रामीण ने कहा कि वह भी काथलिक है। इसके बाद तो काथलिक कलीसिया पूरे जापान में सक्रिय हो गया और पूरे जापान में काथलिकों की संख्या बढ़ती चली गयी है। कई लोगों ने सोचा था कि ईसा की मृत्यु के बाद ईसाई धर्म समाप्त हो जायेगा पर ऐसा नहीं हुआ पर पूरे विश्व में फैल गया। और आज भी करोड़ों लोग संत पापा के अधिकार को मानते हैं और उसके निर्देशों का बखूबी पालन करते हैं।

संत योहन, 1-19

1) बाद में ईसा तिबेरियस के समुद्र के पास, अपने शिष्यों को फिर दिखाई दिये। यह इस प्रकार हुआ।

2) सिमोन पेत्रुस, थोमस जो यमल कहलाता था, नथनाएल, जो गलीलिया के काना का निवासी था, जेबेदी के पुत्र और ईसा के दो अन्य शिष्य साथ थे।

3) सिमोन पेत्रुस ने उन से कहा, ”मैं मछली मारने जा रहा हूँ”। वे उस से बोले, ”हम भी तुम्हारे साथ चलते हैं”। वे चल पडे और नाव पर सवार हुये, किन्तु उस रात उन्हें कुछ नहीं मिला।

4) सबेरा हो ही रहा था कि ईसा तट पर दिखाई दिये; किन्तु शिष्य उन्हें नही पहचान सके।

5) ईसा ने उन से कहा, ”बच्चों! खाने को कुछ मिला?” उन्होने उत्तर दिया, ”जी नहीं”।

6) इस पर ईसा ने उन से कहा, ”नाव की दाहिनी ओर जाल डाल दो और तुम्हें मिलेगा”। उन्होंने जाल डाला और इतनी मछलियाँ फस गयीं कि वे जाल नहीं निकाल सके।

7) तब उस शिष्य ने, जिसे ईसा प्यार करते थे, पेत्रुस से कहा, ”यह तो प्रभु ही हैं”। जब पेत्रुस ने सुना कि यह प्रभु हैं, तो वह अपना कपड़ा पहन कर- क्योंकि वह नंगा था- समुद्र में कूद पडा।

8) दूसरे शिष्य मछलियों से भरा जाल खीचतें हुये डोंगी पर आये। वे किनारे से केवल लगभग दो सौ हाथ दूर थे।

9) उन्होंने तट पर उतरकर वहाँ कोयले की आग पर रखी हुई मछली देखी और रोटी भी।

10) ईसा ने उन से कहा, ”तुमने अभी-अभी जो मछलियाँ पकडी हैं, उन में से कुछ ले आओ।

11) सिमोन पेत्रुस गया और जाल किनारे खीचं लाया। उस में एक सौ तिरपन बड़ी बड़ी मछलियाँ थी और इतनी मछलियाँ होने पर भी जाल नहीं फटा था।

12) ईसा ने उन से कहा, ”आओ जलपान कर लो”। शिष्यों में किसी को भी ईसा से यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि आप कौन हैं। वे जानते थे कि वह प्रभु हैं।

13) ईसा अब पास आये। उन्होंने रोटी ले कर उन्हें दी और इसी तरह मछली भी।

14) इस प्रकार ईसा मृतकों में से जी उठने के बाद तीसरी बार अपने शिष्यों के सामने प्रकट हुये।

15) जलपान के बाद ईसा ने सिमोन पेत्रुस से कहा, ”सिमोन योहन के पुत्र! क्या इनकी अपेक्षा तुम मुझे अधिक प्यार करते हो?” उसने उन्हें उत्तर दिया, ”जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ”। उन्होंने पेत्रुस से कहा, ”मेरे मेमनों को चराओ”।

16) ईसा ने दूसरी बार उस से कहा, ”सिमोन, योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” उसने उत्तर दिया, ”जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ”। उन्होंने पेत्रुस से कहा, ”मेरी भेडों को चराओ”।

17) ईसा ने तीसरी बार उस से कहा, ”सिमोन योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” पेत्रुस को इस से दुःख हुआ कि उन्होंने तीसरी बार उस से यह पूछा, ‘क्या तुम मुझे प्यार करते हो’ और उसने ईसा से कहा, ”प्रभु! आप को तो सब कुछ मालूम है। आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हँू।” ईसा ने उस से कहा मेरी भेडों को चराओ।

18) ”मैं तुम से यह कहता हूँ- जवानी में तुम स्वयं अपनी कमर कस कर जहाँ चाहते थे, वहाँ घूमते फिरते थे; लेकिन बुढ़ापे में तुम अपने हाथ फैलाओगे और दूसरा व्यक्ति तुम्हारी कमर कस कर तुम्हें वहाँ ले जायेगा। जहाँ तुम जाना नहीं चाहते।”

19) इन शब्दों से ईसा ने संकेत किया कि किस प्रकार की मृत्यु से पेत्रुस द्वारा ईश्वर की महिमा का विस्तार होगा। ईसा ने अंत में पेत्रुस से कहा, ”मेरा अनुसरण करो”।

कमजोर पेत्रुस

मित्रो, इन दिनों हम येसु के पुनरुत्थान और उसके बाद होने वाली घटनाओं पर चिन्तन कर रहे हैं। आज के सुसमाचार में जिस बात की चर्चा की गयी है उसके केन्द्र बिन्दु है पीटर या पेत्रुस। एक साधारण मछुआ जिसने उत्साहपूर्वक येसु के अनुसरण करने के लिये अपने आप को सौंपा। अपने उत्साह में उसने कहा कि प्रभु आप जहाँ भी जायेंगे मैं भी आपके साथ वहीं जाउँगा। यह वही पीटर है जिसने येसु के कहने पर समुद्र में कूदने का साहस किया था और जब डूबने लगा तो चिल्लाया ताकि येसु उन्हें बचा लें। मित्रो, आपको याद होगा कि यह वही पीटर है जिसने येसु को तीन बार अस्वीकार किया। और येसु के मारे जाने के बाद फिर से मच्छली मारने के पुराने पेशे पर वापस लौट आया है। उसी पीटर को आज येसु तिबेरियस के समुद्री तट पर दिखाई पड़ते हैं। मित्रो, आज की घटना पर हम ग़ौर करें येसु उसी पेत्रुस को दिखाई  देते हैं उसी के सामने फिर से बड़ी संख्या में मछली  पकड़ने का चमत्कार करते हैं। उसी कमजोर पीटर को अपना उत्तराधिकारी बनाते और उन्हीं कमजोर चेलों को दुनिया में भेजते हैं ताकि ईश्वरीय राज्य का विस्तार हो सके।

अन्त से शुरु

अगर हम आज की घटनाओं पर बारीकी से विचार करें तो आज की घटना हमारे लम्बे आध्यात्मिक अनुभव की एक संक्षिप्त झलक है। कई बार हमने अपने जीवन में इस बात का अनुभव किया है कि ईश्वर हमारे साथ हैं जैसा कि पीटर ने येसु के साथ तीन सालों तक अनुभव किया था। जब येसु क्रूस पर चढ़ा दिये गये तब उसने सोचा कि अब सब कुछ समाप्त हो गया है। और वह फिर से एक बार वहीं पहुँच गया जहाँ से उन्होंने अपना नया जीवन शुरु किया था। वह मछली पकड़ने लगा। येसु उन्हें फिर वहीं फिर  दिखाई पड़ते हैं ।  मज़े की बात है कि पीटर ने ही सबसे पहले जीवित येसु को पहचाना और कहा कि वे प्रभु ही हैं। और येसु को पहचानना था कि येसु ने पीटर को फिर से वरदानों से भर दिया। उन्होंने उन्हें काथलिक कलीसिया का प्रथम महाधिकारी अर्थात् पहला पोप बना दिया।

येसु हमारे जीवन में

मित्रो, क्या हमारे जीवन में ऐसा नहीं होता, क्या येसु हमारे जीवन में नहीं आते, क्या येसु हमारे जीवन में चमत्कार नहीं करते, क्या येसु हमें जिम्मेदारियाँ नहीं सौंपते ? पुनर्जीवित येसु हमारे जीवन में भी आते रहते हैं। कई बार हम यह भी सोचते हैं कि येसु को पाने के लिये हमें उचित जगह चाहिये उचित समय चाहिये उचित माहौल चाहिये। यह भी सही है पर आज प्रभु येसु हमें बताना चाहते हैं कि जीवित येसु वहीं उपस्थित जहाँ हम अपना कार्य करते हैं। जहाँ हम अपना साधारण जीवन जीते हैं। तो मित्रो, आखिर पीटर पर येसु ने क्यों इतना भरोसा किया। पीटर में तीन विशेष गुण साफ दिखाई देते हैं कि पीटर के दिल येसु को पहचानने की विशेष शक्ति थी क्योंकि वह उन्हें प्यार करता था। दूसरा गुण जो पीटर में थी- नम्रता और तत्परता की। वह यह कि येसु की आवाज़ सुनते ही उसके ओर जाने को कदम बढ़ाता था। और तीसरा गुण जो पीटर में थी – आत्मविश्वास और साहस की। वह सोचता था कि अगर प्रभु ने बुलाया है तो वहीं मार्गदर्शन भी करेगा।

येसु को पहचानना

मित्रो, आज प्रभु हमें बुला रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं वहीं हूँ जहाँ तुम हो जहाँ तुम कार्य करते हो मुझे पहचानो। प्रभु कह रहे हैं कि मैं मेरी बात मानो हुक्म मानो और अच्छाई, भलाई और सच्चाई के लिये तुरन्त कदम उठाओ। प्रभु यह भी कह रहे हैं कि मेरा कार्य करने वाला कभी भी छोटा होता नहीं है। भले ही वह छोटा, अज्ञानी अनपढ़ या कमजोर नज़र आये।

सत्य दुःख उठाता हारता नहीं

मित्रो, आज हमें  इस बात को समझने की आवश्यकता है कि जीवित येसु की शक्ति कभी समाप्त नहीं होगी। जो सत्य है, ईमानदार है, भला है, वह तकलीफ़ उठाता है पर उसका अंत नहीं होता है। जापान के राजा ने भी सोचा था कि जेस्विट पुरोहित को मृत्यु दंड देने के बाद ख्रीस्तीयता जड़ से समाप्त हो जायेगी पर ऐसा हुआ नहीं। पीटर के जीवन से ईश्वर हमें इस बात की प्रेरणा दे कि हम भी येसु को पहचानें नम्रतापूर्वक उसे स्वीकार करें सच्चाई भलाई और अच्छाई के लिये जीना सीखें तो हमारा जीवन सार्थक हो जायेगा।

 

 

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